कुछ हाथ डिग्री से नहीं, दुआ और अनुभव से बड़े होते हैं।

 जब अरबपति की पत्नी प्रसव पीड़ा में मौत से लड़ रही थी, 12 डॉक्टर हार चुके थे; तभी फर्श पोंछने वाली गरीब दाई ने कहा, “बच्चा रास्ता मांग रहा है,” और कमरे का घमंड एक पल में सभी की सांसें थमाकर टूट गया


बच्चे की धड़कन गिर रही थी, मां की आंखें पलटने लगी थीं, और दिल्ली के सबसे महंगे अस्पताल के बाहर एक गरीब सफाईकर्मी औरत को डॉक्टरों ने दरवाजे से धक्का देकर पीछे कर दिया था।

दक्षिण दिल्ली के “सूर्यवंश सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल” की 9वीं मंजिल उस रात किसी पांच सितारा होटल जैसी चमक रही थी, मगर भीतर मौत की आहट घूम रही थी। उसी मंजिल के शाही प्रसव-कक्ष में ईशानी मल्होत्रा 41 घंटे से प्रसव पीड़ा में थी। वह विक्रम मल्होत्रा की पत्नी थी—वही विक्रम मल्होत्रा जिसके होटल, रियल एस्टेट, मीडिया चैनल और टेक कंपनियों के नाम पर आधा दिल्ली-एनसीआर सांस लेता था।

अखबारों ने इस बच्चे को “मल्होत्रा साम्राज्य का वारिस” कहा था। सोशल मीडिया पर ईशानी की गोद भराई की तस्वीरें वायरल हुई थीं। चांदी की थालियां, बनारसी साड़ियां, जयपुर से आए कंगन, और मंदिरों में चढ़ाए गए लाखों रुपये के प्रसाद—सब कुछ था। बस उस रात एक चीज नहीं थी।

नियंत्रण।

12 बड़े डॉक्टर कमरे में आ-जा चुके थे। कोई लंदन से पढ़ा था, कोई मुंबई का नामी विशेषज्ञ था, कोई अमेरिका की डिग्री लेकर लौटा था। फिर भी बच्चा नीचे नहीं आ रहा था। ईशानी की कमर टूट रही थी, खून का दबाव बिगड़ रहा था, और हर कोशिश के बाद मॉनिटर पर बच्चे की धड़कन डरावनी तरह धीमी हो जाती थी।

उसी गलियारे में सरोज बाई पोछा लगा रही थी।

52 साल की सरोज पिछले 17 साल से इसी अस्पताल में सफाई का काम कर रही थी। लोग उसे नाम से कम, “अरे सफाई वाली” कहकर ज्यादा बुलाते थे। अमीर मरीजों के रिश्तेदार उससे नजर बचाकर चलते, डॉक्टर उसके पास से ऐसे निकलते जैसे वह दीवार का हिस्सा हो। सरोज को इसकी आदत हो गई थी। गरीबी आदमी को नहीं, उसकी आवाज को छोटा कर देती है।

मगर उस रात उसकी आवाज भीतर से जाग उठी।

दरवाजा खुलता, तो उसे टूटे-फूटे वाक्य सुनाई देते।

“बच्चा पीछे की तरफ अटका है…”

“हर धक्का धड़कन गिरा रहा है…”

“अभी ऑपरेशन किया तो मां भी जोखिम में है…”

“और देर हुई तो बच्चा…”

सरोज का हाथ रुक गया। पोछे से पानी फैलता रहा, मगर उसकी आंखें उस दरवाजे पर टिक गईं।

वह डॉक्टर नहीं थी। उसके पास कोई डिग्री नहीं थी। पर वह 20 साल तक बुंदेलखंड के अपने गांव और आसपास की बस्तियों में दाई रही थी। उसकी सास, फूलमती दाई, ने उसे बचपन से सिखाया था कि गर्भ में बच्चा सिर्फ शरीर से नहीं, मां की सांस से भी बात करता है। सरोज ने मिट्टी के घरों में, लालटेन की रोशनी में, बारिश भरी रातों में, बिना बिजली और बिना मशीनों के सैकड़ों बच्चों को जन्म लेते देखा था। उसने उलझे हुए प्रसव संभाले थे, कमजोर माताओं को बचाया था, और कई बार सिर्फ हाथ की समझ से बच्चे को सही करवट दिलाई थी।

