पिता

 एक बार मैं अपने एक परिचित से बात कर रहा था ।

उन्होंने मुझे बताया कि एक समय उनका परिवार अपने क्षेत्र का नामचीन परिवार हुआ करता था , किसी तरह की कोई कमी नहीं थी ।

तभी अचानक से उनके पिता जी की मृत्यु हों गई ,उस समय वो बहुत छोटे थे और परिवार में एक छोटा भाई भी था ।

पिता की मृत्यु के बाद चाचाओं ने अच्छा बर्ताव नहीं किया और ख़ानदानी संपत्ति में से भी कुछ नहीं मिला ।

यहाँ तक की पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई ।

उसके बाद माताजी ने अथक परिश्रम करके बच्चों को पढ़ाया लिखाया और काबिल बनाया ।


मित्रों , अक्सर हमारे परिवारों में पिता की भूमिका अंडररेटेड रहती है ।

मैं अक्सर ये कहता हूँ कि एक घर बनाने के किए दीवार भी चाहिए और छत भी चाहिए ।

माँ घर की दीवार होती है जो चारों ओर से हमे अपने आवरण में रखती है पर पिता घर की छत होता है ।

उस छत पर अक्सर हमारा ध्यान नहीं जाता पर जब वो छत नहीं रहती तब पता चलता है कि अब तो बारिश भी भिगा रही है , ठंड भी गला रही है और गर्मी भी जला रही है ।


सर पर पिता का साया है तो किसी की हिम्मत नहीं है तुम्हारी तरफ़ आँख उठाने की पर पिता के हटते ही पता चलता है कि दुनिया तो हमे नोचने के लिए बैठी थी ये तो हमारे पिता थे जो हमे हर बला से बचा कर रखे हुए थे ।


माँ अगर स्नेह है तो पिता सुरक्षा है ।

और जीवन यापन के लिए स्नेह के साथ सुरक्षा भी जरूरी है ।

स्नेह यदि यह सुनिश्चित करता है कि जीवन सरस और अर्थपूर्ण रहे तो सुरक्षा ये सुनिश्चित करती है कि जीवन रहे ।


हाँ होता है पिताओं के अंदर ये मैनुफैक्चरिंग डिफेक्ट कि वो अपने बच्चे को मेरा लड्डू , मेरा बाबू , मेरा गुड्डा नहीं बोल पाते , खास कर पुरानी पीढ़ी के बाप ।

वो नहीं लगा पाते अपने बच्चों को गले से ना ही बता पाते उन्हें कि वो उनसे कितना प्यार करते हैं ।


वो अधिकतर बच्चों को डाँटते या नसीहतें ही देते दिखायी देते हैं पर एक आदर्श बचपन के लिए जहाँ माँ का मीठा दुलार जरूरी है वहीं पिता का कठोर मार्ग दर्शन भी जरूरी है ।


बस वो घटना सुन कर मन में ये विचार आ गए तो आपके साथ साँझा


करने का मन कर गया ।

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