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Showing posts from October, 2025

स्त्रियां

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 कुछ स्त्रियां अब भी थोड़ी पुरानी स्त्रियां हैं  उनकी साड़ियां बहुत सुंदर होती हैं  लेकिन उनके ब्लाउज़ डीप कट वाले नहीं होते  वे नहीं दिखाती अपनी टांगें  वे शराब या सिगरेट नहीं पीतीं  फेसबुक पर अकाउंट तो बनाती हैं  लेकिन स्क्रीनशॉट स्क्रीनशॉट नहीं खेलतीं  वे ऐसी किसी भी बहस में हिस्सा नहीं लेतीं  कि स्त्रियों को पुरुष संतुष्ट कर पाते हैं या नहीं  उनके लिए शरीर शरीर जितना ही है  उनकी आत्मा आत्मा से भी बहुत सूक्ष्म है  वे अभी नहीं सीख सकी हैं कॉल रिकॉर्डिंग  उन्हें महिला थाने के नाम से भी डर लगता है  वे अपने बच्चों को तारक मेहता का उल्टा चश्मा दिखा रही हैं  उनके फोन उनके बच्चे और उनके पति भी चलाते हैं  वे सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं  लेकिन उनके दोस्तों में सिर्फ़ कुछ परिजन हैं और बहुत जानकर लोग उनके नंबर अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं  उनके फोन की गैलरी अपने बच्चों और पति की फोटोज से भरी पड़ी है  वे सुबह जल्दी उठ रही हैं  वे खाना बना रही हैं  वे टिफिन बांध रही हैं  वे बच्चों को स्कूल भे...

शराब अच्छी लगती थी

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 शराब पीकर मैंने ऐसे-ऐसे कारनामे किये जिनके लिए अब माफ़ी तक नहीं माँगी जा सकती. उनकी याद से भी गहरी शर्मिंदगी होती है. अल्कॉहोलिक बन चुका था. पंद्रह बरस पहले यह हालत हो गई थी मेरे नज़दीकी पीठ पीछे बाकायदा भविष्यवाणी करने लगे थे मैं तीन-चार साल में मर जाऊँगा.  शराब अच्छी लगती थी. बहुत अच्छी लगती थी. दुनिया भर की शराबों के बारे में जानना और उन्हें चखना पसन्द था. बांज और धुंए की लम्बी संगत से पैदा हुई सिंगल मॉल्ट #व्हिस्की की महक प्राणवायु लगती थी. अपने जीवन में बढ़िया शराबों को मैंने वफ़ादार माशूकाओं से भी ज्यादा नाज़ के साथ जगह दी.  पीते हुए शराब को हमेशा डिफेंड किया. सारे दोस्त पीते थे. शुरू-शुरू में लगता था कि एक बार साथ पी लेने पर कोई भी व्यक्ति आपका अन्तरंग दोस्त बन जाता है. इस बात को समझने में कई बरस लगे कि मैं गलत सोचता था. ऐसे बहुत से हरामखोर थे जो पीते तो मेरी थे लेकिन खुद सच्चे गृहस्थ और शरीफ-सफल नागरिक बने रह कर मुझे शराबी घोषित किया करते. इस मामले में मेरी तुलना उस लेब्राडोर कुत्ते से की जा सकती है जो घर में घुसे चोर को देख कर भी दुम हिलाने लगता है. शुरुआती जीवन की स...

बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है

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 मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ चाट के ठेले पर दहीबड़े खा रहा था। अचानक ठेले वाले ने अपने बीस-बाईस साल के बेटे को खींचकर थप्पड़ मारा और झुँझलाते हुए बोला, तुझे कितनी बार समझाया है कि कांजी के पानी वाला कुरछा दहीबड़ों में मत डाला कर। इसका अलग कुरछा रखा है न। पिता का यह व्यवहार देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा, भाई साहब, यह सही बात नहीं है। यहाँ भरी सड़क पर जवान बेटे को थप्पड़ मारना मूर्खता है।मेरी बात सुनकर ठेलेवाले की आँखों में आँसू आ गए। वह भरे गले से बोला, क्या करूँ साहब, जब यह बार-बार गलती करता है तब मुझसे रहा नहीं जाता। एम.ए. कर रहा है फिर भी चूक करता है। शायद अब मैं भी ज़रा चिड़चिड़ा हो गया हूँ। पिता के आँसू देख लड़का मेरी ओर मुड़ा और गुस्से में बोला, गलत मेरे पापा नहीं हैं साहब, गलत आप हैं जो एक बेटे के सामने बाप को गलत सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। यह मेरे पिता हैं। इनका मुझ पर पूरा हक है। ये चाहे मुझे थप्पड़ मारें या डाँटें, मुझे कोई शिकायत नहीं। जब मुझे शिकायत नहीं है तो आप क्यों टोक रहे हैं। और सुन लीजिए, बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है । इतना कहकर...