फिर गांव में सूखा पड़ा, कर्ज बढ़ा, पति बीमार पड़ा, और एक गलत इलाज ने उसे विधवा कर दिया। सरोज अपने 2 बच्चों को लेकर दिल्ली आई। बच्चे बड़े हुए, अपनी-अपनी जिंदगी में खो गए। सरोज अस्पताल के फर्श चमकाती रही।

पर दाई की हथेलियां कभी बूढ़ी नहीं होतीं।

अंदर से ईशानी की चीख आई। वह चीख दर्द की नहीं, हार की थी।

सरोज ने दरवाजा खटखटाया।

एक नर्स ने झुंझलाकर दरवाजा खोला। “क्या है?”

सरोज ने धीमे मगर साफ कहा, “बच्चा उलटी करवट में अटका है। उसका चेहरा मां के पेट की तरफ है, पीठ नहीं। इसलिए नीचे नहीं उतर रहा। मुझे पेट छूने दीजिए, मैं कोशिश कर सकती हूं।”

नर्स पहले तो कुछ समझी नहीं, फिर उसकी आंखों में अपमान चमका। “तुम सफाई का काम करती हो।”

“हां,” सरोज बोली, “मगर पहले दाई थी।”

“यहां 12 डॉक्टर हैं।”

“फिर भी बच्चा अटका है,” सरोज ने सिर झुकाए बिना कहा।

नर्स ने दरवाजा बंद कर दिया।

सरोज पीछे हट गई। उसकी छाती में पुरानी बेइज्जतियां जल उठीं—किसी ने उसे कभी मेज पर बैठाकर नहीं खिलाया, किसी ने उसकी सलाह को सलाह नहीं माना, किसी ने उसके हाथों की कीमत नहीं समझी। पर तभी अंदर डॉक्टर की आवाज गूंजी, “धड़कन फिर गिर रही है!”

सरोज ने पोछा दीवार से टिका दिया।

इस बार उसने दरवाजा जोर से खटखटाया।

दरवाजा खुला तो सामने डॉ. मीरा कपूर खड़ी थीं, अस्पताल की वरिष्ठ प्रसूति विशेषज्ञ। उनके चेहरे पर थकान, डर और गुस्सा एक साथ था।

“अब क्या चाहिए?”

सरोज ने कांपती आवाज में कहा, “मैडम, बच्चा पीछे की तरफ अटका है। अगर मां को करवट बदलाकर, पेट पर सही दबाव देकर उसे घुमाया जाए, तो वह उतर सकता है।”

कमरे में खड़े डॉक्टर मुड़कर देखने लगे। विक्रम मल्होत्रा भी वहीं था—महंगे कुर्ते की सिलवटें बिगड़ चुकी थीं, माथे पर पसीना था, मगर अहंकार अभी जिंदा था।

“यह कौन है?” उसने पूछा।

किसी ने कहा, “सफाई कर्मचारी।”

विक्रम की आंखों में घृणा उतर आई। “मेरी पत्नी मर रही है और आप लोग झाड़ू-पोछा करने वाली से सलाह सुन रहे हैं?”

सरोज का चेहरा सख्त हो गया, मगर आवाज शांत रही। “मैं आपसे सम्मान नहीं मांग रही, साहब। बस 5 मिनट मांग रही हूं।”

“बाहर निकलिए!” विक्रम चिल्लाया।

तभी बिस्तर से ईशानी की टूटी हुई आवाज आई, “रुकिए…”

सब जम गए।

ईशानी का चेहरा सफेद था, बाल पसीने से गालों से चिपके थे, होंठ सूख चुके थे। उसने मुश्किल से सरोज की तरफ देखा।

“तुम… सच में मेरे बच्चे को बचा सकती हो?”

सरोज ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा, “मैं पूरी कोशिश कर सकती हूं। और अभी कोशिश जरूरी है।”

डॉ. मीरा ने मॉनिटर देखा। फिर ईशानी को देखा। फिर सरोज की हथेलियों को देखा—खुरदरी, काली पड़ी, साबुन और फिनाइल से जली हुई, मगर स्थिर।

“5 मिनट,” डॉ. मीरा ने आखिर कहा। “सब मेरी निगरानी में होगा। जरा-सी गड़बड़ हुई तो हम तुरंत रोकेंगे।”

विक्रम भड़क उठा। “यह पागलपन है!”

