एक चर्चा हिन्दू संस्कृति की
सुहागन रहो, सौभाग्यवती भव आदि पति के ज़िंदा रहने का आशीष ख़ूब मिलते हैं महिलाओं को, पत्नी जिए-ऐसा कोई आशीष सुना आजतक? सवाल आलोचना का नही, सुधार का है. हम पहले भी बदलते रहे हैं, अब भी बदलें। हमारी संस्कृति एक विज्ञान है जिसमें श्रेष्ठतम को स्थान दिया जाता है। और श्रेष्ठतम भी कैसा ? ऐसा श्रेष्ठ जो किसी अन्य को नुकसान न पहुंचाये, सिर्फ और सिर्फ अपना ही काम करे। सर्वे भवन्तु मंगलम! हमारे कृत्य से जो उद्देश्य लिया है वो तो पूरा हो जाये और उसके साथ ही किसी अन्य का नुकसान न हो भले ही लाभ हो जाये।
ग़ौर कीजिए न- पुरुषों को भी गाली अगर दी जाय तो वह महिलाओं की ही होती है. इसके उलट महिलाओं को भी आशीर्वाद दिया जाय तो वह पुरुषों के लिए ही होता है. क्या यह सही है? क्या इन छोटे-छोटे बदलावों पर हमें ध्यान नही देना होगा?
बदलना नही चाहिए हमें?
सच ही तो है ये बात! हमें अपने समाज में ऐसी विरोधाभासी चीजों को ढूंढ ढूंढ कर नष्ट किये जाने की आवश्यकता है। और भी बहुत सी बातें हैं जिनके विरोध की आवश्यकता है।
यहां एक बात विचारणीय है कि आज हम बहुत सी बातों को जानने का दावा करते हैं, क्या हम आज अपनी पढ़ाई में पढ़ी हुई समस्त बातों जानते हैं ? याद हैं या नहीं ये बात अलग है। क्या हम किसी एक विषय करे अच्छे समझ चुके हैं ?
खैर! हम भी भेड़चाल में आंख मूंद कर दौड़ने की कोशिश करते हैं। पर उससे पहले कुछ विचार करते हैं यदि ये विचार हमें जमते हैं तो हम इनको अपनाने का प्रयास करेंगे।
स्त्री पुरूष के विवाह के लिए उनकी उम्र में पांच से सात साल का अंतर रखा जाता है। ये अंतर विज्ञान सम्मत भी माना जाता है। क्या ये अंतर उन दोनों के बीच उम्र्र के अंतिम पड़ाव तक नहीं होता होगा ? या फिर उम्र के बढ़ने के साथ ही ये अंतर कम होता जाता होगा? इसके बाद स्वाभाविक रूप से ज्यादा उम्र वाला पहले मरता होगा। और ज्यादा उम्र का तो पति होता है। उसकी मौत पहले होनी है अपनी पत्नी से।
सदा सौभाग्यवती भव! का मतलब ठेठ भाषा में है पति के मरने से पहले मरो! पति बाद में मरे। इस बात के दो मतलब निकाले जा सकते हंै। पहला मतलब कि पति को महिमामंड़ित किया जा रहा है। पुरूषप्रधान समाज अपने लिए ही सबकुछ व्यवस्था कर रखा है। किसी औरत को आशीर्वाद भी दिया तो उसमें से खुद की लम्बी उम्र मांगी। ये पुरूषवादी घटिया सोच। आदि आदि।
दूसर मतलब निकाला जा सकता है कि पुरूषप्रधान समाज में पति के जीते जी पत्नी को पूरा मान सम्मान मिले। एक पति अपनी पत्नी की रक्षा उसके मरते दम तक करे। या फिर पति का कर्तव्य है कि वो पत्नी की रक्षा, लालन-पालन और पोषण मरते दम तक करे। ये उस पति का कर्तव्य है। और पत्नी का ये अधिकार है।
सदा सुहागन रहो! पुत्रवती भव! आदि पुरूषवादी विचारधारा को बढ़ावा देने वाली मानसिकता हमारे धार्मिक ग्रंथों में कूटकाट कर भरी हुई है। आजतक मैंने नहीं देखा या सुना कि किसी पत्नी को या पति को किसी ने आशीर्वाद दिया हो कि पुत्रीवती भव! सुलक्षणी पुत्रीवती भव! या फिर बाजार में पतंजली के पुत्रवटी दवा का बिना किसी ने बंद करवाया हो। ये नारी विरोध वह भी उस ईश्वर की रचना का जिसने दुनिया में सबकुछ बनाया है। उसकी बनाई हुई दोनों चीजों में भेदभाव करने वाले