अर्ध रात्रि का ज्ञान




सोचा है कभी आपने
’’अरे! क्या हुआ कल तक तो भले चंगे थे, और आज हार्ट अटैक!’’ मैंने आश्चर्य ये पूछा।
’’दो नंबर का माल भरा पड़ा है पर कहीं लगा नहीं पा रहे हैं, इसलिए बहुत दिनों से टेंशन में चल रहे थे।’’ समीर ने हंसकर कहा। तो मैं आश्चर्य में डूबा रहा क्योंकि मुझे ये समझ ही नहीं आ रहा था कि इतना कितना माल था जो कहीं इनवेस्ट नहीं कर पा रहे हैं। आखिर मैंने पूछ ही लिया।
’’यार! कितना पैसा होगा जो इनवेस्ट नहीं कर पा रहा है ?’’
’’तुम और हम कल्पना नहीं कर सकते, इतना पैसा है। तनखा लगभग पचास हजार, चाय नाश्ता पानी पेट्रोल, दारू मुफ्त में। इसके बाद कमीशन पांच परसेंट।’’ समीर आंखें बड़ी करके बोला।
’’तो?’’ मेरे मुंह से कोई आश्चर्य प्रगट नहीं हो रहा था। समीर मुझे घूर कर देखता हुआ पूछा।
’’अच्छा! तुम ही बताओं वो सब इंजीनियर कितना कमाता होगा दो नंबर का ?’’
मैं एक पल को सोचा और बोला-’’बीस-तीस-पचास हजार रूपया महीना।’’ मेरी इस बात पर समीर हंस पड़ा और बोला-’’बस यही कमी है हमारे देशवासियों की। वो अपनी कमाई से दूसरों की तुलना करते हैं। जबकि उनकी और देशवासियों की कमाई की कोई तुलना नहीं है।’’
’’......’’ मैं कुछ समझा ही नहीं, इसलिए चुप ही रहा।
’’सोच भाई एक सरकारी भवन के विद्युतीकरण का बिल ही कम से कम एक लाख होता है तो पूरे भवन की लागत हो गई दस लाख रूपया। दस लाख का 30 परसेन्ट कितना हुआ तीन लाख! तीन लाख सभी को बंटता है चपरासी से लेकर पी डबल्यू डी मंत्री और मुख्यमंत्री तक। दस लाख का पांच परसेट हुआ पचास हजार रूपया मात्र। अगर एक इंजीनियर एक साल में ऐसे ही बारह भवन बनाता है तो साल के छह लाख रूपये। और इसके बाद साल रिपेयरिंग के नाम से निकलने वाले पैसों का हिसाब बाकी है। जब एक आदमी के पास हराम का हर महीने एक लाख आता है तो वो पहले साल प्लाट खरीदेगा, दूसरे साल मकान बनायेगा। तीसरे साल कार खरीदेगा। फिर क्या करेगा ? फिर उसको प्रापर्टी में पैसे लगाने की धुन लग जायेगी।’’
’’....’’
’’अच्छा तुमको लगता है कि दस लाख में मकान बन सकता है ?’’
’’कहां बनेगा कम से कम बीस पच्चीस लाख में तो प्लाट मिलता है और हजार स्केयर फीट का मकान बनाने का कम से कम 15 लाख तो लगता ही है। सरकारी भवन तो कम से कम पच्चीस तीस लाख से कम में कहां बनेगा।......बापरे! यानी सब इंजीनियर का ही एक डेढ़ लाख रूपया महीना!’’
