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Showing posts from September, 2020

बेटियां

   घुंघराले बालों वाली सीधे, और सीधे बालों वाली  उन्हें घुंघराला करवाती हैं, लंबे बालों वाली ब्वायकट और ब्वायकट वाली  नकली चोटी लगाती है! ये लड़कियां भी न जाने  क्या ऊधम मचाती हैं ? साड़ी बाँधती हैं मम्मी की ,  ऊपर भाई की टीशर्ट  पहन इठलाती हैं, कभी हाई हील की सैंडिल  तो कभी स्पोर्टशूज़ पहन कदम बढ़ाती हैं, ये लड़कियां भी न जाने  क्या ऊधम मचाती हैं! लिपस्टिक लगाती हैं छिप छिप कर, कभी चश्मा पहन, हाथ नचाती हैं! कलाई पर घड़ी बांध, कभी हाथ में छड़ी ले टीचर बन जाती हैं ! ये लड़कियां भी न जाने क्या क्या ऊधम मचाती हैं! घर-घर में कभी पापा बन, अखबार के पन्ने उलटाती हैं! और कभी अम्मा बन  सब पर हुकुम चलाती हैं! गुड्डे-गुड़िया की शादी कर मुहल्ले में बताशे  बंटवाती है! ये लड़कियां भी न जाने  क्या क्या ऊधम मचाती हैं! चाकलेट, टाफी हुए पुराने अब खुद ही ओरियो शेक बनाती हैं! घर में तितली बन कर उड़ती, एक दिन चिड़िया बन उड़ जाती हैं ! याद आती है बस तब इनकी बेटियां घर क्यों छोड़ जाती हैं ?

एक प्रेरक भावपूर्ण संस्मरण

  मन तो कानपुर में बसने का बनाया था किन्तु नियति लखनऊ खींच लायी। सन् 1980 में सपरिवार जाकर बस गया। उस क्षेत्र में मेरे आवास बनाने के पूर्व मात्र चार आवास ही बने थे। अत: अपने आवास से जब कभी बाहर निकलता तो सर्वत्र सन्नाटा ही सन्नाटा। किन्तु हाँ! चूँकि मेरे आवासीय क्षेत्र से सटा हुआ गाँव फतेहपुर था अत: लगता था कि पड़ोस में कुछ घर बसे हैं। ख़ैर! ये सब विवरण तो संस्मरण की मुख्य सामग्री से हटकर है। मेरे संस्मरण का मुख्य केन्द्र तो एक अख़बार वाला है जो इस विरल बस्ती में भी मात्र मुझको अख़बार देने के लिए प्रात: 4:30 बजे के लगभग आ जाता था। प्रात:काल जिस समय वह अख़बार देने आता था उस समय मैं उसको अपने मकान की 'गैलरी' में टहलता हुआ मिल जाता था। अत: वह मेरे आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए मेरे आवास में अख़बार फेंकता और मुझको *'नमस्ते बाबू जी'* वाक्य से अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था।  क्रमश: समय बीतने के साथ मेरे सोकर उठने का समय बदल कर प्रात: 5:0 बजे हो गया। जब कई दिनों तक मैं उसको प्रात: टहलते नहीं दिखा तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:0 बजे वह मेर...

सबसे अनमोल

  अशोक जी अपनी पत्नी के  साथ अपनी रिटायर्ड जिंदगी बहुत हँसी खुशी गुजा़र रहे थे...उनके तीनों बेटे अलग अलग शहरों में अपने अपने परिवारों के साथ थे...उन्होनें नियम बना रखा था....दीपावली पर तीनों बेटे सपरिवार उनके पास आते थे...वो एक सप्ताह कैसे मस्ती में बीत जाता था...कुछ पता ही नही चलता था। कैसे क्या हुआ...उनकी खुशियों को जैसे नज़र ही लग गई... अचानक शीला जी को दिल का दौरा पड़ा ...एक झटके में उनकी सारी खुशियाँ बिखर गईं। तीनों बेटे दुखद समाचार पाकर दौड़े आए...उनके सब क्रिया कर्म के बाद सब शाम को एकत्रित हो गए...बड़ी बहू ने बात उठाई,"बाबूजी, अब आप यहाँ अकेले कैसे रह पाऐंगे... आप हमारे साथ चलिऐ।" "नही बहू, अभी यही रहने दो...यहाँ अपनापन लगता है... बच्चों की गृहस्थी में...।" कहते कहते वो चुप से हो गए... बड़ा पोता कुछ बोलने को हुआ...उन्होंने हाथ के इशारे से उसे चुप कर दिया... "बच्चों, अब तुम लोगों की माँ हम सबको छोड़ कर जा चुकी हैं... उनकी कुछ चीजें हैं... वो तुम लोग आपस  में बांट लो...हमसे अब उनकी साजसम्हाल नही हो पाऐगी।" कहते हुए अल्मारी से कुछ निकाल कर लाए....मखमल के थै...

