मुनीम_साहब
हमारे यहाँ एक मुनीम साहब थे, जोड़ घटाने में अत्यंत निपुण। बाबूजी उनको समाधानी कहते थे, ऐसा नही है कि वे हर समस्या का समाधान करना जानते थे, लेकिन उनसे मिलकर समस्याग्रस्त व्यक्ति शांति का अनुभव करता था। इसका कारण मात्र इतना था कि यदि किसी व्यक्ति ने अपनी किसी समस्या का ज़िक्र उनसे किया तो मुनीम साब तुरंत बताते की वे स्वयं उस समस्या से बहुत लम्बे समय से जूझ रहे हैं। यदि कोई उनके पास रोता हुआ पहुँचता तो मुनीम साहब उसकी बात सुनते-सुनते उससे भी अधिक ज़ोर से रोने लगते थे, मुनीम साहब को रोता देखकर वो व्यक्ति अपना रोना भूलकर उनको चुप करने में व्यस्त हो जाता था। एक दिन मैंने जिज्ञासावश उनसे पूछा की वे ऐसा क्यों करते हैं ? मुनीम साहब बोले- आदमी को समाधान से ज़्यादा तसल्ली, दूसरे की समस्या से मिलती है। अधिकतर लोगों को अपने दर्द की दवाई नहीं बल्कि हमदर्द चाहिए होता है, हमदर्दी दिखाने से उस पीड़ित व्यक्ति को लगता है की वो अकेला नहीं है जो कष्ट से जूझ रहा है, सम पीड़ा का भाव उसको चिंतामुक्त करते हुए आनंद से भर देता है। मैंने कहा- लेकिन इससे उनकी समस्या तो समाप्त नहीं होती, वो तो जैसी...

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