बूढ़े माँ-बाप के पास,

 बूढ़े माँ-बाप के पास,


आखिरी बचा सहारा ,

बस यही एक मकान है,

जिसमें सजा बरसों बरस से,

पुराना सा कुछ सामान है!


कुछ फर्नीचर है दीमक खाया,

हिलती मेज के बीच रखा 

प्लास्टिक का एक गुलदान है!


दालान में खड़ी शीशम की 

अलमारी में माँ के हाथों डाला 

आंवले के मुरब्बे भरा 

पुराना रंगीन काँच का 

एक मर्तबान है!


पिछवाड़े में खड़ा बरसों से

हरा सा था जो एक लैंब्रैटा,

अब सफेद होकर लगता

जैसे घर से बेघर होकर 

सहारा तलाशता मेहमान है !


पड़े हैं संदूकों में कई छोटे मोजे,

चार फ्राक, एक निक्कर , तीन टोपे

छुटकी की छटी का पीला झबला

एक पुड़िया में घर के शुभ को रखी 

बड़के की आँवनाल है!


एक काजल की डिबिया है 

सूखी बादाम वाली

महक जिसमें से आती है 

आज भी मंझली वाली !


दीवारों की किरचों से झाँकते,

कई परतों के झड़ते रंग,

अलग-अलग जीवन के दौरों की 

कहानी सुनाते जैसे कोई निगहबान है !


सहारे सारे साथ छोड़ गए 

अब इनके लाठी में बसते प्राण हैं !

बस यही सब बचा-खुचा सा

जीने को जरूरी ये सामान है !


बूढ़े माता-पिता के पास,

आखिरी बचा सहारा ,

बस यही एक मकान है,

जिसमें सजा बरसों बरस से,

पुराना सा कुछ सामान है

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