ईशानी ने पहली बार कठोर आवाज में कहा, “यह मेरा शरीर है, विक्रम। और यह मेरा बच्चा है।”

सरोज कमरे में दाखिल हुई।

और उसी क्षण मॉनिटर की आवाज फिर बदल गई।


सरोज ने हाथ धोए, दस्ताने पहने, फिर ईशानी के पेट के पास खड़ी हुई। कमरे में महंगी मशीनें थीं, विदेशी उपकरण थे, सफेद कोटों की भीड़ थी, मगर उस पल सबकी नजर सिर्फ एक गरीब औरत की हथेलियों पर थी।

“बहू, मेरी बात सुनना,” सरोज ने धीमे कहा, जैसे वह अस्पताल में नहीं, किसी गांव की मिट्टी वाली कोठरी में हो। “दर्द से लड़ना मत। सांस को लंबा रखना। बच्चा रास्ता ढूंढ रहा है।”

ईशानी ने कमजोर सिर हिलाया।

सरोज ने पेट पर हाथ रखा। उसकी उंगलियों ने बच्चा पढ़ लिया—सिर नीचे था, पर गलत कोण पर; कंधा अटका था; पीठ दूसरी तरफ थी। हर धक्का उसे और फंसा रहा था।

“यही है,” सरोज बुदबुदाई।

एक डॉक्टर हंस पड़ा, “यह तमाशा बंद कीजिए, डॉ. मीरा।”

डॉ. मीरा ने उसे चुप कराया।

अगली संकुचन आई। ईशानी चीखी। सरोज ने जोर नहीं लगाया, बस इंतजार किया। दर्द ढीला पड़ा तो उसने एक हाथ ऊपर, दूसरा दाहिनी तरफ रखा और बहुत धीरे दबाव दिया—जैसे फंसे हुए किवाड़ को रास्ता दिखा रही हो।

मॉनिटर पर धड़कन थोड़ी संभली।

नर्स चौंकी। “धड़कन 98 से 116…”

विक्रम आगे बढ़ा, पर कुछ बोल नहीं पाया।

दूसरी संकुचन में ईशानी ने सरोज का हाथ पकड़ लिया। उसकी उंगलियां बर्फ जैसी ठंडी थीं।

“मुझे बचा लो,” उसने फुसफुसाया, “मेरे बच्चे को भी…”

सरोज की आंखों में अपनी विधवा बहू का चेहरा कौंध गया, जो अस्पताल न पहुंच पाने के कारण गांव में चली गई थी। उस दिन सरोज किसी को नहीं बचा सकी थी।

आज वह पीछे नहीं हटने वाली थी।

तीसरी कोशिश में अचानक ईशानी के पेट के भीतर हल्की-सी हरकत हुई। अल्ट्रासाउंड पकड़े डॉक्टर का चेहरा उतर गया।

“बच्चा… घूम रहा है,” वह बुदबुदाया।

कमरे में सन्नाटा गिरा।

तभी बाहर से अस्पताल निदेशक भागते हुए आए। “यह किसने अनुमति दी? अगर कुछ हुआ तो अस्पताल खत्म हो जाएगा!”

विक्रम ने सरोज की तरफ देखा, फिर अपनी पत्नी की तरफ।

अगले ही पल ईशानी ने पूरी ताकत से चीखकर कहा, “उसे मत रोको!”

और उसी क्षण बच्चे की धड़कन अचानक सीधी ऊपर उठ गई।

मॉनिटर की “बीप… बीप…” अब पहले से ज्यादा अनियमित हो चुकी थी। कमरे में मौजूद हर चेहरा तनाव से जकड़ा हुआ था। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी, और कांच की ऊंची खिड़कियों पर पानी की बूंदें ऐसे फिसल रही थीं जैसे समय खुद कांप रहा हो।

सरोज धीरे-धीरे ईशानी के पास पहुंची।

उसने कोई मशीन नहीं देखी। कोई रिपोर्ट नहीं उठाई। बस अपनी हथेली ईशानी के पेट पर रख दी।

कमरे में खड़े डॉक्टरों की आंखों में अविश्वास था।

सरोज ने आंखें बंद कीं। एक लंबी सांस ली। फिर बहुत धीमे बोली, “बच्चा डर गया है… उसे रास्ता नहीं मिल रहा।”

विक्रम झल्लाया, “ये अस्पताल है, कोई मंदिर नहीं!”

