मां

मां

घर के उस पुराने हिस्से में
अक्सर मैं जब जाता हूं
तो तुम्हे याद कर
बहुत रोया करता हूं मां,
जहां तुम मुझे उस पुराने से
ख्टोले पर लिटाकर
कहानियों की दुनिया में लेे जाती थी,
टपकती छत से गिरती बारिश की बूंदों के शोर में
एक सुरम्य रात जाने कब मुझे
नींद की आगोश में ले जाती, पता ही नहीं चलता था,
नए घर की छत नहीं टपकती है,
न ही होता  है कोई शोर,
अजीब सी शांति है सारे घर में,
घड़ी की सुइयों की टिक टिक
सुनती रहती है रात भर,
न उसमें कुछ सुर है न कोई शकुन,
मखमली बिस्तर भी काटता हैं मुझे तेज आरी सा,
तुम्हारे जाने के बाद वो पुराना घर
खींचता रहता हैं मुझे,
कचोटता है और लेे जाता है
अभाव भरे उस बचपन में
जहां प्यार की कोई कमी न थी,
गहरी नींद थी, मीठे सपने थे,
मां की गोद थी .. अहसास की नमी थी......

आज सबकुछ है
लेकिन कुछ भी नही.....


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