अब न रहे वो सुननेवाले’, इसलिए नहीं गढ़ी जाती अब वो पाठशाला

 आज की प्राथमिक शिक्षा बस स्मार्ट क्लास और स्मार्ट बोर्ड की सोशेबाजी रह गई है। बच्चा किताब से कितना जुड़ पाया, यह देखने वाला कोई नहीं, मगर प्रोजेक्टर ठीक से चल रहा है या नहीं, यही सबसे बड़ा मुद्दा है।


एक समय था जब प्राथमिक शिक्षक बच्चों को अक्षर सिखाने से पहले उन्हें मिट्टी में लोट-पोट करवाते थे, ताकि वे धरती से जुड़ना सीखें। आज के शिक्षक को मजबूरी है—“एप डाउनलोड कराओ, रिपोर्ट अपलोड कराओ”।


पुरानी पाठशालाओं में तख्ती पर लिखे अक्षर पीढ़ियों तक जीवन का पाठ पढ़ा देते थे। आज की किताबें ‘एक सत्र, एक परीक्षा’ तक ही सीमित हैं।


शिक्षा का उद्देश्य कभी मनुष्य गढ़ना था, अब सिर्फ रैंकिंग और रिजल्ट रह गया है। बच्चे पढ़ाई में डूबते कम, और कॉपी चेकिंग व टेस्टिंग के बोझ में घुटते ज़्यादा हैं।


आधुनिक शिक्षा तो किसी ब्रूटस के खंजर की तरह है—बच्चों के निष्कलुष मन में ज्ञान नहीं, बल्कि अंकों का दबाव घोंप देती है।


कभी पंचतंत्र की कहानियाँ सुनो, कभी कबीर के दोहे या तेनालीराम की चतुराई—यही प्राथमिक शिक्षा का आधार थे। इनसे सोचने की शक्ति, हँसने की कला और जीने का साहस मिलता था।


आज का ‘एजुकेशन सिस्टम’ मेहनत क्यों करे? हमारी ज़द्दोजहद तो बस पैरेंट्स ग्रुप पर सर्टिफिकेट भेजने तक है। बच्चों को कहानी सुनाने के लिए अब किसके पास वक़्त है?

या शायद शिक्षाविदों ने बच्चन की मधुशाला पढ़ ली और जान गए हैं—‘अब न रहे वो सुननेवाले’, इसलिए नहीं गढ़ी जाती अब वो पाठशाला


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