भारत का मुस्लमान

भारत का मुस्लमान...

मैं देश के बहुत हिस्सों में तो नहीं गया लेकिन कई हिस्सों, कई शहरों में रहने का मौका मुझे जरुर मिला है. मैं आज एक दम से तो 35-36 साल का नहीं हुआ इसमें भी कुछ वक़्त लगा है. मैं आज 35 सालों के दौरान लगभग सैकड़ों मुस्लिम मित्रों, सहपाठियों, सहभागियों के साथ पढ़ा लिखा काम किया लेकिन इन 35 सालों में मुझे वैसा कुछ नहीं दिखा जो हम सब आज इस 21वीं सदी के मोबाइल युग में देख कर पल बढ़ रहे हैं.

मैंने किसी भी मुसलमान को हिन्दू धर्म का समर्थक तो नहीं पाया लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं देखा जिससे ये लगे कि उनको मेरे हिन्दू होने के कारण मुझसे किसी प्रकार का बैर है. मुझे कभी उनके खानों में अपनी रसोई जैसे मसालों जैसा स्वाद तो नहीं मिला लेकिन कभी ऐसा भी प्रतीत नहीं हुआ की उनके भोजन में पानी की जगह खून मिलाया गया हो.

मैंने उन्हें कट्टर भी नहीं पाया कि वे मुझसे कहते कि राम को छोड़ दो और खुदा को अपना लो. कहते भी तो कैसे क्योंकि मैंने भी कभी नहीं कहा की खुदा को छोड़ दो और राम को अपना लो.

मैंने कभी भी यह भी नहीं देखा की उनकी नाक, आँख, कान या बनावट किसी अन्य धर्म के इंसान से भिन्न हो हाँ यह जरुर पाया कि कुछ को हजामत से परहेज था. उन्हें ज्यादातर बड़े मोहरीदार पजामों लुंगियों में देखा लेकिन इससे ऐसा कहीं भी न लगा कि वो किसी दूसरे ग्रह से आये प्राणी हों.

मैंने किसी भी मुस्लमान को विद्यालयों में सुबह की विद्यालय की आराधना करने से परहेज करते हुए भी नहीं देखा और न ही कहीं यह सुना कि उन्होंने जय हिन्द या वन्दे मातरम् न कहा हो. आज जरुर सुनता हूँ और हर जगह सुनता हूँ क्योंकि आज का युग मीडिया का युग है.

मैंने कभी किसी मुसलमान को बहुत अलग नहीं देखा न ही ऐसा कभी देखा कि वो असभ्य हों बल्कि मैंने उन्हें घर में अपने से ज्यादा शिष्टाचार का पालन करते हुए पाया. मैंने किसी मुसलमान को बड़ों के सामने लाज हया से दूरी बनाते नहीं देखा और आज इन 28 सालों में किसी मुसलमान को अयोध्या में राम मंदिर का विरोध करते हुए भी नहीं देखा. देखा तो बस यह सब जब मै स्वयं एक राजनीतिक विचार धारा का समर्थक हुआ. मैंने वही देखा या शायद मुझे सहायक मिडिया द्वारा यही दिखाया गया जो मैं आज तक अपने जीवन में न देखा न सुना.

जीवन का मेरे एक बहुत बड़ा हिस्सा किताबों लेखों में नहीं गुजरा न ही मैं बहुत बड़ा आध्यात्मिक इंसान ही हूँ लेकिन मैं नास्तिक नहीं यह अलग बात है कि मुझे सिर्फ देवताओं में भगवान् राम और प्रत्यक्ष देवताओं में सिर्फ सूर्य देवता पर ही विश्वास रहा. मैं जीवन में एक किताब भी लिखा जो कि पूर्ण रूप से हिंदी में है जिसका नाम ‘DIMSTRI History of Religions’ है जिसका हिंदी में परिचय ‘दिम्स्त्री धर्म का इतिहास’ है. मैंने इस किताब में सिर्फ जीवन में दो ही समीकरणों को प्रस्तुत किया जिनके अलावा जीवन में कोई अन्य अध्यात्मिक समीकरण मुझे आज तक नहीं मिल सका.

It seems to you the way you want to see. I appear to you the way you want to feel me. (दुनिया में किसी भी वस्तु में आप वही देख सकते हैं जो आप देखना चाहते हैं. मैं आपको उसी रूप में नजर आता हूँ जैसे की आप मेरे बारे में ख्याल बनाये बैठे हैं.

Excess of Anything means an End. (किसी भी वस्तु की अति का अर्थ उस वस्तु का अंत होता है.

