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Showing posts from June, 2019

MOTIVATION

पाना है जो मुकाम वो अभी बाकी है, अभी तो आये है ज़मीन पे अभी तो आसमान की उड़ान बाकी है..।

भारत का मुस्लमान

भारत का मुस्लमान... मैं देश के बहुत हिस्सों में तो नहीं गया लेकिन कई हिस्सों, कई शहरों में रहने का मौका मुझे जरुर मिला है. मैं आज एक दम से तो 35-36 साल का नहीं हुआ इसमें भी कुछ वक़्त लगा है. मैं आज 35 सालों के दौरान लगभग सैकड़ों मुस्लिम मित्रों, सहपाठियों, सहभागियों के साथ पढ़ा लिखा काम किया लेकिन इन 35 सालों में मुझे वैसा कुछ नहीं दिखा जो हम सब आज इस 21वीं सदी के मोबाइल युग में देख कर पल बढ़ रहे हैं. मैंने किसी भी मुसलमान को हिन्दू धर्म का समर्थक तो नहीं पाया लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं देखा जिससे ये लगे कि उनको मेरे हिन्दू होने के कारण मुझसे किसी प्रकार का बैर है. मुझे कभी उनके खानों में अपनी रसोई जैसे मसालों जैसा स्वाद तो नहीं मिला लेकिन कभी ऐसा भी प्रतीत नहीं हुआ की उनके भोजन में पानी की जगह खून मिलाया गया हो. मैंने उन्हें कट्टर भी नहीं पाया कि वे मुझसे कहते कि राम को छोड़ दो और खुदा को अपना लो. कहते भी तो कैसे क्योंकि मैंने भी कभी नहीं कहा की खुदा को छोड़ दो और राम को अपना लो. मैंने कभी भी यह भी नहीं देखा की उनकी नाक, आँख, कान या बनावट किसी अन्य धर्म के इंसान से भिन्न हो हाँ यह जरुर ...

भाई

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नन्हें-नन्हें पाँव थे फिर भी अपने पाँव खड़ा हो गया एक भाई देखो अपनी बहन के लिए माँ जितना बड़ा हो गया...!!

आप ने कभी कैंची चलाई है ?

यह वह दौर था जब टीवी चैनल्स के मामले में बस डीडी नेशनल और डीडी न्यूज़ हुआ करते थे! और धारावाहिक के नाम पर "रामायण" "महाभारत" "श्री कृष्णा" और "शक्तिमान" हुआ करता था। यह दौर था हमारे साइकिल सीखने का और हमारे जमाने में साइकिल दो चरणों में सीखी जाती थी पहला चरण कैंची और दूसरा चरण गद्दी....... तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस बाबा या ताऊ चलाया करते थे तब साइकिल की ऊंचाई अड़तालीस  इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था। "कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे । और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और "क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की छोरा साईकिल दौड़ा रहा है । आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से मरहूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में अड़तालीस इंच ...

बचपन का जमाना होता था

बचपन का जमाना होता था खुशियों का खजाना होता था चाहत चांद को पाने की दिल तितली का दीवाना होता था खबर ना थी सुबह की ना शामो का ठीकाना होता था थके हारे स्कूल से आते पर खेलने भी जाना होता था पापा की वो डांत गलती पर मम्मी का मनाना होता था दादी की कहानी होती थी परियो का फसाना होता था अब नहीं रहा वैसा जैसा बचपन का जमाना होता था...

"चाय पियेंगे..?"

