दिन के चौबीस घंटों में तुम्हें एक घंटा मौन रहना जरूरी है, जब भी तुम्हारी सुविधा हो। तुम्हारा आंतरिक संवाद चलता रहेगा लेकिन तुम उसके भागीदार मत बनो। बिना संलग्न हुए सुनो। कुंजी यह है कि आंतरिक वार्तालाप को इस भांति सुनो जैसे दो व्यक्तियों को बोलते हुए सुनते हो। तटस्थ रहो। संलग्न मत होओ, दिमाग का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को क्या बता रहा है इसे सुनो। जो भी आ रहा है उसे आने दो, उसे दबाओ मत; सिर्फ साक्षी रहो। तुमने वर्षों से जो भी कूड़ा इकट्ठा किया है वह निकलेगा। दिमाग को कभी इस कचरे को बाहर फेंकने की इजाजत नहीं दी गई है। एक बार मौका मिलने पर मन ऐसे दौड़ेगा जैसे लगाम छूटने पर घोड़ा भागता है।उसे भागने दो। तुम सिर्फ बैठो और अवलोकन करो। इस तरह सिर्फ देखना धीरज की कला है। तुम उस घोड़े पर सवार होना चाहोगे, उसे दिशा देना चाहोगे इधर या उधर क्योंकि यह तुम्हारी पुरानी आदत है। इस आदत को तोड़ने के लिए तुम्हें धीरज की जरूरत है। मन जहां भी जाए उसे सिर्फ देखना। इसमें कोई...
1) India After Gandhi – Ramchandra Guha 2) Indian Philosophy – Dr S. Radhakrishnan 3) A House for Mr. Vishwas – V.S. Naipaul 4) Oliver Twist – Charles Dickens 5) Hard Times – Charles Dickens 6) The Essays – Francis Bacon 7) Dreams from my Father – Barack Obama 8) War & Peace – Leo Tolstoy 9) The God of Small Things – Arundhati Roy 10) Gora – Rabindranath Tagore 11) Hot Days Long Nights – Nadezda Obradovic 12) The Wind from the Hills – Sethu 13) Reading Gandhi – Kusumlata Chaddha 14) The Argumentative Indian – Dr. Amartya Sen 15) Sherlock Holmes - Arthur Conan Doyle 16) India : An Introduction - Khushwant SIngh 17) Muhammad Ali- Graphic Novel (Campfire) 18) Jonathan Livingston Seagull - Richard Bach 19) William Shakespeare’s The Empire Striketh Back – Ian Doescher 20) Snow - Orhan Pamuk 21) Twenty Love Poems and a Song of Despair : Pablo Neruda 22) The Book Thief - Markus Zusak 23) 1984 - George Orwell ***************Hindi Literature*****...
पशु समाजिक हो सकता है जैसे मनुष्य, या धार्मिक जैसे गाय-बकरा आदि। पर दार्शनिक पशु बस भैंस है। शायद ही किसी ने किसी भैंस को उपद्रव मचाते देखा हो। इसे देख कर किसी पीर-सन्यासी की याद आती है, जो जीवन के सुख और दुख से ऊपर उठ चुका है। तमाम दार्शनिक किताबें भैंस के अनमनी दार्शनिकता के आगे फिके पड़ जाती हैं। भैंस से मेरी पहली मुलाकात बचपन में हुई। बिहार में एक छोटा सा गाँव है,पटना से 30 किलोमीटर दूर है 'रसलपुर'। यही है मेरा गाँव। मेरे पापा ने अपना बचपन यहीं काटा था, और नौकरी लगने के बाद भी वो चाहते थे कि बच्चे गाँव से मानसिक रूप से ज्यादा दूर न चले जाएं। इसलिए हर छुट्टी में वहाँ जाते ही हमें गाँव के काम पकड़ा दिए जाते थे, जैसे घास काट के लाना, खेत में बाकी काम,भैंस को चराने ले जाना आदि। इसमें मेरा सबसे प्रिय काम रहा है भैंस चराना। गाँव में भैंसों और गायों को दोपहर में नदी के तरफ घास खिलाने ले जाया जाता है। इसे ही भैंस चराने ले जाना कहते हैं। उनके घास खाते वक़्त वहाँ एक व्यक्ति को खड़ा रहना पड़ता है कि जानवर किसी और के खेत में न घुस जाये। और अगर ऐसा हुआ तो उस रोज गांव में लड़ाई पक्की।...
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