मैं भगवान् के रूप में अगर किसी मूर्ति में राम को देखूं तो वह राम लगेगा अगर उसी मूर्ति में विष्णु को खोजूं तो वह भी मुझे उसी मूर्ती में मिलेगा और अगर उसी मूर्ती में मैं किसी अन्य धर्म के देवी देवता को ढूँढूँ तो वह भी मुझे उसी मूर्ती में दिखेगा. फर्क यही है की मैं उस मूर्ती में देखने क्या गया हूँ. अगर आप राम में देवता ढूंढेंगे तो राम में देवता मिलेगा लेकिन अगर मैं रावण में भी कुछ गुणों को खोजना चाहूँ तो उस रावण में भी मुझे दो चार गुण जरुर दिखेंगे जो आज की पीढ़ी के देव पुरुषों में भी नहीं मौजूद. यह अलग बात है की रावण कभी देवता न लगेगा क्योंकि वह देव तुल्य नहीं हो सकता. लेकिन सोचिएगा कि क्या आज के समाज में रावणों से भी बद्चारित्र वाले लोग हैं जिन्होंने किसी मानवी राम की सीता का ना सिर्फ हरण किया बल्कि मार भी डाला. कहना यही हो कि अब हम आज के ऐसे दुश्चरित्र लोगों में रावण नहीं देखते क्योंकि हम अपने अन्दर राम को लाने ही नहीं देना चाहते क्योंकि हम यह मानते हैं की राम मंदिरों में मिलेगा खुदा मस्जिदों में दिखेगा.

दूसरा समीकरण कहता है की किसी भी वस्तु की अति का अर्थ उस वस्तु का अंत होता है. एक पिता अगर अपने बच्चे से अत्यधिक मोह में पड़ जाये तो वह उस बालक का अंत करता है. अगर कोई इंसान अत्यधिक रूप से आस्तिक होने लगे तो बहुत जल्दी ही उसकी आस्था का अंत होता है क्योंकि वह हर बात को प्रभु पर छोड़ देता है कि सब प्रभु करता है. यह सोच एक दिन उसे बहुत पीड़ा देती है और पीड़ा आस्था का अंत कर देती है. अगर किसी इंसान को अत्यधिक भय के माहौल में दाल दिया जाए तो वह इंसान भय का हमेशा हमेशा के लिए जीवन में अंत कर देता है और वह कई समाजों के लिए खुद एक भयावह इंसान हो जाता है. यही कुछ कारण है जो की आज देश में कई मुजरिमों, कई गुनाहगारों को पैदा कर लोगों ने समाज में छोड़ रखा है.

अन्य एक समीकरण तो नहीं लेकिन जीवन के हर आदमी का उद्देश्य होता है- कोई भी इंसान अपने में किसी को वही चीज दिखाना चाहता है जो आप उसमें देखना चाहते हैं.

वो चाहता है की आप उसे धर्मी समझे तो वह हर समय आपसे धर्म की ही बात करता है लेकिन जीवन की यह अमिट सच्चाई है इंसान वही दिखाता है जो वह नहीं होता है. एक औरत अपने को बहुत खूबसूरत दिखाना चाहे तो उसकी सच्चाई यही होगी कि वह खूबसूरत नहीं होगी क्योंकि खूबसूरत जो होता है वह अपनी खूबसूरती को संभालता है दिखाता नहीं. कोई भी अगर आपको यह दिखने लगे की वह बहुत धर्मी है तो यह जान लेना चाहिए कि यह सिर्फ और सिर्फ दिखावा है क्योंकि धर्मी इंसान यह तक पता नहीं लगने देता की उसने पूजा की तो कब और ईश्वर को ध्यान किया तो कब.

बात के क्रम में विषय से दूर होना उचित नहीं लेकिन जीवन के यह मन्त्र हर जगह हर पुस्तक में मौजूद हैं यह लेकिन हम पर है कि हम किताबों में कौन सा मन्त्र ढूँढने निकले हैं.

कहीं इन्ही मन्त्रों का उपयोग तो आज देश की मिडिया या आज की असंख्य पार्टियाँ तो नहीं कर रहीं जिसके फलस्वरूप आज इस देश में कहीं अमन चैन नहीं दिखता.

मुस्लिमों का उपयोग आज से नहीं अंग्रेजों के काल से चल रहा है. पहले देश को बाँटने के लिए और आज वोट बैंक के लिए. आज इस देश में किसी प्रकार से विभिन्नता नहीं लेकिन आज मैं यही सोचता हूँ कि आज भी वो मेरे मुस्लिम मित्र वैसे के वैसे ही हैं तो फिर आखिर यह शीत यूद्ध कर कौन रहा है.