ज़िन्दगी की शाम ढलने को है

किसी बात पर पत्नी से चिकचिक हो गई, वह बड़बड़ाते घर से बाहर निकला, सोचा कभी इस लड़ाकू औरत से बात नहीं करूँगा, पता नहीं समझती क्या है खुद को? जब देखो झगड़ा, सुकून से रहने नहीं देती। नजदीक के चाय के स्टॉल पर पहुँच कर चाय ऑर्डर की और सामने रखे स्टूल पर बैठ गया.  आवाज सुनाई दी - *"इतनी सर्दी में बाहर चाय पी रहे हो?"* उसने गर्दन घुमा कर देखा तो साथ के स्टूल पर बैठे बुजुर्ग उससे मुख़ातिब थे.  *"आप भी तो इतनी सर्दी और इस उम्र में बाहर हैं."* बुजुर्ग ने मुस्कुरा कर कहा *"मैं निपट अकेला, न कोई गृहस्थी, न साथी, तुम तो शादीशुदा लगते हो."*  *"पत्नी घर में जीने नहीं देती, हर समय चिकचिक,बाहर न भटकूँ तो क्या करूँ?"* गर्म चाय के घूँट अंदर जाते ही दिल की कड़वाहट निकल पड़ी. बुजुर्ग-: *"पत्नी जीने नहीं देती?"* *"बरखुरदार ज़िन्दगी ही पत्नी से होती है. आठ बरस हो गए हमारी पत्नी को गए हुए, जब ज़िंदा थी, कभी कद्र नहीं की, आज कम्बख़्त चली गयी तो भूलाई नहीं जाती, घर काटने को होता है, बच्चे अपने अपने काम में मस्त, आलीशान घर, धन दौलत सब है पर उसके बिना कुछ मज़ा नहीं, य...

बूढ़े माँ-बाप के पास,

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 बूढ़े माँ-बाप के पास, आखिरी बचा सहारा , बस यही एक मकान है, जिसमें सजा बरसों बरस से, पुराना सा कुछ सामान है! कुछ फर्नीचर है दीमक खाया, हिलती मेज के बीच रखा  प्लास्टिक का एक गुलदान है! दालान में खड़ी शीशम की  अलमारी में माँ के हाथों डाला  आंवले के मुरब्बे भरा  पुराना रंगीन काँच का  एक मर्तबान है! पिछवाड़े में खड़ा बरसों से हरा सा था जो एक लैंब्रैटा, अब सफेद होकर लगता जैसे घर से बेघर होकर  सहारा तलाशता मेहमान है ! पड़े हैं संदूकों में कई छोटे मोजे, चार फ्राक, एक निक्कर , तीन टोपे छुटकी की छटी का पीला झबला एक पुड़िया में घर के शुभ को रखी  बड़के की आँवनाल है! एक काजल की डिबिया है  सूखी बादाम वाली महक जिसमें से आती है  आज भी मंझली वाली ! दीवारों की किरचों से झाँकते, कई परतों के झड़ते रंग, अलग-अलग जीवन के दौरों की  कहानी सुनाते जैसे कोई निगहबान है ! सहारे सारे साथ छोड़ गए  अब इनके लाठी में बसते प्राण हैं ! बस यही सब बचा-खुचा सा जीने को जरूरी ये सामान है ! बूढ़े माता-पिता के पास, आखिरी बचा सहारा , बस यही एक मकान है, जिसमें सजा बरसों ब...

