हम जिसे Strong करना हो,उसे आलसी बना दो

 आपके धंधे आपकी कमाई को सबसे बुरी नजर लगती है आलस की, आप जो भी कर रहे है, अगर आप उस काम में जरा सा भी आलसी हुए,खेल खत्म। चाहे आप बड़ी कंपनी चला रहे हो, देश चला रहे हो या फिर कोई छोटी रेहड़ी।


ये भाई सड़क किनारे बिरयानी बेचते है, आप जब भी जायेंगे हमेशा गर्म बिरयानी मिलेगी, एक देग खाली होता रहता है तो दूसरे देग की तैयारी चलती रहती है उसी टाइम में,जब तक पहला देग खाली होगा, तब तक दूसरा देग तैयार।


चार या पांच साल में ये इंसान कही किसी बढ़िया दुकान में शिफ्ट हो लेगा,और इसके आस पास के ठेले वालो की पीढ़िया इसी सड़क पर जीवन गुजार देंगी,और मै ऐसा गुस्सा या बददुआ कि नीयत से नहीं कह रहा हू, कारण है।


सबसे पहले समझते है कि ये बिरयानी वाला क्यू आगे बढ़ेगा अपनी जिंदगी में,सबसे बड़ी वजह ये है,बंदा आलस नहीं करता है। कभी कभी कुछ देर के लिए जब दुकानदार शांत होती है,तो ये अपने ही देग की बिरयानी लेकर बैठ जाता है,खाता नहीं टेस्ट करता है।


फिर चटनी, रायता धीरे धीरे सबका नंबर आता है।रायता या चटनी कोई खास नहीं है इसकी,मतलब ठीक ठाक ही, मजेदार जो है वो है इस भाई कर परोसने का तरीका।क्योंकि भाई बस दुकानदारी शांत होने पर ही बैठता है, वरना पाव में फिरकी लगी रहती है।


मतलब आप यू समझिए कि जब इसके कस्टमर खा रहे होते है तो ये बारी बारी से,सबके चेहरे देखता रहता है, मतलब आप बस निगाह उठाएंगे,इसकी तरफ और ये आपकी ही तरफ देखता मिलेगा,और तुरंत पूछ लेगा, चटनी रायता ग्रेवी?


आप मुंह में चावल ठूंसे होने के कारण बोल नहीं पाएंगे पर ये इशारा समझ कर रायते और चटनी का लोटा लेकर आपके पास खड़ा हो जाएगा,जितना कहेंगे इतना सर्व करेगा,फिर बुलाएंगे फिर आयेगा। मैने बहुत कम देखा है कि भाई के किसी कस्टमर को कभी भी बीच में किसी भी चीज के लिए उठना पड़ा हो।


ये बाकायदा अपने कस्टमर से उनके मन के पीस (शांति नहीं बोटी) के बारे में भी पूछता है, वो भी सिर्फ 70 रुपए की बिरयानी के लिए। ये भाई टिश्यू रखता है जबकि बाकी ठेले वाले पेपर देने में भी मुंह बनाते है।


कोई कस्टमर खाकर हटा नहीं कि भाई तुरंत उसके होने के सारे सबूत मिटा देते है,इतनी तेजी से साफ करता है बंदा,और शाम को जब ये बैठा नोट गिनता है तो अलग ही अकड़ रहती है भाई के चेहरे पर,लेकिन दुकानदारी के वक्त नहीं।


इस आदमी की बहुत सिंपल सी फिलॉस्फी है कि मेरे पास कोई बड़ा ग्राहक तो आएगा नहीं,यही मजदूरी और नौकरी वाले ही आयेंगें।


अब ये जो बेचारे आते है, थके होते है, वक्त कम होता है उनके ,तो ये उन्हें बस परोसता है, पैसे लेता है,लेकिन जिससे पैसा कमा रहा है उसका सम्मान भी करता है। अपने आलस को डिफेंड करने के लिए अपनी सेल्फ रिस्पेक्ट का चोला नहीं ओढ़ता।


