छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाएँ – हमें रुककर सोचना होगा
पिछले कुछ दिनों में देशभर में 4 बच्चों ने स्कूल-संबंधी तनाव और अपमान के कारण अपनी जान दे दी—दिल्ली का कक्षा 10 छात्र, मध्य प्रदेश की कक्षा 11 छात्रा, राजस्थान का 9वीं का बच्चा और जयपुर की 9 साल की बच्ची। हर कहानी दर्दनाक है… और हर कहानी एक चेतावनी भी।
सच्चाई यह है कि हमने अपने बच्चों को भावनात्मक रूप से बहुत कमजोर बना दिया है।
पहले शिक्षक का वाक्य—“तू गधा है”—सिर्फ टोकना माना जाता था।
आज वही बात पूरी कक्षा में बोल दी जाए, तो बच्चा anxiety में चला जाता है।
क्यों? क्योंकि “शिक्षक की छड़ी हम पहले ही छीन चुके हैं।”
अब शिक्षक हर शब्द बोलने से डरते हैं—कहीं शिकायत न हो जाए, कहीं वायरल न हो जाए।
शिक्षक धीरे-धीरे गुरु नहीं, “service-sector employee” बन रहे हैं।
लेकिन दोष सिर्फ शिक्षकों का नहीं है।
घर में माता-पिता भी “five-star steward” बन चुके हैं—
हर मांग पूरी करना, हर छोटी सी असफलता से बचाना, हर चीज़ में show-off…
यही बच्चों का मानसिक रिज़र्व कमजोर कर देता है।
हम सब मिलकर अपने बच्चों को ऐसे नाजुक बना चुके हैं कि
एक ताना, एक डांट, एक रिपोर्ट कार्ड… और वे टूट जाते हैं।
समय आ गया है कि—
✔ शिक्षक को डर से नहीं, संवेदनशीलता से काम करने का माहौल मिले
✔ माता-पिता बच्चों को मजबूत बनाएं… हर कमजोरी न ढकें
✔ स्कूल मानसिक स्वास्थ्य की निगरानी को पढ़ाई जितनी प्राथमिकता दें
✔ और सबसे महत्वपूर्ण—बच्चों को “असफल होना”, “आलोचना स्वीकार करना” और “फिर उठना” सिखाया जाए
क्योंकि बच्चे अचानक नहीं टूटते…
उन्हें धीरे-धीरे तोड़ा जाता है—घर, स्कूल और समाज—तीनों मिलकर।

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