पिता

 


पिता! तुम हिमालय से थे पिता 

कभी तो कितने विराट 

पिघलते हुए से कभी 

बुलाते अपनी दुर्गम चोटियों से 

भी और ऊपर

कि आओ- चढ़ आओ  


पिता तुममें कितनी थीं गुफाएँ 

कुछ गहरी सुरंग सी 

कुछ अँधेरी कितने रहस्य भरी 

कितने कितने बर्फीले रास्ते 

जाते थे तुम तक 


कैसे दीप्त हो जाते थे 

तुम पिता जब सुबह होती 

दोपहर जब कहीं सुदूर किसी 

नदी को छूकर दर्द से गीली हवाएँ आतीं

तुम झरनों से बह जाते 

पर शाम जब तुम्हारी चोटियों के पार

सूरज डूबता 

तब तुम्हें क्या हो जाता था पिता 

तुम क्यों आँख की कोरें छिपाते थे 


तुम हमारे भर नहीं थे पिता 

हाँ! चीड़ों से

याकों से

भोले गोरखाओं से

तुम कहते थे पिता- 'मै हूँ ' 

तब तुम और ऊँचा कर लेते थे खुद को 

पर जब हम थक जाते 

तुम मुड़कर पिट्ठू हो जाते 


विशाल देवदार से बड़े भैया 

जब चले गए थे घर छोड़कर 

तब तुम बर्फीली चट्टानों जैसे 

ढह गए थे  

रावी सिंधु सी बहनें जब बिदा हुई थीं 

फफककर रो पड़े थे तुम पिता

 

ताउम्र कितने कितने बर्फीले तूफान 

तुम्हारी देह से गुजरे 

पर हमको छू न सके

आज बरसों बाद 

जब मैं पिता हूँ 

मुझे तुम्हारा पिता होना 

बहुत याद आता है 

तुम! हिमालय से थे ...पिता! 

                                       

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