आप कौन होते हैं। एकदम सच है ये बात! पर ये प्रश्न जो पूछ रहा है क्या वो ईश्वर को मानता भी है? इसी ईश्वर की अवधारणा जिन्होंने की है उन्होंने ही ये बताया है कि इस मानव जीवन में पुरूष रूपी जन्म लेकर ही आप मुक्ति यानी मोक्ष पा सकते हो। इस मोक्ष के लिए अनंतवीर्य की आवश्यकता होती है और ये वीर्य मात्र पुरूष में पाया जाता है स्त्री में नहीं। या तो आप पूरा का पूरा ईश्वर ही खारिज कर दो या फिर उसके समस्त नियम मान लो।
जब किसी महिला को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया जाता है तो एक प्रकार से उसकी कोख से एक मोक्ष जाने वाले जीव के जन्म की कामना की जाती है। यहां हम पूछ सकते हैं कि जब अंत में एक औरत ही बच जायेगी तो वो कैसे मोक्ष जायेगी या फिर जब औरत ही नहीं होगी दुनिया में तो इंसान या पुत्र जन्म ही कैसे लेगा ? जी बुद्धि है दिमाग है चलता भी है तो चलाइये।
सदा सुहागन होने का आशीर्वाद और सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद देने के बाद पुत्री होने पर उसके नाश की कामना की जाती है ? या आशीर्वाद में पुत्री हो ही नहीं कहा जाता है ? पुत्रवती होने को अर्थ पुत्रीवती न होना कैसे मान लिया गया है? हम क्यों वही सोचना चाहते हैं जो हमें वामी बुद्धि वालों द्वारा सोचवाया जाता है? पति की ज्यादा लंबी उम्र मांगने का अर्थ पत्नी का जल्दी मर जाना कैसे हो जाता है ? या उसके लिए लंबी उम्र न चाहना कैसे हो जाता है?
एक दुर्गति होती है नारी की पुरूषवादी गालियों के कारण! हर गाली में नारी को ही गाली दिया जाता है भले ही वो पुरूष को दी जाती है। नारी का मान मर्दन ही गालियों का काम होता है। यहां विचारणीय है कि हम यही किसी से झगड़ा करते हैं तो सामने वाले का क्या करना चाहेंगे ? जैसे उदाहरण स्वरूप किसी ने आपकी मोटर साइकिल को ठोकर मार दी तो आप उसका क्या करना चाहेंगे ? क्या उसकी साइकिल तोड़ेंगे? या फिर उसकी पेन की नीब तोड़ देंगे ? नहीं न! हम सामने वाले का बड़े से बड़ा नुकसान करना चाहेंगे। उसका घर टूट जाये, वो मर जाये या फिर उसके घर की इज्जत मान मर्यादा तार तार हो जाये। और किसी को भी घर से, धन वैभव से कहीं ज्यादा अपनी मान मर्यादा और इज्जत की फिक्र होती है। और ये इज्जत मान मर्यादा उसकी पत्नी मां बहन बेटी बहू में होती है। जब इनको देवी स्वरूप माना गया है तो स्वभाविक रूप से इनके कारण ही परिवार की सबसे कीमती चीज होती हैं। (यहां चीज शब्द से बहुतों को आपत्ति हो सकती है।) हर गाली में स्त्री के परपुरूष गमन, एकपत्नीव्रता से हटकर जीने की बात और शीलभंग की बात होती है जो कि उस परिवार के लिए सबसे बड़ा अपमान होता है अगर ऐसा उसके यहां होता है तो।
हम जो भी देखते हैं उसे देखने के लिए कौन से रंग का चश्मा पहन कर देखते हैं ये महत्वपूर्ण होता है। उस चश्में के रंग से सबकुछ बदल सा जाता है।
जब हम कहते हैं मां ही परिवार को स्वर्ग या नरक बना सकती है तो कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। जब हम कहते हैं मां ही अपने बच्चों में सदगुणों का निर्माण करती है तो ये नहीं दिखता। जिस घर में बेटी नहीं होती है वो घर, घर नहीं होता, कहते हैं तब कोई फेमिनीस्ट अपने मुंह में दही जमा कर क्यों बैठ जाता है ?
