गांधी जी बनाम आम्बेडकर
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जिन्ना को केवल मुसलमानों की चिन्ता थी, सावरकर को केवल हिन्दुओं की, आम्बेडकर को केवल दलितों की। अकेले गांधी जी ऐसे थे, जिन्हें पूरे हिन्दुस्तानी समाज की चिन्ता थी। अकेले गांधी जी ऐसे थे, जो हर क़ीमत पर अपने समाज को जोड़कर रखना चाहते थे। अकेले गांधी जी की दृष्टि व्यापक, संश्लेषी और दूरंदेशी थी। और अकेले गांधी जी ही ऐसे हैं, जिन्हें आज हिन्दुत्ववादियों, आम्बेडकरवादियों और मुसलमानों- सभी ने त्याग दिया है। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी भी अब गांधीवादी मार्ग के बजाय आम्बेडकरवादी मार्ग की ओर अधिक झुकने लगी है। व्यापक-सत्य का मार्ग ऐसा ही कंटकांकीर्ण और एकाकी होता है!
1932 का पूना पैक्ट भारतीय राजनीति की एक केन्द्रीय महत्त्व वाली घटना थी। इसने गांधी जी और आम्बेडकर को एक-दूसरे के समक्ष संघर्ष की स्थिति में ला दिया। बदले रूपों और परिप्रेक्ष्यों में वह संघर्ष आज भी जारी है। लेकिन तथ्य यह है कि ब्रिटिश राज की विभाजनकारी रणनीति को लेकर जितनी सूक्ष्म और गहरी समझ गांधी जी की थी, वैसी उनके समकालीनों की नहीं थी। गांधी समन्वयकारी थे। वे स्वीकारते थे कि भारतीय समाज में अंतर्विरोध थे, लेकिन इन अंतर्विरोधों को पाटने की उनकी युक्ति अलगाववादी नहीं थी, बल्कि यह थी कि समाज अपने विचारों और नैतिकता का परिमार्जन करे। गांधी जी चाहते थे कि हिन्दू और मुसलमान के बीच कोई फूट ना हो और हिन्दुओं और हिन्दुओं के भीतर भी एका रहे। आम्बेडकर की दलितों के राजनैतिक सशक्तीकरण की समझ इससे विपरीत थी। इसी ने उस प्रसिद्ध टकराव को जन्म दिया था।
आम्बेडकर की दलील थी कि अगर मुसलमानों को पृथक इलेक्टोरेट दिया जा सकता है तो दलितों को क्यों नहीं। यह दलील इसलिए दुरुस्त नहीं थी, क्योंकि अतीत में अगर कोई ग़लत नज़ीर क़ायम हुई हो तो ये ज़रूरी नहीं कि उसे दोहराया जाए। दूसरे, मुसलमानों को पृथक इलेक्टोरेट 1909 में (मॉर्ले-मिंटो सुधार) तब दिया गया था, जब गांधी जी भारत में भी नहीं थे। तब वो 'हिन्द स्वराज्य' लिख रहे थे और हिन्दू-मुसलमान की क़ौमी एकता पर तभी से ज़ोर दे रहे थे। वे हमेशा से पृथक इलेक्टोरेट की नीति के विरोधी रहे। जबकि मुसलमानों के लिए पृथक इलेक्टोरेट ने मुस्लिम लीग की राजनीति को मज़बूत कर दिया था और इसने कालान्तर में भारत-विभाजन के बीज रोपे।
1919 के मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों ने तो पृथक इलेक्टोरेट के दायरे को और बढ़ाकर सिखों, ईसाइयों और यूरोपियनों तक कर दिया था। लेकिन जब 1932 में दलितों को भी पृथक इलेक्टोरेट देने का प्रस्ताव रखा गया तो गांधी जी को इसका प्रतिकार करने को विवश होना पड़ा। कारण, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों के उलट गांधी जी दलितों को हिन्दू समाज से पृथक नहीं समझते थे। दलितों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने के लिए वे समाज की नैतिक-चेतना को पुकारने पर ज़ोर देते थे, राजनैतिक पृथक्करण पर नहीं। वर्तमान में आरक्षण-नीति पर जो बहस चलती है, उसके मूल में भी यही विचार है कि वर्चस्वशाली वर्ग स्वयं तो वंचित वर्गों को राजनैतिक सत्ता में हिस्सेदारी सौंपेंगा नहीं, इसके लिए किसी संवैधानिक उपकरण की आवश्यकता होगी। गांधी जी आरक्षण-नीति पर क्या मत रखते, यह तो हमें नहीं पता, लेकिन वो इतना अवश्य समझते थे समाज पर ऊपर से थोपे गए सुधार उसमें भीतर से गुणात्मक परिवर्तन नहीं लाते और विभेद के नए स्वरूपों को जन्म देते हैं।
