पचपन

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पचपन पार का पुरुष

व्यस्त रखता है स्वयं को,

अखबार के पलटते पन्नों में,

टीवी के बदलते चैनलों में,

टैक्स और इंश्योरेंस की रसीदों में,

पुराने किस्से बांचकर मिली तारीफों में!


पचपन पार का पुरुष 

समेटता है स्वयं को,

आसपास पसरे मौन में,

नए बने चश्मे के फ्रेम में,

कनौतियों पर छितरे सफेद शेड में,

कमीज़ के एक नए शेप में !


पचपन पार का पुरुष

खोजता है स्वयं को,

जीवन साथी के छूटे प्रेम में,

बच्चों संग खेले बचपन के गेम में,

पुरानी एलबम के फोटो फ्रेम में !

अंजान झलक जो छूटी थी ट्रेन में!


पचपन पार का पुरुष,

ढालता है स्वयं को,

पुराने गीतों की नई धुनों के बोल में,

पुराने रिश्तों को पहनाए नए खोल में,

अपनी अहमियत के घटते मोल में ,

दाम ठहराकर तराजू के घटते तोल में !


पचपन पार का पुरुष,

दूर करता है स्वयं को,

अनायास दस्तक देते  ठहाकों से ,

छोटों से चलती बेबाक मजाकों से ,

यारों से होती नियमित मुलाकातों से,

दिल में करवट लेते रूमानी जज़्बातों से!


पचपन पार का पुरुष,

आँकता है स्वयं को,

कुछ गलत लिए फैसलों में,

अपनों से मिले हौंसलों में,

दुनिया के बनाए ढकोसलों में,

दरार देखकर अपने ही बनाए घोंसले में !


और इसी के साथ, पचपन पार का पुरुष धीरे धीरे अपने बचपन की ओर वापसी भी करने लगता है


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