ढाई हजार साल पुरानी कही बात जो आज बेहद प्रासंगिक है

 महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा था- "बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहने की कोशिश, कई बार उन्हें आपसे दूर कर देती है।"


यह वाक्य सुनने में कठोर लग सकता है, लेकिन जीवन के लंबे अनुभवों से छनकर निकला एक गहरा सत्य है।


कहानी है ली वेई नाम के एक वृद्ध व्यक्ति की। उसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों के लिए समर्पित कर दिया। दिन-रात मेहनत की, अपनी इच्छाओं को पीछे रखा, अपने सपनों को छोटा किया ताकि बच्चों के सपने बड़े हो सकें। जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए, अपने परिवार और जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए, तो ली वेई ने सोचा कि अब जीवन की संध्या उनके बीच प्रेम और अपनत्व में बीतेगी।


उसने अपना घर बेच दिया और बेटे के साथ रहने चला गया। लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि भरे हुए घर में भी उसके हिस्से का एकांत बढ़ता जा रहा है। बच्चे अपने काम में व्यस्त थे, बहू अपनी जिम्मेदारियों में, पोते-पोतियाँ अपनी दुनिया में। उसकी बातें आधी सुनी जातीं, उसके सुझाव अनचाही सलाह लगने लगे और उसकी उपस्थिति धीरे-धीरे एक आवश्यकता से अधिक एक अतिरिक्त जिम्मेदारी जैसी महसूस होने लगी। वह जितना निकट आने की कोशिश करता, रिश्ते उतने ही दूर होते जाते।


व्यथित होकर वह कन्फ्यूशियस के पास पहुँचा और पूछा कि "गुरुजी, मैंने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के लिए दे दी। फिर आज मैं उनके बीच होकर भी अकेला क्यों हूँ?"


कन्फ्यूशियस ने उत्तर देने के बजाय उसे तीन दृश्य दिखाए।


उन्होंने पानी से भरा एक पात्र सामने रखकर पूछा, "यदि इसमें और पानी डाल दिया जाए तो क्या होगा?"


ली वेई बोला, "वह छलक जाएगा।"


कन्फ्यूशियस ने कहा, "#रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। हर जीवन का अपना एक संतुलन होता है। जहाँ सब कुछ पहले से भरा हो, वहाँ स्वयं को केंद्र बनाने की कोशिश अक्सर संतुलन बिगाड़ देती है।"


फिर उन्होंने पास खड़े दो पेड़ों की ओर इशारा किया।


"यदि दो पेड़ बहुत पास-पास उगें तो क्या होगा?"


"वे एक-दूसरे की वृद्धि रोक देंगे और कमजोर हो जाएँगे।" ली वेई ने उत्तर दिया।


कन्फ्यूशियस मुस्कराए, "#रिश्ते में प्रेम के लिए निकटता चाहिए, लेकिन संबंधों के स्वस्थ बने रहने के लिए थोड़ी दूरी और एक-दूसरे को अपनी जगह देना भी उतना ही आवश्यक है।"


अंत में उन्होंने मुट्ठी में रेत भर ली।


"यदि इसे कसकर पकड़ा जाए तो?"


"रेत उँगलियों के बीच से फिसल जाएगी।"


कन्फ्यूशियस बोले, "#रिश्ते भी ऐसे ही हैं। प्रेम अधिकार से नहीं, स्वतंत्रता से फलता-फूलता है। जितना उसे बाँधने की कोशिश करोगे, वह उतना ही दूर जाएगा।"


फिर उन्होंने एक प्रश्न पूछा कि "जब तुम कोई पेड़ लगाते हो, तो क्या यह सोचकर लगाते हो कि वह एक दिन तुम्हें छाया देगा?"


ली वेई ने कहा, "नहीं, मैं उसे इसलिए लगाता हूँ कि वह बढ़े, फले-फूले। छाया तो उसका उपहार है।"


कन्फ्यूशियस बोले कि "तो फिर अपनी औलाद से अलग उम्मीद क्यों रखते हो? तुमने उन्हें अपने लिए नहीं, जीवन के लिए तैयार किया है।"


यह सुनकर ली वेई की आँखें नम हो गईं। वह अपने नगर लौट आया। उसने एक छोटा-सा घर लिया, लोगों की मदद करना शुरू किया, बच्चों को कहानियाँ सुनाने लगा, पेड़ लगाने लगा, समाज के काम आने लगा। धीरे-धीरे लोग उसे सम्मान से "मास्टर ली" कहने लगे।


और उसने जीवन का एक बड़ा रहस्य समझ लिया कि जितना उसने ध्यान और प्रेम की मांग करना छोड़ा, उतना ही अधिक प्रेम और सम्मान उसे मिलने लगा।


कुछ समय बाद बेटे का पत्र आया कि "बाबा, आपकी बहुत याद आती है। बच्चे आपके बारे में पूछते रहते हैं। कुछ दिन हमारे साथ बिताने आइए।"


इस बार जब वह पहुँचा, तो उसका स्वागत एक जिम्मेदारी की तरह नहीं, बल्कि एक प्रिय अतिथि की तरह हुआ। तब उसे समझ आया कि प्रेम माँगा नहीं जाता, कमाया भी नहीं जाता; प्रेम तो वहाँ लौटकर आता है जहाँ उसे स्वतंत्र रहने की जगह मिलती है।


बुढ़ापे में माता-पिता का साथ मिलना निस्संदेह औलाद की ख़ुशनसीबी है, लेकिन रिश्तों की सबसे सुंदर निकटता वही होती है जिसमें प्रेम हो, सम्मान हो, अपनी अपनी जगह हो और एक-दूसरे को साँस लेने की आज़ादी भी हो।


क्योंकि अंततः रिश्तों का सबसे बड़ा सत्य यही है कि पेड़ को जड़ों से बाँधकर नहीं, खुला आकाश देकर बड़ा किया जाता है और बच्चों को अपने लिए नहीं, दुनिया के लिए पाला जाता है।





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