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Showing posts from May, 2019

चुनौतियों का सामना कीजिए

एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया । कभी बाढ़ आ जाये , कभी सूखा पड जाए , कभी धूप बहुत तेज हो जाए , तो कभी ओले पड जाये ! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी खराब हो जायें ! एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा देखिए प्रभु , आप परमात्मा हैं , लेकिन लगता हैं , आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नही हैं , एक प्रार्थना हैं कि एक साल मुझे मौक़ा दीजियें , जैसा मैं चाहू वैसा मौसम हो , फिर आप देखना मैं कैसे अन्य के भण्डार भर दूंगा ! परमात्मा मुस्करायें और कहा ठीक हैं जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा , मैं दखल नही करुँगा ! किसान ने गेहूँ की फसल बोई जब धूप चाही, तब धूप मिली , जब पानी , तब पानी , तेज धूप , ओले , बाढ़ , आँधी तो उसने आने ही नही दी , समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की खुशी भी ,क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नही हुई थी ! किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को , कि फसल कैसे करते हैं, बेकार ही इतने बरस हम किसानों को परेशान करते रहें , फसल काटने का समय भी  आया , किसान बड़े गर्व से फसल काटने गया , लेकिन  जैसे ही फसल काटने लगा , एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया ...

मेरी माँ

मेरी माँ !!!!!!!!!!!!!! लेती नही दवाई " माँ " जोडे पाई पाई " माँ " । दुख थे पर्वत , राई " माँ " हारी नही लड़ाई "माँ "। इस दुनिया में सब मैले हैं , किस दुनिया से आई "माँ"। दुनिया के सब रिश्ते ठंडे , गरमागर्म रजाई " माँ "। जब भी कोई रिश्ता उधड़े , करती हैं तुरपाई " माँ " । बाबूजी के पांव दबा कर , सब तीरथ हो आई " माँ "। नाम सभी हैं गुड़ से मिठे , माँ जी , मैया , माई " माँ "। सभी साड़ियाँ छीज गई थी , मगर नही कह पाई " माँ "। घर में चूल्हे मत बाँटों रे , देती रही दुहाई " माँ " । बाबूजी बीमार पडे जब , साथ साथ मुरझाई " माँ " । रोती हैं लेकिन छुप छुप कर , बड़े सब्र की आई " माँ "। लड़ते लड़ते , सहते सहते , रह गई एक तिहाई " माँ " । बेटी रहे ससुराल में खुश , सब जेवर दे आई " माँ "। " माँ " से घर , घर लगता हैं , घर में घुली समाई " माँ " । बेटे की कुर्सी हैं ऊँची , पर उसकी ऊँचाई " माँ ...

यदि सिंह अहिंसक हो जाये

यदि सिंह अहिंसक हो जाये, गीदड़ भी शौर्य दिखाते है, जब गरूड़ संत सन्यासी हो, तब सर्प पनपते जाते है | इस शांति अहिंसा के चक्कर मे अपना विनाश आरम्भ हुआ | जब से अशोक ने शस्त्र त्यजे, भारत विघटन प्रारम्भ हुआ |

लघुकथा--बेटी का बाप

। गुप्ता जी ने जैसी ही पंडाल में अपने बेटे को कई लोगों के साथ बहस करते देखा तो दौड़कर पंडाल की तरफ भागे। "क्या हुआ बेटा सोनू, शोर क्यों मचा रहा है?" गुप्ता जी ने बड़े हैरानी से अपने बेटे से पूछा। "देखिये ना पिताजी, मुझे कोल्ड ड्रिंक पीना है और ये लड़की वाले कह रहे हैं कि कोल्ड ड्रिंक खत्म हो गया।" सोनू ने गुस्से भरे स्वर में जवाब दिया। गुप्ता जी अपने बेटे को समझा ही रहे थे कि इतने में बेटी का बाप आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला। "माफ करना बेटा, कोल्ड ड्रिंक खत्म हो गयी है, लेने के लिए भेजा है। अभी थोड़ी देर में आ जायेगी।" गुप्ता जी से रहा नहीं गया। उन्होंने तुरंत उनका हाथ पकड़कर बोला। "रहने दीजिए समधी जी। शादी में कम ज्यादा होता रहता है। आपको कोल्ड ड्रिंक मंगाने की कोई जरूरत नहीं है। मैंने भी पिछले वर्ष अपनी बिटिया की शादी की थी। मैं समझ सकता हूँ। मैं भी एक बेटी का बाप हूँ।" अग्रवाल जी अपने आँसू नहीं रोक पा रहे थे। सोनू शर्मिदा होकर वहाँ से चला गया।