ज्ञानी झुकता है ताकि तुम्हें झुका सके।

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 बुद्ध घर वापिस लौटे बारह वर्ष के बाद।  तो बुद्ध ने आनंद से कहा, महल मुझे जाना होगा।  यशोधरा बारह वर्ष से प्रतीक्षा करती है। मैं उसका पति न रहा, लेकिन वह अभी भी मेरी पत्नी है। यह ज्ञानी और अज्ञानी की समझ है। मैं उसका पति न रहा। अब तो मैं कुछ भी नहीं हूं। न किसी का पति हूं, न किसी का पिता हूं, न किसी का बेटा हूं, लेकिन वह अब भी मेरी पत्नी है। उसका भाव अभी भी वही है। और वह नाराज बैठी है।  बारह साल का क्रोध इकट्ठा है। और उसका क्रोध स्वाभाविक है क्योंकि एक रात अचानक मैं घर छोड़कर भाग गया उससे बिना कहे। वह माननीय है, राजघर की है, राजपुत्री है, बड़ी अहंकारी है। और उसको भारी आघात लगा है। उसने किसी से एक शब्द भी नहीं कहा, वह कोई छोटे घर की अकुलीन महिला नहीं है। बुद्ध के जाने के बाद यशोधरा ने बुद्ध के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा। बारह वर्ष चुप रही। इस बात को उठाया ही नहीं। बुद्ध के पिता भी चकित, बुद्ध के परिवार के और लोग भी चकित। साधारण घर की स्त्री होती, छाती पीटती, रोती, चिल्लाती, हल्की भी हो जाती। असाधारण थी। यह बात किसी और से कहने की तो थी ही नहीं।  यह बुद्ध और उसके बीच का ...

"अंधता में एकता"

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 सुना था भारत विविधताओं का देश है - जाति, धर्म, लिंग और वर्ग में बँटा हुआ। पर अब महसूस होता है कि, हम सब भले ही अलग-अलग खानों में बँटे हों, पर समान मानसिकता से एकजुट हैं। (Differentiated by Caste, gender, religion & class but united by mindset) यह मानसिकता है - असहिष्णुता, नफ़रत और चयनात्मक न्याय की। पिछले हफ्ते एक ख़बर ने मुझे झकझोर दिया- एक वकील साहब ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर जूता फेंक दिया। और जूते के साथ "सनातन जिंदाबाद" के नारे लगे। जूता एक इंसान पर नहीं, बल्कि संविधान, न्याय और दलित अस्मिता पर उछाला गया था। फिर भी कई लोग ताली बजा रहे थे, स्टेटस लगा रहे थे -◆ "जय हो ! धर्म की रक्षा हो गई!" सोचिए ज़रा - अगर वही जूता फेंकने वाला "अल्लाह-हु-अकबर" बोलता, या "लाल सलाम" का नारा देता, या "जय भीम" की आवाज़ उठाता - तो आज वह व्यक्ति "देशद्रोही", "आतंकी", "नक्सली" और न जाने क्या-क्या कहलाता। UAPA लगाकर जेल में डाल दिया जाता, और टीवी डिबेट में उसकी नस्ल तक का विश्लेषण हो जाता। कल्पना कीजिए- अगर उस कुर्...

ऐसे तो नहीं चलेगा न।

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 पिछले दिनों सोना 56% के करीब ऊपर गया। प्रॉपर्टी और स्टॉक्स में भी उछाल आया। लेकिन सैलरी 6-7% की दर से कम हुई। जिन्हें मार्केट रेट से बढ़ना चाहिए वो नहीं बढ़ रही। कंपनियां हायरिंग बंद कर रही हैं। ज्यादा स्किल्ड लोग कम सैलरी में नौकरी करने को मजबूर है जिसके चलते कम स्किल्ड और अनुभवी लोगों, नए नए कॉलेज से निकले बच्चों को जायज नौकरी नहीं मिल रही है। इस सब में मिडिल क्लास पिछड़ रहा हैं। उसे पता नहीं है लेकिन वो धीरे धीरे गरीबी की तरफ बढ़ रहा है। सरकार टैक्स बढ़ाती जा रही है। GST हो या इनकम टैक्स , सरकार अपनी आमदनी को पूरी तरह रेग्यूलेट कर रही है। लेकिन कर्मचारियों की आमदनी को भगवान भरोसे छोड़ा हुआ है। उनके वेजेज/तनख्वाह को रेग्यूलेट नहीं कर रही। न उनको मिलने वाली कोईं सुविधा रेग्यूलेटेड है। टैक्स का मारा उद्योगपति भी कर्मचारियों सेअमानवीय ढंग से काम करवाना चाहता है। ताकि उसका मुनाफा बढ़ सके। वो एक ही आदमी से डबल शिफ्ट और काम के घंटे बढ़वाना चाहता है। उद्योगपति कह रहा की इतवार को भी काम करो। घर बैठ के बीवी का मुंह देखोगे क्या। महिलाओं की भी नाइट शिफ्ट शुरू करो। ये सब एक चैन है। ऊपर से न...

