रजनीगन्धा

रजनीगन्धा थी क्या तुम
पिछले जनम में
सोचता हूँ मैं यही
हर बार
तुमसे मिलकर लौटते हुए

पता है तुम्हें
कैसी सुगन्ध का लिहाफ़
उढा जाती हो तुम मुझे
सुवासित हो उठती है
देह मेरी - सांसें मेरी
लाचार सी हो जाती है
कार की परफ़्यूम भी
गन्ध से
तुम्हारी देह की

चिपक सी जाती है
छुवन तुम्हारी
मेरी उंगलियों की पोरों में
घुल सी जाती है
सुगन्ध तुम्हारी
मेरी सांसों में
और थमा सा रह जाता है
वो पल
तुम्हारे साथ गुज़रा हुआ

अटका सा रह जाता है
वो पल
मेरी शर्ट के कॉलर में
मेरी आँखों में
मेरी उंगलियों में
और मेरी सांसों में
रजनीगन्धा थी क्या तुम
पिछले जनम में

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