न जाति की बेड़ी पैरों में, न पाँति का मोहर ठप्पा था

 न जाति की बेड़ी पैरों में, न पाँति का मोहर ठप्पा था- आया जब माँ की कोख में तब, केवल इंसान का बच्चा था आया सुमधुर किलकारी संग, था खाली हाथ बदन नंगा जगत के पापों से अनजान,निष्पाप निर्मल निर्झर गंगा मासूम वचन, चंचल थिरकन, वह ठुमक-ठुमक चलना उसका, वह चाँद कभी पूर्णिमा, कभी रजनी बनकर छुपना उसका, वह खालिस था इंसान जो अब कई पदों का दावेदार बना, सिलनेवाली इक सूई थी वह,ना जाने कब तलवार बना। असहाय, सहज, अनभिज्ञ, विचलित,मासूम बड़ा कोमल-सा है, मन कोंपल, तन माकूल,अनुज वह,अद्भुत,तुला दोलन-सा है। वह जिज्ञासा का पुंज,प्रश्न का तोप निश्छल दिवाली है- वह षड्यंत्रों से दूर, सहज, निर्भय एवम पनियाली है। वह बालक जग की नीँव अपनपा,दबा-दबा रह जाता है, सब बड़ों का विचलित खेल अनबुझा, कभी समझ कहां पाता है। टूटे तारे-जैसा निर्दोष, निरुद्देश्य भटकता रहता है- कभी विरोध, कभी गुस्सा, कभी आंखें मूंदे सब सहता है। वह माँ के विद्यालय का पहला छात्र, अनंत मासूम-सा वह- वह जिगर का टुकड़ा, आंख का तारा, दंत-बीच मजलूम-सा वह। गंगा की निश्चल धार में वह, निष्पाप कभी बह जाता है, वह भय अपार जो शत्रु-हाथ या दैत्य-पाश चढ़ जाता है। वह मात...

Evening Rain

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  The night will be sweet If the ceilings rains decides to beet Pity pity patter patter Pity pity patter patter Shrinking profusely from the skies As go to bed is its best advice Workers rushing home for dinner Rush this might be its beginner  The busy street all empty Restaurants vacuous absolutely Now every men will be at home Lying on their wives foam No late night returning Every reasons are under adjourning The kids will see Dad return so early Mum offers late dinner barely Love love the ceilings sings Family is the first before other things Pity pity patter patter all along Pity pity patter patter like a song Rainy evenings seems to be complete Because in togetherness happiness fits  The family will be together again Having awesome moments planned by the rain. ANKIT VERMA
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 पचपन --------- पचपन पार का पुरुष व्यस्त रखता है स्वयं को, अखबार के पलटते पन्नों में, टीवी के बदलते चैनलों में, टैक्स और इंश्योरेंस की रसीदों में, पुराने किस्से बांचकर मिली तारीफों में! पचपन पार का पुरुष  समेटता है स्वयं को, आसपास पसरे मौन में, नए बने चश्मे के फ्रेम में, कनौतियों पर छितरे सफेद शेड में, कमीज़ के एक नए शेप में ! पचपन पार का पुरुष खोजता है स्वयं को, जीवन साथी के छूटे प्रेम में, बच्चों संग खेले बचपन के गेम में, पुरानी एलबम के फोटो फ्रेम में ! अंजान झलक जो छूटी थी ट्रेन में! पचपन पार का पुरुष, ढालता है स्वयं को, पुराने गीतों की नई धुनों के बोल में, पुराने रिश्तों को पहनाए नए खोल में, अपनी अहमियत के घटते मोल में , दाम ठहराकर तराजू के घटते तोल में ! पचपन पार का पुरुष, दूर करता है स्वयं को, अनायास दस्तक देते  ठहाकों से , छोटों से चलती बेबाक मजाकों से , यारों से होती नियमित मुलाकातों से, दिल में करवट लेते रूमानी जज़्बातों से! पचपन पार का पुरुष, आँकता है स्वयं को, कुछ गलत लिए फैसलों में, अपनों से मिले हौंसलों में, दुनिया के बनाए ढकोसलों में, दरार देखकर अपने ही बनाए...

Where did they fail?

 He is dead She is in jail What went wrong Where did they fail? They were both middle class In a way they were the same Bright and intelligent Just looking for money and fame. They just chose the wrong set Of people around them So totally unaware that It could lead to mayhem The glitz misled them The ‘friends’ were all fake Dope and substance abuse All for ‘keeping up’ sake The big guys are out there Having parties and fun Who cares if families are broken They are safe, they do not have to run So maybe we should tell our kids To dream and dream high But check their own parachutes Before they take off for the sky.