हमारे जाने के बाद

 हमारे जाने के 100 साल बाद


शायद किसी को हमारा नाम भी याद नहीं रहेगा... तो फिर इतनी भागदौड़ किसलिए?


दोस्त, आज से 100 साल बाद हम इस दुनिया में नहीं होंगे। हम अपने अपनों के साथ मिट्टी में सो चुके होंगे। जिस घर को बनाने के लिए हमने दिन-रात मेहनत की... कितनी कुर्बानियाँ दीं... कितनी रातें जागकर काम किया... उसी घर में तब कुछ और लोग रह रहे होंगे।


आज जिन चीज़ों को हम "ये मेरा है" कहकर दिल से लगाते हैं, वे सब किसी और के पास होंगी। हमारी अगली पीढ़ी... शायद हमारा नाम भी ठीक से याद न रख पाए। हम में से कितने लोग अपने परदादा या उनके पिता का नाम जानते हैं?


हमारे जाने के बाद कुछ साल लोग हमें याद करेंगे... फोटो देखेंगे... बातें करेंगे... लेकिन धीरे-धीरे सब धुंधला हो जाएगा। एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे अस्तित्व का कोई निशान भी नहीं बचेगा। तब सवाल उठता है - हम इतना क्यों लड़ते हैं? इतना अहंकार किसलिए? इतनी चिंता, तनाव और प्रतिस्पर्धा क्यों?


हम "सब कुछ पाने" की दौड़ में लगे रहते हैं... लेकिन क्या सच में वही सबसे ज़रूरी है? कितनी बार हमने घूमने का प्लान टाल दिया? कितनी बार माँ-बाप को गले लगाने का मौका छोड़ दिया? कितनी बार बच्चों के साथ बैठकर खुलकर हँसने से खुद को रोका ?


8.5 ह ज़िंदगी आखिर में पैसों से नहीं मापी जाती... वो मापी जाती है उन छोटे-छोटे पलों से न दी गई झप्पियाँ, न की गई सैर, न बोले गए प्यार भरे शब्द । इसलिए आज से थोड़ा बदलें... अपनों से खुलकर प्यार करें... दिल की बात कहें... छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढें।


क्योंकि आखिर में याद यही रहता है कि हमने कितना कमाया नहीं... बल्कि कितना प्यार दिया और पाया। याद रखिए हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाएंगे। इसलिए आज का पल जी लीजिए।


क्या मैं गलत कह रहा हूँ...?

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