मर्द
ये जो 2014, अतीक और नोटबंदी वाली कान्ट्रवर्सी है, ये एक न्यूक्लियर ब्लास्ट जैसा है।
इसके शुरुआती रेडीअस में जो आयेगा वो भस्म और वाष्प होगा। हड्डियाँ भी न मिलेंगी। लेकिन जब डस्ट सैटल होगी, तब धुरंधर 2 एक नई कान्ट्रवर्सी लेकर आयेगी। इसमें हार्ड कोर सूडो फेमनिस्ट्स की तरफ विलाप का शोर सुनाई देगा।
क्योंकि धुरंधर की हिरोइन के पास वाकई में कुछ खास स्क्रीनटाइम नहीं है। पिछली वाली हिरोइन – उलफ़त उर्फ सौम्या टंडन भी – एक थप्पड़ मारने की मशीन भर रह गई हैं। इसके इतर किस फ़ीमेल किरदार के पास स्ट्रॉंग स्क्रीनटाइम है धुरंधर में? जवाब है कोई नहीं।
पर स्क्रीनटाइम से इतर, धुरंधर की फ़ीमेल के पास स्ट्रॉंग कैरेक्टर ज़रूर है। पाक्सतां जैसे हार्डकोर पैट्रीआर्क देश में भी एक ऐसी कन्या दिखाई गई है जो अपनी मर्ज़ी से जीती है, अपनी मर्ज़ी से शादी करती है, अपनी इच्छा से माफ़ करती है, मना करने के बावजूद वो सवाल करती है, जवाब माँगती है और सारे लॉजिक्स से खुद को परे करके, अपने प्रेमी की ढेर सारी फ़िक्र करती है।
इसके बावजूद आप कह सकते हैं कि इसने बच्चे पैदा करने के सिवा किया ही क्या है?
पर जनाब ये कहानी ही मर्दों की हैं। जासूस बनना, घर या गैंग चलाना, ब्रूटल बदला लेना, ये मर्दाना काम हैं। अपने परिवार की, अपने लोगों की, अपने देश अपनी मिट्टी की हिफ़ाज़त करना मर्द की ज़िम्मेदारी है। इसके लिए मर्द को कोई प्रोत्साहन, ऐश-ओ-आराम या मेडल नहीं चाहिए। अगर वो ऐसी डिमांड भी करता है तो उसे अपनी मर्दानगी पर सवाल उठाना चाहिए।
फ़िल्म में अजीत डोभाल बने माधवन जब जसकीरत को मर्द होने के मायने बताते
हैं तो वो सीन कुछ अलग हिट करता है।
आज के इस फेमिनिस्ट दौर में, महिलायें बिलाशक़ पहले से कहीं ज़्यादा मजबूत, ज़िम्मेदार और काबिल हुई हैं। वो रोटी कमा भी सकती हैं, बना भी सकती हैं और खिला भी सकती हैं। इसमें कोई शक़ नहीं मुझे, बहुत खुशी ज़रूर है।
पर मर्दों की आई नई खेप देखकर मेरे जैसे ओल्ड स्कूल को थोड़ा अफ़सोस तो होता है। सब तो नहीं, पर दर्जन में 8 गिलगिले, पिलपले, ढीले और ज़रा-ज़रा सी बात पर मिमियाते लड़कों को देखकर इनकी परवरिश पर सवाल उठाने का मन तो करता है।
इन दिनों, या तो बिल्कुल इक्स्ट्रीम वाइफ-बीटर हज़्बन्ड दिखते हैं, जो औरतों पर ज़ोर आजमाकर खुद मर्द होने का भ्रम बनाए दिखते हैं... या फिर वो दिखते हैं जिनका नाखून चटक जाए तो “ऊई अम्मा मैं तो टूट के बिखर गई” गाने लगते हैं।
ज़िम्मेदार, काबिल, हौसले वाले, दर्द को सहन करने वाले, प्लान करने वाले, अपनी सोच रखकर, पूरे परिवार या खानदान को अप-फ्रन्ट लीड करने वाले, ग़लत के खिलाफ़ गंडासा उठाने वाले, बदला लेने वाले मर्दों की शॉर्टिज हो रही है सोसाइटी में।
तो मेरे वो दोस्त यार मित्र, जो निष्पक्ष होने के साथ-साथ फेमिनिज़्म से ज़्यादा इक्वालिटी में भरोसा रखते हैं, उन्हें मैं भरोसा देता हूँ कि धुरंधर एंटी फेमिनिस्ट फ़िल्म नहीं, प्रो-मैस्क्यलिन सिनेमा है।
ये ऐसी फ़िल्म है जो मउगापंती की ओर गिरते युवाओं को जता सकती है कि मर्द ऐसा भी होता है।
जसकीरत, हमज़ा, बंसल, सान्याल, एमएलए, रिज़वान, आलम जैसे किरदार हमें ज़िम्मेदार होना सिखाते हैं। हमें बलिदान परमों धर्मा का पाठ पढ़ाते हैं।
अपने स्वार्थ और कम्फर्ट को साइड में रखना ही मर्द
होना है। अपने परिवार, खानदान या देश की मिट्टी के लिए किसी भी हद तक चले जाना, किसी भी दर्द, जुदाई या ज़िल्लत सहना मर्द का कर्तव्य है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि
भगवान श्रीकृष्ण के इसी श्लोक से फ़िल्म शुरु होती है, ध्यान से देखें तो इसी पर खत्म भी।

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