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Showing posts from November, 2025

छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाएँ – हमें रुककर सोचना होगा

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पिछले कुछ दिनों में देशभर में 4 बच्चों ने स्कूल-संबंधी तनाव और अपमान के कारण अपनी जान दे दी—दिल्ली का कक्षा 10 छात्र, मध्य प्रदेश की कक्षा 11 छात्रा, राजस्थान का 9वीं का बच्चा और जयपुर की 9 साल की बच्ची। हर कहानी दर्दनाक है… और हर कहानी एक चेतावनी भी। सच्चाई यह है कि हमने अपने बच्चों को भावनात्मक रूप से बहुत कमजोर बना दिया है। पहले शिक्षक का वाक्य—“तू गधा है”—सिर्फ टोकना माना जाता था। आज वही बात पूरी कक्षा में बोल दी जाए, तो बच्चा anxiety में चला जाता है। क्यों? क्योंकि “शिक्षक की छड़ी हम पहले ही छीन चुके हैं।” अब शिक्षक हर शब्द बोलने से डरते हैं—कहीं शिकायत न हो जाए, कहीं वायरल न हो जाए। शिक्षक धीरे-धीरे गुरु नहीं, “service-sector employee” बन रहे हैं। लेकिन दोष सिर्फ शिक्षकों का नहीं है। घर में माता-पिता भी “five-star steward” बन चुके हैं— हर मांग पूरी करना, हर छोटी सी असफलता से बचाना, हर चीज़ में show-off… यही बच्चों का मानसिक रिज़र्व कमजोर कर देता है। हम सब मिलकर अपने बच्चों को ऐसे नाजुक बना चुके हैं कि एक ताना, एक डांट, एक रिपोर्ट कार्ड… और वे टूट जाते हैं। समय आ गया है कि— ✔ शिक्...

पिता

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 एक बार मैं अपने एक परिचित से बात कर रहा था । उन्होंने मुझे बताया कि एक समय उनका परिवार अपने क्षेत्र का नामचीन परिवार हुआ करता था , किसी तरह की कोई कमी नहीं थी । तभी अचानक से उनके पिता जी की मृत्यु हों गई ,उस समय वो बहुत छोटे थे और परिवार में एक छोटा भाई भी था । पिता की मृत्यु के बाद चाचाओं ने अच्छा बर्ताव नहीं किया और ख़ानदानी संपत्ति में से भी कुछ नहीं मिला । यहाँ तक की पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई । उसके बाद माताजी ने अथक परिश्रम करके बच्चों को पढ़ाया लिखाया और काबिल बनाया । मित्रों , अक्सर हमारे परिवारों में पिता की भूमिका अंडररेटेड रहती है । मैं अक्सर ये कहता हूँ कि एक घर बनाने के किए दीवार भी चाहिए और छत भी चाहिए । माँ घर की दीवार होती है जो चारों ओर से हमे अपने आवरण में रखती है पर पिता घर की छत होता है । उस छत पर अक्सर हमारा ध्यान नहीं जाता पर जब वो छत नहीं रहती तब पता चलता है कि अब तो बारिश भी भिगा रही है , ठंड भी गला रही है और गर्मी भी जला रही है । सर पर पिता का साया है तो किसी की हिम्मत नहीं है तुम्हारी तरफ़ आँख उठाने की पर पिता के हटते ही पता चलता है कि दुनिया तो हमे नोचन...

अब न रहे वो सुननेवाले’, इसलिए नहीं गढ़ी जाती अब वो पाठशाला

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 आज की प्राथमिक शिक्षा बस स्मार्ट क्लास और स्मार्ट बोर्ड की सोशेबाजी रह गई है। बच्चा किताब से कितना जुड़ पाया, यह देखने वाला कोई नहीं, मगर प्रोजेक्टर ठीक से चल रहा है या नहीं, यही सबसे बड़ा मुद्दा है। एक समय था जब प्राथमिक शिक्षक बच्चों को अक्षर सिखाने से पहले उन्हें मिट्टी में लोट-पोट करवाते थे, ताकि वे धरती से जुड़ना सीखें। आज के शिक्षक को मजबूरी है—“एप डाउनलोड कराओ, रिपोर्ट अपलोड कराओ”। पुरानी पाठशालाओं में तख्ती पर लिखे अक्षर पीढ़ियों तक जीवन का पाठ पढ़ा देते थे। आज की किताबें ‘एक सत्र, एक परीक्षा’ तक ही सीमित हैं। शिक्षा का उद्देश्य कभी मनुष्य गढ़ना था, अब सिर्फ रैंकिंग और रिजल्ट रह गया है। बच्चे पढ़ाई में डूबते कम, और कॉपी चेकिंग व टेस्टिंग के बोझ में घुटते ज़्यादा हैं। आधुनिक शिक्षा तो किसी ब्रूटस के खंजर की तरह है—बच्चों के निष्कलुष मन में ज्ञान नहीं, बल्कि अंकों का दबाव घोंप देती है। कभी पंचतंत्र की कहानियाँ सुनो, कभी कबीर के दोहे या तेनालीराम की चतुराई—यही प्राथमिक शिक्षा का आधार थे। इनसे सोचने की शक्ति, हँसने की कला और जीने का साहस मिलता था। आज का ‘एजुकेशन सिस्टम’ मेहनत ...

एक छोटा परीक्षण

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 कई बीमारियाँ वास्तव में बीमारियाँ नहीं होतीं, बल्कि सामान्य उम्र संबंधी परिवर्तन होती हैं। बीजिंग के एक अस्पताल के निदेशक ने बुजुर्गों के लिए पाँच महत्वपूर्ण सलाहें दी हैं — आप बीमार नहीं हैं, आप बस बूढ़े हो रहे हैं  । बहुत-सी बीमारियाँ जिन्हें आप बीमारी समझते हैं, वे वास्तव में शरीर के वृद्ध होने के संकेत हैं । 1- कमज़ोर याददाश्त यह अल्ज़ाइमर नहीं है, बल्कि बुजुर्ग मस्तिष्क की एक स्व-सुरक्षात्मक प्रक्रिया है। डरिए मत — यह बीमारी नहीं, मस्तिष्क की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया है। यदि आप चाबी कहाँ रखी भूल जाएँ, लेकिन थोड़ी देर में ढूँढ लें — तो यह डिमेंशिया नहीं है। 2- धीरे चलना या पैर डगमगाना यह लकवा नहीं है, बल्कि मांसपेशियों के क्षीण होने का परिणाम है। इसका इलाज दवा नहीं, बल्कि व्यायाम है। 3- अनिद्रा (नींद न आना) यह बीमारी नहीं है, बल्कि मस्तिष्क अपनी लय बदल रहा है। यह नींद की संरचना में बदलाव है। नींद की गोलियाँ बिना सोचे-समझे न लें — लंबे समय तक इन पर निर्भरता से गिरने, स्मरणशक्ति घटने आदि का जोखिम बढ़ता है। बुजुर्गों के लिए सबसे अच्छी नींद की दवा है – धूप लेना और नियमित दिनचर...