एक आम उद्धरण दूं तो अगर सचिन तेंदुलकर आपसे tv या अखबार के माध्यम से कहते हैं की पेप्सी पियो तो लोग पेप्सी पीते हैं. और वही अगर कह दें की कोका कोला पियो तो लोग उसे पीते हैं क्योंकि वह उसके प्रचारक है ताकि वह वस्तु बिके और किसी को मुनाफा हो. उस वस्तु में आपको फायदा दिखाया गया क्योंकि यह जीवन का उद्देश्य होता है और आपने उसमें वही गुण देखे जो आप उसमें देखना चाहते हैं. लेकिन अगर उसी पेप्सी में आप कोका कोला देखेंगे तो आपको उसी पेप्सी में कोका कोला और थम्स अप भी दिखेगा. यही जीवन का मन्त्र तमाम दुनिया की चीजों में मौजूद है लेकिन मेरे इस लेख में भी आपको वही दिखेगा जो आप देखना चाहते हैं और यह भी सच्चाई है कि अगर चाहें तो आपको इस लेख में भी ज़रा सा जीवन का छिपा मन्त्र भी दिखेगा.

कहीं इन दंगों, इन उग्रवादियों का प्रचार तो नहीं किया जा रहा क्योंकि अगर किसी के घर की कोई बेटी किसी आदमी के साथ भाग जाती है तो उसका बाप या उसका परिवार इस बात का प्रचार नहीं करता. प्रचार होता है तो उन पाटीदारों के द्वारा जिनको यह एक मौके के समान लगता है.

वोट बैंक बन कर रह गया है आज देश का मुसलमान लेकिन उस वोट बैंक का उसे ही कोई फायदा नहीं दिखता. उपयोग करो कूड़े में डालो क्योंकि यही सिद्धांत आज तक अंग्रेजों के समय से चला आ रहा है. बनतो और राज करो यह सिद्धांत आज भी ख़तम नहीं हुआ है. फर्क यही है कि कल कोई राज करता था आज कोई राज कर रहा है.

अत्यधिक देश भक्ति दिखना कहीं देश में भक्ति का अंत तो नहीं क्योंकि जो देश भक्त होता है वह इसका प्रचार नहीं करता. आज मैं उन्ही मुसलमानों से पुछु तो वह स्वयं कहेंगे कि पहले उपयोग दलितों और पिछड़े वर्गों का हुआ लेकिन उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ और अब उपयोग अलग किस्म का जारी है लेकिन उसका भी कोई हल नहीं होगा.

देश का मुसलमान तो बाद की बात है हर इंसान जो किसी देश में पैदा होता है वह देश के हित के बारे में ही सोचता है लेकिन अगर किसी घर में 4 संताने हो और बाप एक संतान को निकम्मा करार दे तो शायद वह बालक घर को पहले छोड़ देता है लेकिन प्रेम बाप से ख़त्म नहीं होता. प्रेम परिवार से ख़त्म नहीं होता. ऐसा क्यों है की इस देश में प्रचार के माध्यम से वह सब बेच दिया जा रहा है जो एक भागी हुई बेटी का बाप नहीं बेचता किसीको. क्या अपने देश की जग हसाई कराना ही देश प्रेम है. क्या देश के हिन्दू भाइयों में कोई अपराधी नही, क्या उनमे कोई दुराचारी नही क्या उनमे कोई गद्दार नही क्या उनमें कोई अस्त्रप्रेमी नही तो आखिर एक ही का प्रचार देश को बांटने में क्यों।

क्या अपने एक बिगड़ी हुई संतान को घर से बहार फेंक देना (जिम्मेवारी से हटने हेतु) ही एक बाप का फर्ज है.
मुस्लिमों में भी मैंने देश प्रेम देखा है लेकिन उसे दिखाया नहीं जाता. उनमें आग लगाईं गई है जिसके फलस्वरूप वो आज इस देश के होते हुए अपने आप को देश का समझ नहीं पा रहे ऐसे में अगर कोई बेटा परिवार छोड़ दे तो बाप का क्या फ़र्ज़ है और क्या उसे यह देश निभा रहा है.

मैं जानता हूँ कई लेख कई बार नापसंद कर दिए जाते हैं राजनीतिक विचार को उठाने के लिए लेकिन यह लेख किसी प्रकार से किसी धर्म से और किसी राजनीतिक दल दे प्रेम के चलते नहीं लिखा गया है. और इसका राजनीतिक विचारों से कोई लेना देना नहीं.

यह लेख सिर्फ इसलिए लिखा गया है क्योंकि यह देश जितना मेरा है उतना ही सभी का है.


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