जब कुर्सी रह जाती है, दिमाग चला जाता है

 


————————————————— बचपन से एक बात समझाई गई थी कि किसी भी काम को करने के लिए सबसे जरूरी चीज दिमाग है। शरीर थक जाए तो आदमी आराम कर सकता है। उम्र ज्यादा हो जाए तो आदमी धीमा चल सकता है। लेकिन अगर दिमाग साथ छोड़ दे तो आदमी खुद भी खतरे में होता है और उसके भरोसे बैठे लोग भी।


बचपन में यह बात सिर्फ घर की लगती थी। बड़ा हुआ तो समझ में आया कि यह सिर्फ घर की नहीं, पूरे देश की भी बात है।

कुछ दिन पहले एक डॉक्टर मित्र बता रहे थे कि डिमेंशिया नाम की बीमारी बड़ी अजीब होती है। आदमी चलता फिरता रहता है, बोलता भी रहता है। कभी-कभी तो बिल्कुल सामान्य लगता है। लेकिन धीरे धीरे उसकी स्मृति कमजोर होने लगती है। उसे याद नहीं रहता कि उसने अभी क्या कहा, क्या किया, किससे मिला। वह एक ही बात बार-बार दोहराने लगता है। फैसले गड़बड़ होने लगते हैं।


डॉक्टर ने कहा कि परिवारों में यह बीमारी बड़ी कठिन स्थिति पैदा कर देती है। घर के लोग समझ जाते हैं कि अब बुजुर्ग को आराम देना चाहिए। गाड़ी की चाबी उनसे ले ली जाती है। बैंक का काम बेटा या बेटी संभाल लेते हैं। धीरे धीरे जिम्मेदारियां बदल जाती हैं।

यानी परिवार मान लेता है कि अब निर्णय लेने का समय किसी और का है।


लेकिन राजनीति में मामला उल्टा है।

यहां अक्सर तब तक कुर्सी नहीं छूटती, जब तक कुर्सी खुद गिर न जाए।


भारत के संविधान को देखिए। सांसद बनने के लिए कुछ शर्तें हैं। उम्र होनी चाहिए। नागरिकता होनी चाहिए। और अगर अदालत किसी को अस्वस्थ मस्तिष्क का घोषित कर दे, तभी वह अयोग्य माना जाएगा।


समस्या यह है कि अदालत तब तक किसी को अस्वस्थ मस्तिष्क का घोषित नहीं करती, जब तक मामला अदालत में जाए नहीं। और मामला अदालत में जाता ही नहीं, क्योंकि राजनीति में लोग बीमारी से ज्यादा कुर्सी को बचाते हैं।


मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के मामले में तो कहानी और दिलचस्प हो जाती है।

कानून कहता है कि जब तक बहुमत आपके साथ है, आप पद पर बने रह सकते हैं।


यानी डॉक्टर का प्रमाणपत्र नहीं, विधायकों और सांसदों की गिनती कुर्सी तय करती है।


जरा कल्पना कीजिए, एक बस चल रही है। उसका ड्राइवर धीरे धीरे अपनी याददाश्त खो रहा है। रास्ता भूलने लगा है। ब्रेक कब लगाना है, यह समझने में देर हो रही है। ऐसे में बस में बैठे मुसाफिर क्या करेंगे?

ड्राइवर को आराम देंगे या ताली बजाते रहेंगे कि नहीं नहीं, आप ही चलाइए?


परेशान मत होइए। ऐसा कहीं हो नहीं रहा। मैंने सिर्फ कल्पना की है।

और आप यह भी मत सोचिए कि  किसी एक नेता की तरफ इशारा कर रहे हैं। असल में दुनिया के कई देशों में इस पर गंभीर बहस हुई है। कई जगह संवैधानिक व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। लेकिन हमारे यहां यह सवाल पूछना भी लगभग बदतमीजी माना जाता है।

हम मान कर चलते हैं कि कुर्सी पर बैठा व्यक्ति खुद तय करेगा कि वह कब तक बैठ सकता है।


सवाल यह नहीं है कि किसी को डिमेंशिया है या नहीं।

सवाल यह है कि अगर कभी ऐसा हो जाए तो लोकतंत्र के पास उससे निपटने की कोई साफ व्यवस्था है या नहीं।

मन में एक और सवाल उग रहा है इसलिए पूछ रहा हूं। मान लीजिए, सिर्फ कल्पना कीजिए, अगर किसी मुख्यमंत्री को डिमेंशिया हो जाए तो उसे खपाने के लिए क्या उसे राज्य सभा में भेज देना उचित होगा?


राज्य सभा क्या किसी के पिताजी का कारखाना है, जहां लाचार बेटे को एक कमरे में बिठा दिया जाए कि बैठो बेटा, आराम करो, किसी को फर्क नहीं पड़ेगा?


आप जरा यह भी जान लीजिए कि राज्य सभा में भेजे जाने का मतलब क्या होता है।

एक सांसद को हर महीने करीब 1.24 लाख रुपए वेतन मिलता है। कांस्टीट्यूएंसी भत्ता लगभग 70 हजार रुपए। ऑफिस खर्च करीब 60 हजार रुपए। संसद में बैठने का भत्ता अलग, हर दिन 2,500 रुपए। दिल्ली में मुफ्त मकान। अगर मकान न लें तो करीब दो लाख रुपए प्रति माह हाउसिंग अलाउंस। मुफ्त हवाई यात्रा। फर्स्ट क्लास ट्रेन की पूरी तरह मुफ्त यात्रा। सड़क यात्रा का भत्ता।


अभी रुकिए मत।

पचास हजार यूनिट बिजली मुफ्त। चार हजार किलोलीटर पानी मुफ्त। साल भर में डेढ़ लाख रुपए तक फोन और इंटरनेट का खर्चा। खुद और परिवार के लिए बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज।


और आखिर में यह भी सुन लीजिए कि अगर कोई सांसद सिर्फ एक कार्यकाल भी पूरा कर ले, यानी छह साल, तो उसे जीवन भर पेंशन मिलती रहती है। हर अतिरिक्त साल पर वह पेंशन बढ़ती भी जाती है।


अब जरा दिल पर हाथ रख कर सोचिए।

ये सारी सुविधाएं किसके पैसों से चलती हैं?

सरकार के?

नहीं।


सरकार का पैसा भी आखिर आता कहां से है?

आपकी जेब से। मेरी जेब से। हमारे टैक्स से।


इसलिए सवाल यह नहीं है कि सांसद को इतना पैसा क्यों मिलता है।

सवाल यह है कि जो व्यक्ति काम करने की क्षमता खो चुका हो, या जिसकी इच्छा ही काम करने की न हो, उसे संसद में भेजना क्या जनता के साथ न्याय है?


राज्य सभा लोक सेवा का मंच है या राजनीतिक पार्किंग?


सांसद कानून बनाते हैं। सरकार से सवाल पूछते हैं। जनता की समस्याएं उठाते हैं। लेकिन अगर किसी को सिर्फ साइड लगाने के लिए सांसदी दे दी जाए, तो सवाल तो पूछा ही जाएगा। और शायद पूछा भी जाना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में कुर्सी बचाने से ज्यादा जरूरी है दिमाग बचा रहना।

वरना एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब कुर्सी तो रह जाएगी, लेकिन उसे चलाने वाला दिमाग कहीं और चला जाएगा।

और तब सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि हम सब उस बस में बैठे क्यों रहे?


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