अकेले खाता है वह चोर है।
आप किसी भी शहर में जाएं, किसी भी गाँव-खेड़े में हों, वहां सुबह के समय होटल में नाश्ता करने वालों की भीड़ दिख जाएगी. जलेबी, समोसा, आलूबड़ा, पकोड़ा, पोहा, पूरी-सब्जी और गर्म चाय लेते हुए लोग आपको हर जगह दिखाई देंगे. इनमें ९९% पुरुष दिखाई पड़ेंगे आपको. ये पुरुष सुबह के वक्त नहा कर या बिना नहाए ही घर से बाहर इस नाश्ते का आनंद लेते दूकान के बाहर भीड़ लगाकर या टेबल-कुर्सियों पर आसीन होकर अवश्य मिलेंगे.
मेरे मन में यह प्रश्न कई वर्षों से उठ रहा है कि इस भीड़ में घर की महिलाएं क्यों नहीं दिखाई पड़ती? क्या वे इस समय अपने घरेलू काम में व्यस्त रहती हैं? या, उन्हें सुबह नाश्ता करने की ज़रुरत महसूस नहीं होती, या, उनके पति, भाई या देवर उन्हें अपने साथ लेकर बाहर नहीं निकलते? कुछ पुरुषों का यह गोपनीय कार्यक्रम लगभग रोज चलता है, शायद ही वे अपने घर में बताते होंगे कि उन्होंने बाहर का नाश्ता लिया है.
मान लिया जाए कि किसी कारण से घर की महिलाएं नहीं निकल पायी तो क्या उनके लिए नाश्ता पैक करके ले जाया जाता है? उत्तर है, '(लगभग) नहीं.'
मैं बचपन से हलवाई के धंधे से जुड़ा हुआ हूँ, मैंने करीब से देखा है इन बातों को. आज भी जब इस तरह की भीड़ को दूकानों के बाहर देखता हूँ तो मुझे घर के कामों में व्यस्त रहने वाली गृहणियों के साथ हो रहे इस अन्याय की तरफ जाता है, बहुत दुःख होता है.
वेद मंत्र है, 'केवलाघो भवति केवलादी' अर्थात जो अकेले खाता है वह चोर है। पता नहीं किस संदर्भ में यह वाक्य
वेद में आया होगा!

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