’’अब समझ आई न बात! साल भर की तनखा का छै लाख और ऊपरी कमाई 18 लाख। तभी तो हर इंजीनियर का बेटा प्रायवेट इंजीनियरींग कालेज में पढ़ता है। कई गधे तो भारत से बाहर जाकर घोड़े बनकर आते हैं। चीन और रूस से तो डाक्टर की डिगरी खरीद कर इंसानों का इलाज करते हैं। हम आरक्षण वालों को गाली देते हैं जबकि ये प्रायवेट वाले ज्यादा खतरनाक होते हैं।’’
’’बात कुछ कुछ समझ आ रही है।’’ मैंने कहा।
’’पूरी आ जायेगी। कुछ समण् पहले दुनिया भर की बीमा कंपनी खुली थी और कालोनियों की बाढ़ आई थी जो आधार लागू होते ही गायब सी हो गई। पता है क्यों ?’’ समीर ने पूछा। मैंने न में सर हिलाया।
’’क्योंकि आधार नंबर को सरकार ने बीमा और बैंक खाते से जोड़ दिया। मतलब अब आपका लेन देन सरकार की नजर में है। सरकार जान गई कि आपकी तनखा है साल की छै लाख और और साल में तीन विदेश यात्रा करते हो। कहां से आया ये पैसा? यही दो नंबर का पैसा बीमा क्षेत्र में लग रहा था। एक एक आदमी की मासिक बीमा किश्त होती थी एक एक लाख रूपया मात्र। उस वक्त एक आदमी मकान के लोन का दो दो लाख रूपया जमा करता था। उसकी आय पचास हजार रूपया महीना! अब तब किसी के पास लाखों रूपया आयेगा तो कहां रखेगा इसलिए सोना और प्रापर्टी में पैसा लगाता था। ब्लैक मनी ऐसे ही पैदा होकर बढ़ती जाती थी। आज हर चीज के लिए आधार पैन जरूरी हो गया है। अब पचास हजार से ज्यादा की राशि को कोई भी कैश नहीं दे सकता है। मोटर साइकल आप कैश खरीद सकते हैं पर चेक देना होगा। जगह मकान खरीद सकते हैं पर उसकी राशि चैक से देनी होगी। इसलिए तो प्रापर्टी क्षेत्र में मंदी है। दो नंबर का पैसा कोई कहीं लगा नहीं पा रहा है। पैसा आज भी लिया जा रहा है पर उसको खपाने के रास्ते सीमित हैं। धीरे धीरे होल बंद किये जा रहे हैं। पहले एक व्यापारी कई बैंक में खाते रखकर अपनी कमाई को कई जगह में बांट कर रखता था। अब आधार से खाता खुल रहा है इसलिए कितने भी खाते देश भर में खोलो आपकी जानकारी सरकार की नजर में होगी। कुछ और बताउं या हो गया आज के लिए ?’’
’’नहीं भाई! और कुछ बताओ, भ्रस्टाचार और रिश्वत को जानकर समझने की कोशिश कर रहा हूं कि मैं इस समुद्र की बूंद भी हूं या नहीं?’’मैंने कहा। समीर मेरी बात सुनकर हंसने लगा।
’’अगर सरकार खाली प्लॉट पर टैक्स लगा दे तो मजा आ जाये। प्लॉट का बाजार भाव का दस प्रतिशत वार्षिक टैक्स! जो दो नंबरी धन की प्रापर्टी है वो सब गायब हो जायेगी। यहां लोगों के पास रहने को मकान इसलिए नहीं है कि शहर में जगह ही नहीं है और लाखों के पास आधा शहर! अगर ये जमीन जरूरतमंद को मिल जाये तो जंगल भी बच जायेंगे। शहर के विस्तार से जंगल ही तो कटते हैं। तब ये रिश्वतखोर अपना सर पीट लेंगे। रिश्वत का पैसा करें तो करें क्या ? दान करने की इच्छा नही ंहोती, सरकार कहीं लगाने नहीं देती। अब या तो उस पैसे का काजू किशमिश बादाम खाया जाये या फिर सेब अंगूर। पर कितना खायेगा कोई ? कुछ दिनों में पूरे देश की जमीन का लेखा जोखा एक साथ तैयार होने वाला है तब कोई कहीं भी एक इंच की जमीन खरीदेगा तुरंत सरकार को पता चल जायेगा। ये ईमानदारी और बेइमानी की लड़ाई ही है जो राष्ट्रवाद और मार्क्सवाद के पीछे है। संस्कार और वहशीपन की लड़ाई है जो भारतीय संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति के बीच चल रही है। समझे भाई ?’’
मैंने जरा हौले हौले सर हिलाया।

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