ऐसे तो नहीं चलेगा न।

 पिछले दिनों सोना 56% के करीब ऊपर गया। प्रॉपर्टी और स्टॉक्स में भी उछाल आया। लेकिन सैलरी 6-7% की दर से कम हुई। जिन्हें मार्केट रेट से बढ़ना चाहिए वो नहीं बढ़ रही। कंपनियां हायरिंग बंद कर रही हैं। ज्यादा स्किल्ड लोग कम सैलरी में नौकरी करने को मजबूर है जिसके चलते कम स्किल्ड और अनुभवी लोगों, नए नए कॉलेज से निकले बच्चों को जायज नौकरी नहीं मिल रही है।


इस सब में मिडिल क्लास पिछड़ रहा हैं। उसे पता नहीं है लेकिन वो धीरे धीरे गरीबी की तरफ बढ़ रहा है।


सरकार टैक्स बढ़ाती जा रही है। GST हो या इनकम टैक्स , सरकार अपनी आमदनी को पूरी तरह रेग्यूलेट कर रही है। लेकिन कर्मचारियों की आमदनी को भगवान भरोसे छोड़ा हुआ है। उनके वेजेज/तनख्वाह को रेग्यूलेट नहीं कर रही। न उनको मिलने वाली कोईं सुविधा रेग्यूलेटेड है।


टैक्स का मारा उद्योगपति भी कर्मचारियों सेअमानवीय ढंग से काम करवाना चाहता है। ताकि उसका मुनाफा बढ़ सके। वो एक ही आदमी से डबल शिफ्ट और काम के घंटे बढ़वाना चाहता है। उद्योगपति कह रहा की इतवार को भी काम करो। घर बैठ के बीवी का मुंह देखोगे क्या। महिलाओं की भी नाइट शिफ्ट शुरू करो।


ये सब एक चैन है। ऊपर से नीचे की ओर।


एक इन्वेस्टर ने निर्मला सीतारणम से पूछा कि स्टॉक खरीदने पे सरकार पैसा लेती है लेकिन जब पैसा डूब जाता है तो सरकार लॉस तो लेती नहीं। शुरुआती टैक्स को आप अंत में क्यों नहीं शिफ्ट कर देती ताकी मुनाफा के अनुसार टैक्स लगे।

जायज सवाल था लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। 


सरकार और नागरिक में बीच में ग्राहक सर्विस प्रोवाइडर का रिश्ता है। हम टैक्स देते हैं जिससे नेता लोग का गाड़ी बंगला आता है। बदले में सर्विस चाहिए। लेकिन सरकार द्वारा लेने के सारे रस्ते मजबूत हैं, ना मिल पाने पे पेनल्टी और जेल का प्रावधान है। लेकिन हमें सर्विस मिलने का कोई प्रोसीजर नहीं। कोशिश के बाद भी जा मिले तो कोई पेनल्टी नहीं, न किसी की जवाबदेही। 


ऐसे तो नहीं चलेगा न। 




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