बेटी की पूकार

मेरा कसूर क्या हैं माँ ?
हाथों में कलम के बदले ,
चूडियाँ क्यूँ थमाती हो ?
मेरे सपनों के पर कट कर ,
मेरी बलि क्यूँ चढ़ती हो ?
गहनों की ये जंज़ीरे ,
मेरे पैरों में क्यूँ पहनाती हो ?
मेरा कसूर क्या हैं माँ ....
   
ये मंगलसूत्र और महावर ,
अभी मुझे नही भाते माँ ...
ये खुला आसमान ,
मुझे बड़ा सुहाना लगता हैं माँ .....
मैं भी उड़ना चाहती हूँ ,
ऊँचाइयों को छूना चाहती हूँ .....
सावन के झूले से भी ,
ऊँची पेंगे भरनी हैं माँ ...
क्यूँ नही माँ ....
मेरा कसूर क्या हैं माँ ....

पहले कुछ बन कर ,
कुछ होना चाहती हूँ ....
बाबुल का नाम जग में ,
रोशन करना चाहती हूँ ....
मुझे कलम की ताकत दो बाबा ,
 मैं बेटा होकर दिखाना चाहती हूँ .....
हाँ ! मैं भी पहनूँगी एक दिन ,
तेरे पसन्द की लाल चूड़ियाँ ....
माथे पर बड़ी सी बिन्दिया ,
मैं भी सजाऊँगी .....
तब वो पायल बेंड़ी नही ,
और बिन्दिया मेरे वजूद पर ....
एक चमकता सितारा होगा ,
और .... सिर्फ उसके नाम की .....
जो मेरे मन का साथी होगा ,
मेरी माँ का भी बेटा होगा ..

मेरा सर जब ,
स्वाभिमान से तना होगा माँ ....
लड़की के नाम पर ,
कही न झुका होगा माँ ....
तुम्हारे जिगर का टुकड़ा हूँ माँ ,
मुझे भी परवान चढ़ने दो .....


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