बीवी रेलवे वाले की... .व्यंग्य का आनंद लें.

हाय राम हमारी किस्मत तो, लगता है एकदम सो गई है; जबसे मेरी शादी, एक अध्यापक जी से हो गई है। सुबह 7 बजे घर से निकलें, ढाई बजे आ जाते हैं; घर पड़े पड़े फिर पूरा दिन वह, मुझपे हुकुम चलाते हैं। भगवान बनाया क्यों मुझे, एक बीवी टीचिंग वाले की; अगले जनम मे मुझे बनाना, बीवी रेलवे वाले की।। और ऊपर से पोसटिंग, हो जाए उनकी रोडसाइड मे; सच कहती हूँ राज करूँगी, बिना तख़त बिन ताज के। सुबह के निकले सैँया जी, देर रात घर आएंगे; बिना किसी झगड़े दंगे, दो पैग लगा सो जाएंगे। गजब निराली माया होगी, व्हिस्की औ रम के प्याले की; अगले जनम मे मुझे बनाना, बीवी रेलवे वाले की।। रेलवे वाले जीवन जीते, पत्नी संग रोमाँस मे; आधी सैलरी खर्च करें, पत्नी के मेंटिनेन्स मे। पतिदेव की सर्विस, जैसे जैसे बढ़ती जायेगी; सच कहती हूँ सुंदरता, मेरी और निखरती जायेगी। परवाह नहीं बनाना मुझको, गोरे की या काले की; अगले जनम मे मुझे बनाना, बीवी रेलवे वाले की।। जितने भी हैं शौक मेरे, मैं सब पूरे करवाऊंगी; GM न जब तक बन जाएं, नौकरी तब तक करवाऊंगी। इससे पहले अगर नौकरी, छोड़ने की करेंगे बात; सच कहती हूँ मेरे हाथ के, थप्पड़...

बेटी की पूकार

मेरा कसूर क्या हैं माँ ? हाथों में कलम के बदले , चूडियाँ क्यूँ थमाती हो ? मेरे सपनों के पर कट कर , मेरी बलि क्यूँ चढ़ती हो ? गहनों की ये जंज़ीरे , मेरे पैरों में क्यूँ पहनाती हो ? मेरा कसूर क्या हैं माँ ....     ये मंगलसूत्र और महावर , अभी मुझे नही भाते माँ ... ये खुला आसमान , मुझे बड़ा सुहाना लगता हैं माँ ..... मैं भी उड़ना चाहती हूँ , ऊँचाइयों को छूना चाहती हूँ ..... सावन के झूले से भी , ऊँची पेंगे भरनी हैं माँ ... क्यूँ नही माँ .... मेरा कसूर क्या हैं माँ .... पहले कुछ बन कर , कुछ होना चाहती हूँ .... बाबुल का नाम जग में , रोशन करना चाहती हूँ .... मुझे कलम की ताकत दो बाबा ,  मैं बेटा होकर दिखाना चाहती हूँ ..... हाँ ! मैं भी पहनूँगी एक दिन , तेरे पसन्द की लाल चूड़ियाँ .... माथे पर बड़ी सी बिन्दिया , मैं भी सजाऊँगी ..... तब वो पायल बेंड़ी नही , और बिन्दिया मेरे वजूद पर .... एक चमकता सितारा होगा , और .... सिर्फ उसके नाम की ..... जो मेरे मन का साथी होगा , मेरी माँ का भी बेटा होगा .. मेरा सर जब , स्वाभिमान से तना होगा माँ .... लड़की के नाम पर...