न जाति की बेड़ी पैरों में, न पाँति का मोहर ठप्पा था

 न जाति की बेड़ी पैरों में, न पाँति का मोहर ठप्पा था-

आया जब माँ की कोख में तब, केवल इंसान का बच्चा था


आया सुमधुर किलकारी संग, था खाली हाथ बदन नंगा

जगत के पापों से अनजान,निष्पाप निर्मल निर्झर गंगा


मासूम वचन, चंचल थिरकन, वह ठुमक-ठुमक चलना उसका,

वह चाँद कभी पूर्णिमा, कभी रजनी बनकर छुपना उसका,


वह खालिस था इंसान जो अब कई पदों का दावेदार बना,

सिलनेवाली इक सूई थी वह,ना जाने कब तलवार बना।


असहाय, सहज, अनभिज्ञ, विचलित,मासूम बड़ा कोमल-सा है,

मन कोंपल, तन माकूल,अनुज वह,अद्भुत,तुला दोलन-सा है।


वह जिज्ञासा का पुंज,प्रश्न का तोप निश्छल दिवाली है-

वह षड्यंत्रों से दूर, सहज, निर्भय एवम पनियाली है।


वह बालक जग की नीँव अपनपा,दबा-दबा रह जाता है,

सब बड़ों का विचलित खेल अनबुझा, कभी समझ कहां पाता है।


टूटे तारे-जैसा निर्दोष, निरुद्देश्य भटकता रहता है-

कभी विरोध, कभी गुस्सा, कभी आंखें मूंदे सब सहता है।


वह माँ के विद्यालय का पहला छात्र, अनंत मासूम-सा वह-

वह जिगर का टुकड़ा, आंख का तारा, दंत-बीच मजलूम-सा वह।


गंगा की निश्चल धार में वह, निष्पाप कभी बह जाता है,

वह भय अपार जो शत्रु-हाथ या दैत्य-पाश चढ़ जाता है।


वह मात-पिता के द्वंद्व-मध्य अंतहीन कसक बन जाता है,

प्रसन्न बदन,मझधार, कभी अनजान क्षितिज कहलाता है।


कच्ची मिट्टी का पुतला वह, बस प्रेम का ही हकदार है वह,

वह नवकुंजन, वह कमल-नयन,उसका भी तो अधिकार है सम।


सब उसको बालक समझें, वह तूफानों को छल जाता है,

नौ महीनों के गर्भ-गृह से ही, कई नामों से बंध जाता है ,


वह बाल-श्रम, यौवन-शोषण, जाने कितना कुछ सह जाता,

अस्तित्व के संकट को झेले, अभिशापों में भी पल जाता।


वह देख-सुन हतप्रभ सब राज,कहां, किसे कह पाता है-

वह शान्त-तनय, मन आंदोलित, बस घुट-घुटकर रह जाता है।।

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