गांधी जी बनाम आम्बेडकर

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  ... जिन्ना को केवल मुसलमानों की चिन्ता थी, सावरकर को केवल हिन्दुओं की, आम्बेडकर को केवल दलितों की। अकेले गांधी जी ऐसे थे, जिन्हें पूरे हिन्दुस्तानी समाज की चिन्ता थी। अकेले गांधी जी ऐसे थे, जो हर क़ीमत पर अपने समाज को जोड़कर रखना चाहते थे। अकेले गांधी जी की दृष्टि व्यापक, संश्लेषी और दूरंदेशी थी। और अकेले गांधी जी ही ऐसे हैं, जिन्हें आज हिन्दुत्ववादियों, आम्बेडकरवादियों और मुसलमानों- सभी ने त्याग दिया है। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी भी अब गांधीवादी मार्ग के बजाय आम्बेडकरवादी मार्ग की ओर अधिक झुकने लगी है। व्यापक-सत्य का मार्ग ऐसा ही कंटकांकीर्ण और एकाकी होता है! 1932 का पूना पैक्ट भारतीय राजनीति की एक केन्द्रीय महत्त्व वाली घटना थी। इसने गांधी जी और आम्बेडकर को एक-दूसरे के समक्ष संघर्ष की स्थिति में ला दिया। बदले रूपों और परिप्रेक्ष्यों में वह संघर्ष आज भी जारी है। लेकिन तथ्य यह है कि ब्रिटिश राज की विभाजनकारी रणनीति को लेकर जितनी सूक्ष्म और गहरी समझ गांधी जी की थी, वैसी उनके समकालीनों की नहीं थी। गांधी समन्वयकारी थे। वे स्वीकारते थे कि भारतीय समाज में अंतर्विरोध थे, लेकिन इन अंतर...

“स्नेहाद् बन्धः शरीरस्य।”

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 बुजुर्गों में कब्ज़ एक आम शिकायत है। यह समस्या चालीस के बाद पकड़ने लगती है। तब कोई ना कोई चूरन या गोली लेने से आराम मिल जाता है, फिर उसकी डोज़ डबल, फिर उससे ज़्यादा होते-होते एक समय ऐसा आता है जब कुछ काम नहीं करता। लेकिन आयुर्वेद की दृष्टि में यह केवल पेट की नहीं, पूरे जीवन की गति के ठहर जाने की कहानी है। कई इसके कारण अवसाद में चले जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कभी भी जाना पड़ सकता है। इस डर से वे मिलना-जुलना तक सीमित कर देते हैं। यहीं से एक दुष्चक्र की शुरुआत हो जाती है, फिर यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि रोग आंत में है या मन में। आयुर्वेद में कहा गया हैं, “वायुस्तु वृद्धे प्रशस्यते”, यानी वृद्धावस्था में वात दोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। जब शरीर की धातुएँ क्षीण होने लगती हैं, रस का पोषण घट जाता है और अग्नि मंद होती है, तब वही वात जो पहले शरीर को गतिमान रखता था अब रोध उत्पन्न करता है। वही वात जब कोलन में स्थिर होता है, तब मल का गमन कठिन हो जाता है। यही वातज मलबद्धता है। ऐसे ही जब मांस और स्नायु शिथिल होते हैं तो शरीर की गति और लचक कम हो जाती है और तब वात का अतिक्रमण होकर ...

