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ढाई हजार साल पुरानी कही बात जो आज बेहद प्रासंगिक है

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 महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा था- "बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहने की कोशिश, कई बार उन्हें आपसे दूर कर देती है।" यह वाक्य सुनने में कठोर लग सकता है, लेकिन जीवन के लंबे अनुभवों से छनकर निकला एक गहरा सत्य है। कहानी है ली वेई नाम के एक वृद्ध व्यक्ति की। उसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों के लिए समर्पित कर दिया। दिन-रात मेहनत की, अपनी इच्छाओं को पीछे रखा, अपने सपनों को छोटा किया ताकि बच्चों के सपने बड़े हो सकें। जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए, अपने परिवार और जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए, तो ली वेई ने सोचा कि अब जीवन की संध्या उनके बीच प्रेम और अपनत्व में बीतेगी। उसने अपना घर बेच दिया और बेटे के साथ रहने चला गया। लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि भरे हुए घर में भी उसके हिस्से का एकांत बढ़ता जा रहा है। बच्चे अपने काम में व्यस्त थे, बहू अपनी जिम्मेदारियों में, पोते-पोतियाँ अपनी दुनिया में। उसकी बातें आधी सुनी जातीं, उसके सुझाव अनचाही सलाह लगने लगे और उसकी उपस्थिति धीरे-धीरे एक आवश्यकता से अधिक एक अतिरिक्त जिम्मेदारी जैसी महसूस होने लगी। वह जितना निकट आ...