गांधी जी ने दलितों के लिए पृथक इलेक्टोरेट के विरुद्ध यरवडा जेल में आमरण अनशन किया। आम धारणा है कि यह आम्बेडकर पर दबाव बनाने की नीति थी। किन्तु इतिहासकार बलराम नन्दा का मत है कि यह छुआछूत की समस्या पर वृहत् हिन्दू समाज की अंतरात्मा को झकझोरने के लिए था। और गांधी जी इसमें सफल रहे। पूरे देश में अनेक स्थानों पर मंदिरों, कुओं, तालाबों, सार्वजनिक स्थलों को अछूतों के लिए खोल दिया गया। मुम्बई के सात मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश के प्रश्न पर जब जनमत-संग्रह हुआ तो सवर्ण भक्तों ने भारी बहुमत से हरिजनों का मंदिर में स्वागत किया। यह गांधी जी के नैतिक आग्रह का ही फल था। रबीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे विश्व-चेतस् व्यक्ति ने भी इसमें गांधी जी का समर्थन किया था।
किन्तु आम्बेडकर ने इसे अपनी हार की तरह लिया। पूना पैक्ट के लिए वो झुके ज़रूर, लेकिन गांधी जी को इसके लिए कभी माफ़ नहीं कर पाए और अंत तक उनमें गांधी जी के प्रति कटुता रही। जबकि सच्चाई यह है कि पूना पैक्ट के बाद गांधी जी ने अपने को दलितोद्धार के कार्यों के लिए खपा दिया था। उन्होंने हरिजन आन्दोलन चलाया और देश से छुआछूत के पाप को समाप्त करने के लिए कमर कस ली। इतिहासकारों का मत है कि अगर 1932 में दलितों के लिए भी पृथक इलेक्टोरेट की माँग मान ली गई होती तो 1946-1947 में देश के सम्मुख निर्मित हुई परिस्थितियाँ और जटिल व पेचीदा हो सकती थीं।
देखें तो गांधी जी और सावरकर में भले लाख असहमतियाँ हों, एक बिंदु पर दोनों ही एकमत थे। यह कि दलित-प्रश्न पर हिन्दुओं में टूट नहीं आनी चाहिए। वे हरिजनों को एक व्यापक हिन्दू-फ़ोल्ड के भीतर रखना चाहते थे। बड़ा अंतर यह था कि गांधी मुसलमानों को भी भारतीय-राष्ट्र का अनिवार्य हिस्सा समझते थे, जबकि सावरकर का मत था कि हिन्दू और मुसलमान दो भिन्न राष्ट्र हैं। आम्बेडकर सावरकर के द्विराष्ट्र-सिद्धांत से सहमत थे किन्तु अछूतों के लिए पृथक से अधिकारों की माँग करके इस समीकरण में एक तीसरा कोण उत्पन्न करते थे। गांधी जी के लिए यह तत्समय संघर्ष का तीसरा मोर्चा था, उन्हें इसका विरोध करना ही था।
प्रसंगवश, अगर आम्बेडकर ने अपने समर्थकों के साथ इस्लाम क़बूल कर लिया होता तो भारतीय-राजनीति में भूचाल आ जाता। किन्तु उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इससे नवबौद्धों के रूप में एक नई राजनैतिक-ताक़त की उत्पत्ति हुई। बहुजन राजनीति का उदय हुआ। अगर हम स्वतंत्रता के बाद भारत की राजनीति को देखें तो पाएँगे कि 1947 से 1989 तक कांग्रेस का वर्चस्व रहा। 1989 से मण्डल-कमण्डल के उदय से बहुजन और हिन्दुत्व राजनीति को बल मिला। 2014 के बाद से हिन्दुत्व की राजनीति केंद्र में आ गई है। आज प्रश्न यह है कि बहुजन किसके साथ जाएँगे? इसी को लेकर सारी लड़ाई है। आज बँटेंगे तो कटेंगे का जो नारा बुलन्द किया जाता है, वह वास्तव में सवर्ण हिन्दुओं के लिए उतना नहीं है, जितना कि बहुजनों के लिए है। हिन्दू कोड बिल के दिशानिर्देशों में सनातनियों और आर्यसमाजियों के साथ ही बौद्धों और जैनियों को भी सम्मिलित किया गया था। इस आधार पर भाजपा नवबौद्धों को भी अपना ही मानना चाहती है, जबकि आम्बेडकरवादी नवबौद्ध आज एक बड़ी और निर्णायक राजनैतिक ताक़त हैं।
गांधीवादी चिन्तक नन्दकिशोर आचार्य के इन स्मरणीय शब्दों से अपने लेख का समापन करूँ : "दलित वर्ग के उत्थान को लेकर गांधी जी और आम्बेडकर दोनों की चिंता समान रूप से तीव्र है। लेकिन आम्बेडकर का केन्द्रीय सरोकार केवल दलितों से है, जबकि गांधी जी का पूरे समाज से। गांधी जी की दृष्टि समावेशी है, आम्बेडकर की पृथकतावादी। आम्बेडकर की पद्धति ही यह है कि वे दूसरों से कटकर ही अपने हितों की रक्षा का मार्ग ढूँढने की कोशिश करते हैं। इसी कारण वे मुसलमानों और हिन्दुओं के राजनैतिक दृष्टि से अलग हो जाने में ही हिन्दुओं का कल्याण देखते थे। उनकी पृथकतावादी चिन्तन-पद्धति सवर्ण-दलित सम्बंधों की उनकी व्याख्या और रणनीति का निर्धारण भी करती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आम्बेडकर जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष से अपने को अलग रखा था!" [ 'सत्याग्रह की संस्कृति', वाग्देवी प्रकाशन, 2010 ]


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