"अंधता में एकता"

 सुना था भारत विविधताओं का देश है - जाति, धर्म, लिंग और वर्ग में बँटा हुआ। पर अब महसूस होता है कि, हम सब भले ही अलग-अलग खानों में बँटे हों, पर समान मानसिकता से एकजुट हैं। (Differentiated by Caste, gender, religion & class but united by mindset) यह मानसिकता है - असहिष्णुता, नफ़रत और चयनात्मक न्याय की।


पिछले हफ्ते एक ख़बर ने मुझे झकझोर दिया- एक वकील साहब ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर जूता फेंक दिया। और जूते के साथ "सनातन जिंदाबाद" के नारे लगे। जूता एक इंसान पर नहीं, बल्कि संविधान, न्याय और दलित अस्मिता पर उछाला गया था। फिर भी कई लोग ताली बजा रहे थे, स्टेटस लगा रहे थे -◆ "जय हो ! धर्म की रक्षा हो गई!"


सोचिए ज़रा - अगर वही जूता फेंकने वाला "अल्लाह-हु-अकबर" बोलता, या "लाल सलाम" का नारा देता, या "जय भीम" की आवाज़ उठाता - तो आज वह व्यक्ति "देशद्रोही", "आतंकी", "नक्सली" और न जाने क्या-क्या कहलाता। UAPA लगाकर जेल में डाल दिया जाता, और टीवी डिबेट में उसकी नस्ल तक का विश्लेषण हो जाता।


कल्पना कीजिए- अगर उस कुर्सी पर कोई सवर्ण चीफ जस्टिस बैठा होता, तो "जूता फेंकने" की जगह "राष्ट्र पर हमला" लिखा जाता। राष्ट्रवाद का सागर उमड़ पड़ता, देशभक्ति की लहरें उठतीं, और वही लोग जो आज वकील के साथ खड़े हैं, कल मोमबत्तियाँ जलाकर संविधान बचाने निकल पड़ते।


और फिर कल की ख़बर नेता दीपिका झा ने अम्बेडकर कॉलेज के प्रोफेसर को थप्पड़ जड़ दिया, वह भी पुलिस की मौजूदगी में! वो हाथ सिर्फ एक गाल पर नहीं पड़ा, वो लोकतंत्र के गाल पर पड़ा था। पर क्या हुआ? कुछ नहीं। क्योंकि अब हम उस दौर में हैं जहाँ ताकतवर लोग कानून से नहीं, कानून ताकतवर लोगों से डरता है। और पर्दे के पीछे कोई तो है, जो इन "वीरों" को फुसफुसाकर कह रहा है - "तुम करो, बाक़ी हम देख लेंगे।" दिल्ली यूनिवर्सिटी में ABVP की छात्र


सच तो यह है कि हम अब मूढ़ता के उस शिखर पर पहुँच गए हैं जहाँ विवेक शर्म से सिर यकाए बैठा है और संवेदनशीलता का शोक मनाया जा चुका है। हमने इंसानियत की लाश पर राजनीति की चादर ओढ़ा दी है।


अब लोग जाति, लिंग, धर्म और वर्ग से भले अलग हैं पर मानसिकता से सब एक हैं: भीड़ का हिस्सा, विवेक का अभाव, और नफ़रत का प्रवाह।


अगर यही राह रही, तो आने वाले दिनों में हमारी एकता "विविधता में एकता" की नहीं, बल्कि "अंधता में एकता" की मिसाल बनेगी।


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