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Showing posts from March, 2020

टूटते परिवारों पर सिसकती कविता

रिक्तता कैसी हृदय में। ....... दूर तक फैली है शाखा फूल पत्रों से भरी है। झुक रही है बोझ से मंजरियां,कोपल हरी है। फिर कसक क्यों वेदना दरख्तों के कोठरों में रिक्तता कैसी हृदय में। खो गये कहाँ रक्त बंधन बह रहे थे दे सहारे ? झूठ के साँचे बने क्यों जो नहीं सच में हमारे। बाँह जब  पसरी जहां में बाढ़ क्यों फिर लोचनों में? रिक्तता कैसी हृदय में। कोठरों में नित कलरव ध्वनियां मुखरित हुयी है। दूर टिहरी टैरती है मेड़ पर उमड़ित हुयी है। चोंच के दाने तुला में संतुलन न बंधनों में? रिक्तता कैसी हृदय में। पूस की छत की दीवारें एक थुनी से जुड़ी है। फिर भला कोने के चूल्हे दो बटलोही चढ़ी है? मूक गुमसुम ताकती माँ क्यों पड़ी है ठोकरों में? रिक्तता कैसी हृदय में। चार भाइयों की भूजाऐं जागती संग,साथ सोती। बाप की लाठी भला क्यों भार बुढ़े का है ढोती? एक देहरी की यह चौखट बट गयी क्यों सरहदों में रिक्तता कैसी हृदय में।

मां

मां घर के उस पुराने हिस्से में अक्सर मैं जब जाता हूं तो तुम्हे याद कर बहुत रोया करता हूं मां, जहां तुम मुझे उस पुराने से ख्टोले पर लिटाकर कहानियों की दुनिया में लेे जाती थी, टपकती छत से गिरती बारिश की बूंदों के शोर में एक सुरम्य रात जाने कब मुझे नींद की आगोश में ले जाती, पता ही नहीं चलता था, नए घर की छत नहीं टपकती है, न ही होता  है कोई शोर, अजीब सी शांति है सारे घर में, घड़ी की सुइयों की टिक टिक सुनती रहती है रात भर, न उसमें कुछ सुर है न कोई शकुन, मखमली बिस्तर भी काटता हैं मुझे तेज आरी सा, तुम्हारे जाने के बाद वो पुराना घर खींचता रहता हैं मुझे, कचोटता है और लेे जाता है अभाव भरे उस बचपन में जहां प्यार की कोई कमी न थी, गहरी नींद थी, मीठे सपने थे, मां की गोद थी .. अहसास की नमी थी...... आज सबकुछ है लेकिन कुछ भी नही.....

बेटियां

मां बाप के हिस्से में, कब आती हैं बेटियां... संस्कारों के बोझ उठाए, कुछ तौर-तरीकों में; बेकार उलझे रिवाजों, कुछ पुराने सलीकों में... रिश्तेदारों की उम्मीदों, दुनिया के उसूलों में; पैदा होने से पहले, बंट जाती हैं बेटियां... मां बाप के हिस्से में कब आती हैं बेटियां...

Lockdown- Corona - be positive

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Since it is the time when everyone has to stay indoors. Some find it difficult! Thought of sharing about this book with you. I read it a few months back. It was on Barak Obama’s list of his favourite books of 2019. Albert Woodfox served for more than 40 years in #solitary confinement in the infamous and brutal Angola prison in Louisiana. His early life was nothing but a series of petty crimes-in and out of jail.  Till he was convicted for armed robbery and sent to Angola prison.  In 1972 a white prison guard was murdered in Angola and without a shred of evidence Albert Woodfox and his two companions were accused of the murder and convicted in what he calls an unjust trial. He was put into solitary confinement for 23 hours a day in a  6 by 9 feet cell for more than 4 decades. And was subjected to torture, mistreatment and brutality almost on daily bases. Instead of breaking down in prison he transforms himself and develops qualities and character that very few people ha...