यहां एक प्रश्न और है जो खुद को आधुनिक और प्रगतिशील बताने वाले साहित्यकार (?) सदा उठाते हैं। जब स्त्री को मासिक धर्म के दौरान घर में सबके लिए खाना बनाना होता है तब उसका मंदिर जाना पाप कैसे हो जाता है। ऐसी अवस्था में उनको मंदिर जाने और पूजापाठ करने का भी अधिकार होना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में परिवार की संकल्पना मात्र दो बातों के लिए की गई है। पहली; मानव का जीवन किस तरह लंबी उम्र को प्राप्त हो। और दूसरी बात कि मानव की आत्मा को मोक्ष कैसे प्राप्त हो। मोक्ष यानी ऐसी अवस्था जहां सिर्फ सुख ही सुख हो और इंसान को सिर्फ सुख भोगने को मिले। धरती पर सुख की परिभाषा के अनुरूप मानें तो आत्मसंतोष, निरोगी होना। परिवार, मोक्ष का एक सूक्ष्म रूप ही है। जिसमें हम निरोगी रहने और संतोष पाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। अपने अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए लंबी उम्र की प्लानिंग! हमारी कोशिश और संस्कार हमें निरोगी बनाने के लिए ही हैं। आप अपने संस्कारों को याद कीजिए। त्योहारों के क्रम और उनकी तिथियों के औचत्य को समझिये। मनुष्य एक बैल की तरह है जब तक उसे डराया नहीं जाये तब तक वो अपने काम को ध्यान से नहीं करता है। अतः समस्त नियमों को धर्म के खाके में डाल दिया गया है। भोजन निर्माण और उपयोग सिर्फ आपकी निरोगी काया और लंबी उम्र के लिए तो है। योग, नदी के किनारे बस्ती, पीपल बरगद आंवला की पूजा, खेती को समर्पित जीवन! हमने तो भोग को जीवन माना है। खाओं पियो और बच्चे पैदा करो।
क्या उन दिनों में स्त्री का स्वास्थ अच्छा होता है ? क्या वह नैसर्गिक क्रिया है उसके बाद भी क्या वह सामान्य क्रिया है ? इस अवस्था में संक्रमण से उस स्त्री की तबीयत से लेकर भविष्य में होने वाले शिशु पर प्रभाव नहीं पड़ सकता है ? क्या एक स्त्री को आजादी उन्हीं असामान्य दिनों में काम करके ही मिलेगी ? किसने उसे काम करने पर मजबूर किया है ? हमारे संयुक्त परिवार की जड़ों पर चोट किसने की है ? किसने सिर्फ कर्तव्यों की याद दिलाई है ? क्या ये सच नहीं है कि ये काम खुद को प्रगतिशील कहने वाले साहित्यकारों ने नहीं किया है ? उन्होंने सरकारी नौकरी के माध्यम से परिवार को तोड़ा और फिर औरत को आजादी का एक घटिया मतलब समझाया। इस आजादी के अगुआ देश में स्त्री की आजादी का जश्न हमारे देश में किस तरह से मनाया जा रहा है, देखकर हंसी नहीं बल्कि क्षोभ होता है। वहंा स्त्री को आजाद करके बाजार की वस्तु से भी बदतर बना दिया गया है।
खैर! चश्में की जगह खुली आंखें रखो तो ज्यादा अच्छा होगा। आजकल हम प्रश्न ज्यादा करते हैं परन्तु उत्तर नहीं ढूंढते। शायद यही सिखाया है हमें मैकाले ने। और यही तो सिखाना चाहता था।
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