दस ग्राम श्मशान साथ ले आना चाहिए।




आपने कभी चिता जलते देखी है ? चिता पूरी तरह से जलने में ढाई से तीन घंटे का समय लगता है, यह समय मृत शरीर के वजन, उपयोग की गई लकड़ियों की मात्रा, प्रयोग की गई सामग्री घी आदि और मौसम की स्थिति पर भी निर्भर कर सकता है।


शुरुआती समय में चिता के आसपास व्यक्ति की प्रतिष्ठा के अनुसार भीड़ मौजूद रहती है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है वैसे-वैसे भीड़ कम होती चली जाती है, लोग अपनी उपस्थिति लगाकर अपना चेहरा दिखाकर जाते रहते हैं, अगर अंतिम संस्कार के लिए कई लोग एक साथ किसी दूर के स्थान से, एक ही वाहन (गाड़ी) से आएं हैं तो ऐसे में लोग उपस्थित रहते हैं, क्योंकि उनके पास वापस जाने का कोई साधन नहीं होता, वरना अंत के दस-पंद्रह मिनट तक मुश्किल से तीन-चार लोग ही श्मशान घाट में बचते हैं।


अंतिम तीन-चार लोग वो होते हैं जो उस मृत व्यक्ति के एकदम करीबी होते हैं यानी उसका पुत्र, पुत्र ना होने की स्थिति में वह व्यक्ति जो अंतिम संस्कार कर रहा होता है, उसके सगे संबंधी उसके भाई उसके अन्य परिवार के लोग, या फिर वो लोग जिनका उन उपस्थित लोगों से निकटतम संबंध (स्वार्थ) होता है।


स्पष्ट शब्दों में कहें तो जिसका मृत व्यक्ति से जितना स्वार्थ जुड़ा होता है वो उतना दुःखी होता है, जैसे-जैसे स्वार्थ का स्तर घटता जाता है वैसे वैसे दुःख की मात्रा भी घटती चली जाती है, खुद से प्रश्न करके देखिए हर दिन सिर्फ एक शहर में कितने लोगों की मृत्यु होती है और हम कितने लोगों की मृत्यु पर उदास होते हैं, नहीं हम हर मृत्यु पर उदास नहीं होते, हर मृत्यु पर उदास होना तो दूर हर मृत्यु पर तो हम संवेदना भी प्रकट नहीं करते, हम उन्हीं लोगों की मृत्यु पर उदास होते हैं या संवेदना प्रकट करते हैं, जिनसे हमें प्रेम (हमारा स्वार्थ जुड़ा) होता है।


अंतिम संस्कार में अंत तक रुकने के पीछे का एक कारण कहीं ना कहीं व्यक्ति का डर भी होता है, यानी कई संस्कृतियों में अंतिम संस्कार को धर्म से जोड़ा गया है, सनातन संस्कृति (हिंदू धर्म) की बात करें तो गरुड़ पुराण के अनुसार, अनुचित अंतिम संस्कार से आत्मा को मोह के कारण परलोक गमन में परेशानी हो सकती है, जिससे वे प्रेत योनि में रहकर परिवार को पीड़ित कर सकती हैं।


सांस्कृतिक डर के साथ एक सामाजिक डर भी है, यानी लोग इस बात से भी डरते हैं अगर हमनें विधिवत चीजों को पूर्ण नहीं किया तो हमारी बदनामी होगी समाज में थू-थू होगी, लोग हमारे और हमारे परिवार के बारे में क्या-क्या कहेंगे।


इसी सामाजिक डर और दिखावे की वजह से ब्रह्मभोज (मृत्युभोज) जैसा पारंपरिक कर्मकांड एक सामाजिक कुप्रथा में बदल गया, जिसकी वजह से कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों पर ना सिर्फ भारी कर्ज का बोझ पड़ता है बल्कि साधारण परिवार दरिद्र हो जाते हैं, ख़ैर यह एक अलग चर्चा का विषय है।


मेरा मानना है हर व्यक्ति को दिन में एक बार, आँखें बंद करके कम से कम पांच से दस मिनट अपनी मृत्यु के बारे में विचार कर लेना चहिए, ताकि उसके अंदर जन्म ले रहे अहंकार का समय-समय पर अंतिम संस्कार हो सके।


व्यक्ति के लिए अगर संभव हो तो उसे दो तीन महीने में एक बार, शमशान घाट में जाकर जलती चिता के दर्शन भी कर ही लेने चाहिए, ताकि उसे याद रहे इस भागदौड़ की परिणति क्या है, सोचकर देखिए जो व्यक्ति तीन से चार घंटे में राख में बदल जाता है, वो तीन घंटे पहले, तीन दिन पहले, तीन सप्ताह पहले, तीन माह पहले या तीन साल पहले किस अहंकार में डूबा हुआ होता है। समाज में मान सम्मान पाने के लिए कितने जोड़ तोड़ कितने षड्यंत्र करता है। 


यह बात सत्य है की पूर्ण वैरागी होकर तो इस नश्वर संसार में नहीं जिया जा सकता, क्योंकि ऐसी स्थिति में व्यक्ति पूरी ईमानदारी से सांसारिक जिम्मेदारियों का निर्वाहन नहीं कर पाएगा, ना ही अन्य लोगों के साथ तालमेल बैठा पाएगा। लेकिन इसके बावजूद अगर कभी किसी व्यक्ति को शमशान घाट जाने का अवसर प्राप्त हो या उसके मन में शमशान घाट जाने का भाव जगे, तो व्यक्ति को वहां से दस ग्राम श्मशान जरूर साथ ले आना चाहिए।



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