मैं न होता तो क्या होता????

अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्हों ने देखा मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये। वे सोचने लगे। यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे *भ्रम* हो जाता कि यदि मै न होता तो सीता जी को कौन बचाता??? बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है,  मै न होता तो क्या होता ? परन्तु ये क्या हुआ सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं। आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है। और त्रिजटा कह रही है की उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है। अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा। जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीष...

थप्पड़

कुछ दिनों से एक मस्त जोक बन रहा है कि रांझना का हीरो 17 थप्पड़ खाने के बाद भी नाचता रहा और एक यहाँ कबीर सिंह में हीरो ने एक थप्पड़ हीरोइन के क्या मार दिया, अनुभव सिन्हा ने पूरी फिल्म ही बना दी। हास्य की नज़र से ये ज़बरदस्त जोक है। हँसी नहीं रुकती। लेकिन थप्पड़ क्या वाकई एक थप्पड़ की कहानी है? ब्रीफ में समझते हैं कि थप्पड़ की शुरुआत एक ऐसे कपल से होती है जो लड़ते-झगड़ते हैं, बिना शादी के मस्त रह रहे हैं। इनमें लड़ाई-झगड़ा धक्का-मुक्की सब होती है। ज़ाहिर है लड़की नारीवादी है। दूसरा कपल इसी लड़की की लॉयर बॉस और उसके पति का है जहाँ वकीलनी के पास सब कुछ है लेकिन पति एहसास करवाता रहता है कि उसका नाम-शोहरत-पैसा सब ससुर की वजह से है। अब इस लॉयर का एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर भी चल रहा है। तीसरी कहानी है लो क्लास कामवाली बाई कि जिसका पति उसे सिर्फ इसलिए पीटता है कि वो पीट सकता है। डेली रूटीन है। चौथी कहानी लीड करैक्टर अमृता के है मात-पिता की है जिनमें शादी के चालीस साल बाद भी बहुत प्यार और सम्मान है। अब कहानी है अमृता की। आप फिल्म अगर सतही तौर पर देखें तो भी समझ सकेंगे कि बात थप्पड़ से कहीं ज़्यादा रेस्पे...

सदिओं पुराना है

अमरीकी लेखक ..रॉबर्ट जॉर्डन लिखते हैं - "पुरुष भूल तो जाते हैं पर कभी माफ़ नहीं कर पाते - वहीँ महिलायें माफ़ तो कर देती हैं पर भूल नहीं पातीं" ...:)) यहीं से शुरू होता है ...पुरुष और महिला का आपस का द्वंध ...पुरुष कहता है - जब मै सबकुछ भूल सकता हूँ ..फिर तुम क्यों नहीं ...महिला पलट कर जबाब देती हैं - जब मै सबकुछ माफ़ कर सकती हूँ फिर तुम क्यों नहीं ...:)) दोनों का मूल स्वभाव अलग है ...फिर भी एक जिद है ...वो मेरे जैसा क्यों नहीं ...पुरुष उस महिला को आदरणीय बनाना चाहता है ....जो उसकी गलतीओं को भूल जाये ...जो अपने अतीत को भूल कर मुझमे समा जाए ...वहीँ दूसरी ओर महिला कहती है - पूजा उसी की करूंगी ...जो मेरी गलतीओं को माफ़ कर दे ...वही विशाल ... द्वन्द जारी है ...महिला का मन समुन्दर ...न जाने तह में क्या क्या छिपा ...पुरुष की जिद ...समुन्दर में सिर्फ मै ही रहूँ ...वश चले ..पुरे समुन्दर को सोख ले ...जिद में पी जाये ...खाली कर दे समुन्दर और उसमे खुद समा जाए ...महिला की जिद ..पुरुष के ह्रदय को चीर दे ...इतना छोटा कर दे ..जिसमे उसके अलावा कोई और न समा पाए ... बस खेल महिला के 'मन'...