कभी इतने ऊँचे मत होना कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ . न कभी इतने बुद्धिजीवी कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग . इतने इज़्ज़तदार भी न होना कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो . न इतने तमीज़दार ही कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी . इतने सभ्य भी मत होना कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से . न इतने सुथरे ही होना कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में . इतने धार्मिक मत होना कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ . न कभी इतने देशभक्त कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको . कभी इतने स्थायी मत होना कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी . और न कभी इतने भरे-पूरे कि किसी का प्रेम में बिलखना और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प। .
बचपन की यादों को, मैं भूला सकती नहीं। मां के आँचल की यादे, कभी भूल सकती नहीं। दादा दादी और नाना नानी, का लाड़ प्यार हमें याद है। वो चाची की चुगली, चाचा से करना। भाभी की शिकायत भैया से करना। बदले में पैसे पाना, आज भी याद है। और उस पैसे से, चाट खाना भी याद है। भाई बहिनों का प्यार, और लड़ना भी याद है। भैया की शादी का वो दृश्य, आज भी आंखों के समाने है। जिसमे भाभी की विदाई पर, उनका जोर से रोना याद है। खुदकी शादी और विदाई का, हर लम्हा याद आ रहा है। मां बाप के द्वारा दी गई, हिदायते और नसियाते। मैं आजतक नहीं भूली और न भूलूंगी। क्योंकि अपनी दुनियाँ को मैं खोकर आई हूँ। पर दिलमें नई उमंगे लेकर, साथ पिया के आई हूँ। जो अब है मेरी जिंदगी के आधार स्तम्भ। मानो मेरी जीवन का यही है अब संसार। छोड़कर माता पिता और, भाई बहिन को मैं। नये माता पिता नंद देवर, भाई बहिन जैसे पाये है। छोड़ छोटी सी दुनियाँ को, मैं बड़ी दुनियाँ में आई हूँ। अब जबावदारियों का बोझ, स्वंय के कंधों पर उठाई हूँ। क्योंकि दिया पिया ने मुझे इतना स्नेह प्यार जो। जिससे अब खुद की नई दुनियाँ बसाई हूँ। ...
सावन मनभावन हम सभी के जीवन में मनभावन सावन से जुड़ी कुछ खट्टी-मीठी यादें ,कुछ किस्से-कहानियाँ जरुर होते हैं । किसी दोस्त,परिवार या प्यार के साथ बीता कोई बरसात का दिन और कुछ नही तो बचपन में अपने शरारती मनभावन सावन दोस्तों के साथ मिलकर झमाझम बरसात में की गई ढेर सारी शैतानियाँ,इन्हें तो कोई भुला ही नही सकता ।ये टिप टिप करती बूँदें जाने क्या -क्या भूला बिसरा याद दिलाती हैं ! यादों का शहद घुला होता है इन बूंदों में ...! ये बूँदें बहुत कुछ कहती है गुनगुनाती है पर चौतरफा शोर से घिरे हुए हम इन्हे अनसुना कर देते है । ये और-और की तृष्णा औरों से ज्यादा जोड़ने की चाहत और बाहर -भीतर के शोर से घिरे हम जब अपनी ही आवाज़ को अनसुना कर देते है तो भला बूँदों की आवाज़ को कैसे सुनेंगे !! वरना कौन ऐसा है जिसे झमाझम बारिश को देख बचपन की शैतानियां याद ना आती हो ! बूंदों के हथेलियाँ को छूते ही यादों के सन्दूक खुद व खुद खुल जाते हैं । आज सावन को खिड़की से देखते हुए जब छन -छन करती बूँदों के सुर में पत्तों को थिरकते देखा तो अहसास हुआ कि जीवन की आपाधापी में जाने कब इतने व्यस्त...
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