लेकिन इस बार डॉ. मीरा ने उसे चुप रहने का इशारा किया।

सरोज ने ईशानी की तरफ देखा। “बेटी, सांस मत तोड़ना। दर्द से लड़ना मत… उसे नीचे आने का रास्ता देना।”

ईशानी की आंखों से आंसू बह निकले। 41 घंटे की पीड़ा के बाद पहली बार किसी ने उससे मशीन की तरह नहीं, मां की तरह बात की थी।

“नर्स,” सरोज बोली, “इन्हें सीधा मत लिटाइए। करवट दिलाइए… हां, ऐसे…”

एक डॉक्टर फुसफुसाया, “यह ‘पोस्टेरियर पोजिशन’ हो सकता है…”

दूसरे ने तुरंत मॉनिटर देखा।

सरोज ने दोनों हाथों से बहुत हल्का दबाव दिया। उसकी उंगलियां पेट पर धीरे-धीरे घूमीं, जैसे कोई मां बच्चे के सिर पर हाथ फेरती है।

अचानक ईशानी जोर से चीखी।

मॉनिटर की आवाज तेज हुई।

“धड़कन… धड़कन ऊपर जा रही है!” एक नर्स लगभग चिल्ला पड़ी।

डॉ. मीरा तुरंत आगे बढ़ीं। उन्होंने जांच की। फिर उनकी आंखें फैल गईं।

“हे भगवान… बच्चा घूम रहा है…”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

विक्रम का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

सरोज ने ईशानी का हाथ पकड़ा। “अब पूरा जोर लगाओ बेटी। बच्चा रास्ता मांग रहा है…”

ईशानी ने पूरी ताकत से धक्का लगाया।

एक पल… दो पल…

फिर अचानक पूरे कमरे में एक तीखी आवाज गूंजी।

एक नवजात बच्चे के रोने की आवाज।

कमरा जैसे जम गया।

नर्स की आंखों में आंसू आ गए। एक डॉक्टर ने अविश्वास में मास्क उतार दिया। डॉ. मीरा ने बच्चे को उठाया और कांपती आवाज में कहा—

“बेटा है… और सुरक्षित है।”

ईशानी रो पड़ी।

विक्रम वहीं कुर्सी पर बैठ गया, जैसे उसके पैरों से ताकत निकल गई हो।

उसकी नजर सरोज पर गई— वही औरत जिसे कुछ मिनट पहले उसने “झाड़ू-पोछा करने वाली” कहा था।

सरोज चुपचाप पीछे हटने लगी।

तभी ईशानी ने कमजोर आवाज में कहा, “रुकिए…”

सरोज मुड़ी।

ईशानी ने कांपते हाथ जोड़ दिए। “आज अगर मेरा बच्चा जिंदा है… तो आपकी वजह से।”

कमरे में खड़े डॉक्टरों के सिर झुक चुके थे।

विक्रम धीरे-धीरे सरोज के सामने आया।

उसकी आंखों में पहली बार अहंकार नहीं था।

वह बोला, “मैंने… आपका अपमान किया।”

सरोज हल्का मुस्कुराई। “गरीब का अपमान नया नहीं होता साहब… बस आज भगवान ने मेरी आवाज सुन ली।”

विक्रम की आंखें भर आईं।

उस रात पहली बार “सूर्यवंश सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल” की 9वीं मंजिल पर किसी अमीर आदमी ने एक सफाईकर्मी के पैर छुए थे।

और बाहर गलियारे में पड़े सरोज के पुराने पोछे से अभी भी पानी टपक रहा था…

मगर उस रात वहां मौजूद हर इंसान जान चुका था—

कुछ हाथ डिग्री से नहीं, दुआ और अनुभव से बड़े होते हैं।



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