थप्पड़



कुछ दिनों से एक मस्त जोक बन रहा है कि रांझना का हीरो 17 थप्पड़ खाने के बाद भी नाचता रहा और एक यहाँ कबीर सिंह में हीरो ने एक थप्पड़ हीरोइन के क्या मार दिया, अनुभव सिन्हा ने पूरी फिल्म ही बना दी। हास्य की नज़र से ये ज़बरदस्त जोक है। हँसी नहीं रुकती।

लेकिन थप्पड़ क्या वाकई एक थप्पड़ की कहानी है? ब्रीफ में समझते हैं कि थप्पड़ की शुरुआत एक ऐसे कपल से होती है जो लड़ते-झगड़ते हैं, बिना शादी के मस्त रह रहे हैं। इनमें लड़ाई-झगड़ा धक्का-मुक्की सब होती है। ज़ाहिर है लड़की नारीवादी है।
दूसरा कपल इसी लड़की की लॉयर बॉस और उसके पति का है जहाँ वकीलनी के पास सब कुछ है लेकिन पति एहसास करवाता रहता है कि उसका नाम-शोहरत-पैसा सब ससुर की वजह से है। अब इस लॉयर का एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर भी चल रहा है।

तीसरी कहानी है लो क्लास कामवाली बाई कि जिसका पति उसे सिर्फ इसलिए पीटता है कि वो पीट सकता है। डेली रूटीन है। चौथी कहानी लीड करैक्टर अमृता के है मात-पिता की है जिनमें शादी के चालीस साल बाद भी बहुत प्यार और सम्मान है।

अब कहानी है अमृता की। आप फिल्म अगर सतही तौर पर देखें तो भी समझ सकेंगे कि बात थप्पड़ से कहीं ज़्यादा रेस्पेक्ट की है। थप्पड़ पड़ने के बाद का इम्पैक्ट देखिए। उसकी सास समझा रही है कि ‘कोई बात नहीं बेटा नीचे मेहमान आये हैं, अभी तमाशा न करो’। अपनी माँ कह रही है कि ‘इतनी बड़ी बात भी नहीं हुई थी’। भाई समझा रहा है ‘जीजू से ग़लती हो गयी अब इसमें इशू इतना बड़ा करने वाली कौन सी बात है?’

बात ये है, जो वाकई इस फिल्म की कमी है कि फिल्म के नायक ने उस घटना के बाद एक माफ़ी मांगने की बजाए सौ तर्क दे दिए। बात वाकई छोटी सी है पर अमृता ने ये समझा कि थप्पड़ उसको काफी समय से पड़ रहे हैं, उसके कान पर आवाज़ अब आई है। अमृता ये समझ रही है कि हाउस वाइफ बनने का डिसिशन उसका अपना था लेकिन गाड़ी के दो पहियों की तरह उसका सम्मान भी बराबर था। घर की इज्ज़त थी वो। अब जो घर की इज्ज़त है उसको सब क्लेरिफिकेशन क्यों दे रहे हैं?

हर वो शख्स जो बिना देखे इस फिल्म का मज़ाक बना रहा है वो एक बार दिल पे हाथ रखकर कहे कि उसने अपनी बीवी से अपनी ग़लती होने पर कितनी बार माफ़ी मांगी है? सॉरी कह देने भर की बात नहीं कर रहा हूँ। वाकई, दिल से शर्मिंदा होकर माफ़ी मांगी है?

अच्छा बीवी भी छोड़िए, अपनी माँ से कितनी बार दिल से माफ़ी मांगी है?

अच्छा माफ़ी भी छोड़िए, कितनी बार दिल से शुक्रगुज़ार हुए हैं इनके। मन से कहा हो कि माँ जितना आप अकेले करते हो हमारे लिए उतना दस लोग मिलकर भी नहीं कर सकते? कितनी बार?

पता है क्यों नहीं कहा? क्योंकि हमने यही सीखा है कि ये इनकी ड्यूटी है, इन्हें काम करना ही है और इनके पास काम ही क्या है।

जब एक बाप अपने बच्चे के लिए गिफ्ट लेकर आता है तो वही माँ बच्चे से कहती है कि ‘चलो पापा को थैंक-यू बोलो’। लेकिन ये vice-versa बहुत कम देखने को मिलता है। क्योंकि घर में काम करती माँ तो कुछ लाती ही नहीं न।

सोचना समझना आराम से ध्यान देना उपरोक्त सवालों पर। ये जानकार सोचना कि मैं नारीवादी नहीं, मुझे कम्युनिज्म से कम कम्मुनिस्ट्स से ज़्यादा नफ़रत है लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि जो सुविधा हमें सिर्फ लड़के होने के नाते मिल रही है उसके लिए हम सौर बार भी शुक्रगुज़ार हों तो कम है।

इसलिए बिना देखे जिन्होंने फिल्म की रेटिंग 1 दी है IMDB पर वो वाकई बेवकूफी है। हो सके तो उसे दुरुस्त करें।

बादबाकी कुंदन ने मांग के, इम्प्रेस करने को थप्पड़ खाए थे। वो इकतरफ़ा समर्पण था। कबीर सिंह ने प्रीती को दो थप्पड़ मारे तो प्रीती ने कबीर के तीन थप्पड़ जड़े थे।

मगर अमृता और विक्रम मंदिर किनारे मिलते-छिछोरगर्दी करते लव-बर्ड्स नहीं विधिवत शादीशुदा जोड़े हैं। ये फ़र्क है।

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