कभी-कभी कुछ रिश्तों में
"कभी-कभी कुछ रिश्तों में "
उन्हें ख़फ़ा हो फासलें बनाना और ,
मेरी गरज उन्हें कसकर थामना है ....
.उन्हें मेरी खामियाँ सरेआम करना है ,
मुझे अपनी खताओं पर विचारना है
मेरे हिस्से
सफाई देना ,
पछताना ,
मनाना ,
उदासी,
अकेलापन,
माफ़ीनामा,
अपेक्षाओं का ऊँचा कटघरा है .....
उनके हिस्से नाराज़गी
सवालों की फ़ेहरिश्त ,
फैसला ,
और हक़बाजी का
एक-एक ककहरा है ......
मेरी झोली में
हुक्मरानी ,
दरख़्वास्त ,
सिफारिशें ,
जी हजूरी ,
इल्ज़ाम और
उनकी दराज़ में खारिज़नामा है.....
उनकी फितरत जज्बातों को
चूर चूर बिखेरना ,
तो मेरी आदत टुकड़ों को
चुन चुन समेटना है......
उनके पलड़े में तमगे ,
गुरुर , शिकायत है ।
मेरे दामन में
फिक्र ,
तन्हाई और
उनसे मिलने वाली
जमानत है .......

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