जब कोई पूछता है "चाय पियेंगे" तो बस नहीं पूछता वो तुमसे दूध, चीनी और चायपत्ती को उबालकर बनी हुई एक कप  चाय के लिए। वो पूछता हैं... क्या आप बांटना चाहेंगे कुछ चीनी सी मीठी यादें कुछ चायपत्ती सी कड़वी दुःख भरी बातें..! वो पूछता है.. क्या आप चाहेंगे बाँटना मुझसे अपने कुछ अनुभव, मुझसे कुछ आशाएं कुछ नयी उम्मीदें..? उस एक प्याली चाय के साथ वो बाँटना चाहता है अपनी जिंदगी के वो पल तुमसे जो अनकही है अबतक दास्ताँ जो अनसुनी है अबतक वो कहना चाहता है.. तुमसे तमाम किस्से जो सुना नहीं पाया अपनों को कभी.. एक प्याली चाय के साथ को अपने उन टूटे और खत्म हुए ख्वाबों को एक बार और जी लेना चाहता है। वो उस गर्म चाय की प्याली के साथ उठते हुए धुओँ के साथ कुछ पल को अपनी सारी फ़िक्र उड़ा देना चाहता है इस दो कप चाय के साथ शायद इतनी बातें दो अजनबी कर लेते हैं जितनी तो अपनों के बीच भी नहीं हो पाती। तो बस जब पूछे कोई अगली बार तुमसे  "चाय पियेंगे..?" तो हाँ कहकर बाँट लेना उसके साथ अपनी चीनी सी मीठी यादें और चायपत्ती सी कड़वी दुखभरी  बातें... क्यों...

ब्रह्म

 ब्रह्म . . .हम लोग युगों से ‘ब्रह्म’  शब्द पढते, सुनते और बोलते आए है ! क्या आपको  मालूम है कि ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ  क्या होता है ? यह कैसे बना,...कैसे अस्तित्व में आया..? सबसे पहले  बेसिक बात  जाननी  ज़रूरी  है, सो  उसके बारे  में बताना  चाहूँ .ब्रह्म शब्द ‘'वृह'’ धातु से बना है जिसका अर्थ है - वृहत होना,  बढ़ना, फैलना, विस्तृत होना। ऋषियों- मुनियों ने कहा - ‘ब्रह्म-पार ब्रह्म’.....जिसका अर्थ है - विस्तृत होना या फैलना अर्थात्  जो निस्सीम है !  एक शब्द है – ‘परब्रह्म’   जिसका शाब्दिक अर्थ है 'सर्वोच्च ब्रह्म' - वह ब्रह्म जो सभी वर्णनों और संकल्पनाओं से भी परे है। लगभग सभी  धर्मों मे  ईश्वर  के भिन्न-भिन्न रूपों को  महान, सर्वोच्च  कहा  गया है ।  जैसे - तकबीर, वाक्यांश  "अल्लाहु अकबर"  का अर्थ  है  -  "अल्लाह बहुत बडा है" यानी  "ईश्वर महानतम है"। .युगों पहले निरंतर खोज में लगे, भारतीय जिज्ञासु, ऋषियों- मुनियों ने अनुसंधान कर जिसे पा...

*एक कटु सच्चाई, समाज की आंखे खोलती दो काल्पनिक पत्र, जो कि आगामी दिनों में सत्य प्रतीत होगा*

अवश्य पढ़े आज मार्केट की बिगड़ती आर्थिक स्थिति के मद्देनजर *पहला पत्र* *आदरणीय महानुभाव* *आपके के यहां विवाह में आना हुआ* , *आपने भोजन में नाना प्रकार के विभिन्न प्रदेशों के 100 से अधिक व्यंजन रखे थे । यह भी सुना कि आपने देश के सुप्रसिद्ध केटरिंग वालों को 2,000 से 2,500/- प्रति प्लेट से अनुबंध किया हैं* *खाने के इतने सारे काउंटर देखकर सभी की आँख फटी रह गयी । chinese, साउथ इंडियन, इटालियन , मैक्सिकन, पंजाबी,राजस्थानी,गुजराती , थाई फूड इसके अलावा आपने आइस क्रीम, बर्फ के गोले, विभिन्न फ्लेवर वाले पान के स्टाल और 25-30 तरह की मिठाई काउंटर भी लगाए थे।* *भाईसाहब, क्षमा करना पिछले कुछ दिनों से मैं और परिवार वाले अक्सर घर से ही खाना खाकर जाते हैं , अतः आपने जो इतनी महंगी और भव्य भोजन व्यवस्था की उसका मैं लाभ नहीं ले सका।* *आपको बुरा न लगे तो एक बात पूछना चाहता हूं , इतनी महंगी और आलीशान भोजन व्यवस्था किसके लिए की ? आपकी प्रतिष्ठा और हैसियत समाज में पहले ही काफी अच्छी हैं ।*  *आपका निश्चित तौर पर पर उद्देश्य लोगों को उनकी मनपसन्द चीजे खिलाने के रहा होगा परन्तु उस दिन शादी क...