भाई के कई कस्टमर ऐसे है,जो इसकी रेहड़ी को,ड्राइव थ्रू की तरह यूज़ करते है,मतलब इसकी दुकान के सामने कोई गाड़ी रुकेगी,ये भागकर जाएगा, पूछेगा कि क्या चाहिए।


कई बार गाड़िया रास्ता पूछने के लिए रूकती है, और ये बहुत मन से उन्हें रास्ता बताता है,जैसे रस्ता बताने ही खड़ा है वो वहां,ऐसे में वो कस्टमर फिर कभी इधर से गुजरता है तो उसका दिल करता है कि यार उसके ठेले को एक मौका तो देना चाहिए।


और जब वो लोग लौटेंगे तो फिर ये भागकर उनकी गाड़ी के पास जाता है,उन्हें ऐसे पहचान लेता है,मानो सालों से उसके ग्राहक है। ग्राहक को इससे ज्यादा और क्या चाहिए, तीखी चटपटी बिरयानी मिल जाए, दो मीठे बोल के साथ।


अपने कस्टमर को जल्दी गाड़ी से उतरने नहीं देता ये आदमी, इसको याद रहता कि किसकी प्लेट में प्याज कम होगा, तुरंत लेकर पहुंच जाएगा,और प्याज भी बिल्कुल धूली हुई, बारीक कटी हुई।

 

बहुत सारे छोटे दुकानदार एक बहुत बेसिक चीज में कन्फ्यूज रहतें है, वो ये है कि उनका बिजनेस सेल्स का है, सर्विस का है या दोनों का है। जैसे ठेले वाले, पनवाड़ी वगैरह का बिजनेस सेल्स और सर्विस दोनों में आता है, क्यू?


क्योंकि एक तो भाई प्रोडक्ट सेल कर रहे हो, पर साथ ही साथ, उस प्रोडक्ट को कस्टमर आपकी दुकान पर ही कंज्यूम कर सके, ऐसे सर्विस भी आप दे रहे है,पनवाड़ी पर लाइटर इसलिए होता है।


पर दिक्कत ये है ज्यादातर ठेले वाले सेल्स तो करना चाहते है,पर सर्विस में उनका आत्मसम्मान आगे आ जाता है।जबकि काम का आत्मसम्मान से कोई ताल्लुक ही नहीं होता, हा आलस से जरूर होता है।


मतलब इन दुकानदारों की सोच होती है कि 70 रुपया में किसी ने हमारा ठेला खरीद लिया है क्या, या बहुत बड़े धन्ना सेठ है जो गाड़ी से नहीं उतर सकते,जिसको गर्ज होगी खुद उतर कर आयेगा।


वही पर ये आदमी,बस इतना कर रहा है कि जो इसको काम मिला है, उसे पूरी ईमानदारी और शिद्दत से निभाता है, अपना इगो काम से ऊपर नहीं रखता,सेल्फ रिस्पेक्ट और इगो के बीच का बारीक फर्क समझता है।


इसी तरह के दुकानदार, ठेले से उठकर,अपना रेस्ट्रॉन्ट खोलते है, रेस्ट्रॉन्ट से कंपनी बना लेते है, बीस साल बाद,उनके बगल का ठेला वाला इन्हें देखकर जलता है,और सोचता है कि इसने कुछ तो अलग किया होगा, इसका कुछ तो जुगाड़ रहा होगा।


भाई सारे शॉर्टकट सारे जुगाड तुम्हारे सामने ही है, तुम भी कर सकते हो, तुम भी कस्टमर को अपना वफादार बना सकते हो,पर तुम करते नहीं हो, क्योंकि तुम आलसी हो, तुम बस वक्त काटना चाहते हो, और वक्त तुम्हे और तुम्हारे धंधे पूंजी को काट देगा धीरे धीरे,अगर तुमने ये आलस नहीं छोड़ा।




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