साठ सत्तर-90 के दशक की, यादें ये हैं पुरानी। गांव कस्बों के बचपन की, यारों ये है कहानी।। जर्जर सी शाला थी अपनी, फर्श था कच्चा, दीवारें उधड़ीं, गुरूजी के हाथों की छड़ी, ककहरा,पहाड़े और बारहखड़ी।। सावधान! विश्राम! की आवाज, सजगता की अलख जगाती। प्रार्थना पंक्ति की कतारें, अखाड़ा सी बन जातीं।। गोबर से फर्श लीपकर, टाटफट्टी बिछाते। हरी पत्तियों से घिस घिस, श्यामपट्ट चमकाते।। गुरूजी की छड़ी का, आतंक था भयंकर। शरारतों का भूत, जाता था झट उतर।। पालथी मार, सिर घुमा घुमा, पहाड़े याद किया करते। याद होने पर हाथ उठा, स्वगर्वित हो जाते ।। शोक सभा बाद मिली छुट्टी, दे जाती थीं खुशियां बड़ी। मासूम सा बालमन क्या जाने, जनम-मरण की धोखाधड़ी।। राष्ट्रीय त्यौहारों के अवसर पर, अनुशासन में बंध जाते। भाषण गीत ध्यान से सुनते, पा लड्डू हर्षाते।। जब भी नागपंचमी आती, स्लेट पे नागाकृति बनाते। फिर शाला में स्लेट सजाकर, दूध,फूल, बेलपत्ती चढ़ाते।। बैलों का पर्व, जब आता पोला, लकड़ी का घुड़ला सजाते। ठेठरे-खुरमे जेबों में भर, घुड़ले संग दौड़ लगाते।। भोले पार्वती का पर्व तीजा, रतजगा कर मनाते। अगली सुबह अलसाए नेत्रों से, शाला ...