"घर के खाने की अहमियत"

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 अमेरिका जैसे देशों में जा कर बसने वाले भारतीय, जो बहुत अच्छा कमाते हैं वहां, वो भी जल्दी "कामवाली" वहां अफोर्ड नहीं कर पाते हैं.. जो थोड़ा अफोर्ड कर पाते हैं वो बस हफ्ते या दो हफ्ते में एक दिन कामवाली को खाना बनाने के लिए बुलाते हैं और एक हफ्ते से लेकर दस से पंद्रह दिन का खाना उस से बनवा के रख लेते हैं.. वो उस से सब्ज़ी, दाल, मांस और ऐसी चीज़ें बनवा के स्टोर कर लेते हैं फ्रिज में और फिर रोज़ स्वयं या तो चावल ताज़ा बना लेते हैं या फिर मॉल से लाई हुई, जमी हुई यानी फ़्रोज़न रोटी सेंक कर सब्ज़ी, दाल या मांस के साथ खा लेते हैं अमेरिका में किसी के पास समय नहीं होता है तीन समय खाना बनाने का.. एक व्यक्ति अगर एक छोटे से, यानि चार लोगों के परिवार के लिए भी अगर तीन समय खाना बनाता है, यानि सुबह नाश्ता, दोपहर का खाना और रात का डिनर तो उसे कम से कम दिन के पांच या छः घंटे देने होने हैं खाना पकाने के लिए.. अमेरिका में किसी के पास इतना समय नहीं होता है जो भारत में तीनों टाइम गरम रोटी और घर के बने खाने की वकालत करते हैं वो भी अमेरिका जा कर एक हफ़्ते का फ़्रीज़ किया हुआ खाना बड़े शौक से खाते हैं....

हम आप तो तमाशा देखने वाले हैं ही!

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 पद्मविभूषण छन्नू लाल मिश्र का परिवार लड़ मरा कि अंतिम संस्कार का पैसा कौन दे। तेरहवीं कौन कराए। कुल 25 हजार के भुगतान के लिए भाई बहन एक दूसरे का माथा फोड़ रहेसोचिए पीएम, सीएम से लेकर सोशल मीडिया पर बड़े बड़े पत्रकार छन्नूलाल मिश्र पर अपने संबंधों और उनकी तारीफ़ के ढोल पीट रहे थे. यह समाज कितना खोखला है कि अंतिम संस्कार के 25000 रूपये तक की व्यवस्था नहीं कर पाया. तेरहवीं का ख़र्चा कौन करे के लिए बेटा बेटी लड़ रहे हैं. इससे क्या सीख मिल रही है बच्चों को पारिवारिक मूल्य समझाओ यह मत बताओ कि पड़ोसी या फुआ और मौसा का बेटा इतना कमा रहा है. बच्चों को कामयाब और पारिवारिक संस्कार दो। 1. तुष्टिकरण की आदत के बाद विक्टिम कार्ड निश्चित है! 2. मेरी बेटी बेटे से कम है क्या ऐसा बोलकर बेटे को इग्नोर करना। 3. दहेज भी बेटे से त्याग कर दिलवाना और अपनी कमाई बेटी को बीच बीच में एक्सपोर्ट करना। 5. बेटे और बेटी को संस्कार दे दिए पर अगर बहु और दामाद कुसंस्कारी मिल गया तो आप क्या करेंगे। 6. मरते मरते बेटा बेटी के बीच उत्पन्न खाई को विरासत के रूप में छोड़कर जाना। सबका परिणाम यही होना है बाकी हम आप तो तमाशा द...

भगवान के घर देर जरूर है पर अन्धेर नहीं है...

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 " दुनिया गोल है " सेठ ने अभी दुकान खोली ही थी कि एक औरत आई और बोली :-    "सेठ जी यह अपने दस रुपये लो".. सेठ उस गरीब सी औरत को प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगा,जैसे पूछ रहा हो कि ... मैंने कब तुम्हे दस रुपये दिये? औरत बोली :- कल शाम को मै सामान ले कर गई थी... तब आपको सौ रुपये दिये थे, 70 रुपये का सामान खरीदा था ... आपने 30 रुपये की जगह मुझे 40 रुपये वापस दे दिये।  "सेठ ने दस रुपये को माथे से लगाया,फिर गल्ले मे डालते हुए बोला कि एक बात बताइये बहन जी?  आप सामान खरीदते समय कितने मोल भाव कर रही थी। पाँच रुपये कम करवाने के लिए आपने कितनी बहस की थी,और अब यह दस रुपये लौटाने चली आई ???? औरत बोली :- "पैसे कम करवाना मेरा हक है" मगर एक बार मोल भाव होने के बाद, "उस चीज के कम पैसा देना पाप है। सेठ बोला ... " लेकिन, आपने कम पैसे कहाँ दिये? आपने पूरे पैसे दिये थे,यह दस रुपया तो मेरी गलती से आपके पास चला गया...रख लेती,तो मुझे कोई फर्क नही पड़ने वाला था " औरत बोली :- " आपको कोई फर्क नही पड़ता ? मगर मेरे मन पर हमेशा ये बोझ रहता कि मैंने जानते हुए भी,आप...