टूटते परिवारों पर सिसकती कविता
रिक्तता कैसी हृदय में।
.......
दूर तक फैली है शाखा
फूल पत्रों से भरी है।
झुक रही है बोझ से
मंजरियां,कोपल हरी है।
फिर कसक क्यों वेदना
दरख्तों के कोठरों में
रिक्तता कैसी हृदय में।
खो गये कहाँ रक्त बंधन
बह रहे थे दे सहारे ?
झूठ के साँचे बने क्यों
जो नहीं सच में हमारे।
बाँह जब पसरी जहां में
बाढ़ क्यों फिर लोचनों में?
रिक्तता कैसी हृदय में।
कोठरों में नित कलरव
ध्वनियां मुखरित हुयी है।
दूर टिहरी टैरती है
मेड़ पर उमड़ित हुयी है।
चोंच के दाने तुला में
संतुलन न बंधनों में?
रिक्तता कैसी हृदय में।
पूस की छत की दीवारें
एक थुनी से जुड़ी है।
फिर भला कोने के चूल्हे
दो बटलोही चढ़ी है?
मूक गुमसुम ताकती माँ
क्यों पड़ी है ठोकरों में?
रिक्तता कैसी हृदय में।
चार भाइयों की भूजाऐं
जागती संग,साथ सोती।
बाप की लाठी भला क्यों
भार बुढ़े का है ढोती?
एक देहरी की यह चौखट
बट गयी क्यों सरहदों में
रिक्तता कैसी हृदय में।
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