हमारे यहाँ एक मुनीम साहब थे, जोड़ घटाने में अत्यंत निपुण। बाबूजी उनको समाधानी कहते थे, ऐसा नही है कि वे हर समस्या का समाधान करना जानते थे, लेकिन उनसे मिलकर समस्याग्रस्त व्यक्ति शांति का अनुभव करता था। इसका कारण मात्र इतना था कि यदि किसी व्यक्ति ने अपनी किसी समस्या का ज़िक्र उनसे किया तो मुनीम साब तुरंत बताते की वे स्वयं उस समस्या से बहुत लम्बे समय से जूझ रहे हैं। यदि कोई उनके पास रोता हुआ पहुँचता तो मुनीम साहब उसकी बात सुनते-सुनते उससे भी अधिक ज़ोर से रोने लगते थे, मुनीम साहब को रोता देखकर वो व्यक्ति अपना रोना भूलकर उनको चुप करने में व्यस्त हो जाता था। एक दिन मैंने जिज्ञासावश उनसे पूछा की वे ऐसा क्यों करते हैं ? मुनीम साहब बोले- आदमी को समाधान से ज़्यादा तसल्ली, दूसरे की समस्या से मिलती है। अधिकतर लोगों को अपने दर्द की दवाई नहीं बल्कि हमदर्द चाहिए होता है, हमदर्दी दिखाने से उस पीड़ित व्यक्ति को लगता है की वो अकेला नहीं है जो कष्ट से जूझ रहा है, सम पीड़ा का भाव उसको चिंतामुक्त करते हुए आनंद से भर देता है। मैंने कहा- लेकिन इससे उनकी समस्या तो समाप्त नहीं होती, वो तो जैसी...
दिन के चौबीस घंटों में तुम्हें एक घंटा मौन रहना जरूरी है, जब भी तुम्हारी सुविधा हो। तुम्हारा आंतरिक संवाद चलता रहेगा लेकिन तुम उसके भागीदार मत बनो। बिना संलग्न हुए सुनो। कुंजी यह है कि आंतरिक वार्तालाप को इस भांति सुनो जैसे दो व्यक्तियों को बोलते हुए सुनते हो। तटस्थ रहो। संलग्न मत होओ, दिमाग का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को क्या बता रहा है इसे सुनो। जो भी आ रहा है उसे आने दो, उसे दबाओ मत; सिर्फ साक्षी रहो। तुमने वर्षों से जो भी कूड़ा इकट्ठा किया है वह निकलेगा। दिमाग को कभी इस कचरे को बाहर फेंकने की इजाजत नहीं दी गई है। एक बार मौका मिलने पर मन ऐसे दौड़ेगा जैसे लगाम छूटने पर घोड़ा भागता है।उसे भागने दो। तुम सिर्फ बैठो और अवलोकन करो। इस तरह सिर्फ देखना धीरज की कला है। तुम उस घोड़े पर सवार होना चाहोगे, उसे दिशा देना चाहोगे इधर या उधर क्योंकि यह तुम्हारी पुरानी आदत है। इस आदत को तोड़ने के लिए तुम्हें धीरज की जरूरत है। मन जहां भी जाए उसे सिर्फ देखना। इसमें कोई...
पशु समाजिक हो सकता है जैसे मनुष्य, या धार्मिक जैसे गाय-बकरा आदि। पर दार्शनिक पशु बस भैंस है। शायद ही किसी ने किसी भैंस को उपद्रव मचाते देखा हो। इसे देख कर किसी पीर-सन्यासी की याद आती है, जो जीवन के सुख और दुख से ऊपर उठ चुका है। तमाम दार्शनिक किताबें भैंस के अनमनी दार्शनिकता के आगे फिके पड़ जाती हैं। भैंस से मेरी पहली मुलाकात बचपन में हुई। बिहार में एक छोटा सा गाँव है,पटना से 30 किलोमीटर दूर है 'रसलपुर'। यही है मेरा गाँव। मेरे पापा ने अपना बचपन यहीं काटा था, और नौकरी लगने के बाद भी वो चाहते थे कि बच्चे गाँव से मानसिक रूप से ज्यादा दूर न चले जाएं। इसलिए हर छुट्टी में वहाँ जाते ही हमें गाँव के काम पकड़ा दिए जाते थे, जैसे घास काट के लाना, खेत में बाकी काम,भैंस को चराने ले जाना आदि। इसमें मेरा सबसे प्रिय काम रहा है भैंस चराना। गाँव में भैंसों और गायों को दोपहर में नदी के तरफ घास खिलाने ले जाया जाता है। इसे ही भैंस चराने ले जाना कहते हैं। उनके घास खाते वक़्त वहाँ एक व्यक्ति को खड़ा रहना पड़ता है कि जानवर किसी और के खेत में न घुस जाये। और अगर ऐसा हुआ तो उस रोज गांव में लड़ाई पक्की।...
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