संदेश माता-पिता को

 बच्चे बिगड़ नहीं रहे!...उन्हें बिगाड़ने के लिए पूरा बाजार खड़ा है!पूरा व्यापार चल रहा है.......


गानों, फिल्मों, वेब सीरीज ,हिंसक वीडियो गेम और सोशल मीडिया पर नशे, हथियार और गुंडागर्दी को हीरो बनाने वालों पर सख्त कार्रवाई हो। सोशल अकाउंट बंद हों, भारी जुर्माना लगे और अपराध के लिए उकसाने पर जेल भी हो।


हर एक स्कूल एक दिन की गैरहाजिरी को भी गंभीरता से लेकर तुरंत परिवार को बताए। बच्चों के सोशल अकाउंट ओर उनके स्कूल बैग चेक हो।बच्चों के लिए रोज खेल का समय अनिवार्य करे।


सड़क किसी की रील, रौब या यारी दिखाने की जगह नहीं है। बाइकों पर झुंड बनाकर स्टंट, हूटिंग, रास्ता रोकना और यारी-दोस्ती के नाम पर हुड़दंग सब पर तत्काल लगाम लगे।


धार्मिक यात्रा आस्था है, कानून से छुट्टी नहीं। यात्रा किसी भी धर्म की हो।नशा, हथियार, उपद्रव और हिंसा पर रत्तीभर ढील न मिले।

जहाँ अवैध हथियार और नशा खुलेआम दिखाई दें, वहाँ सरकार और पुलिस की जवाबदेही तय हो।


हाई स्कूलों के बाथरूमों में नशीली दवाइयों के रैपर,सिरिंज,गर्भ निरोधक गोलियां या ओर भी शर्मनाक चीजें मिलती है। जिन्हें देखकर कोई भी दहशत में आ जाए। लेकिन मां बाप दोनों ही ऐसी महंगाई में पैसा कमाने में लगे है। हर जगह बच्चों पर निगाह नहीं रख सकते।बच्चों की परवरिश में परिपक्व दंपति भी बेबस ओर विफल दिखाई दे रहे है।


हमें यह गलतफहमी छोड़नी होगी कि किशोर अपराध केवल गरीबी, अशिक्षा या टूटे परिवारों से पैदा होता है। कई बच्चों के पास घर, स्कूल, मोबाइल और सुविधाएँ सब हैं।लेकिन संवाद, अनुशासन, अच्छा मार्गदर्शक और जीवन का उद्देश्य नहीं है।


किशोरावस्था की अधपकी निर्णय क्षमता - इस उम्र में जोश, जोखिम लेने और दोस्तों से स्वीकृति पाने की इच्छा अधिक होती है।जबकि परिणाम समझने और खुद को रोकने की क्षमता अभी विकसित हो रही होती है।


घर में संवाद और निगरानी की कमी- माता-पिता का समय न देना, अत्यधिक छूट, बहुत कठोर या असंगत अनुशासन, घरेलू हिंसा, नशा और बच्चे को बार-बार अपमानित करना।ये सभी जोखिम बढ़ाते हैं।


गलत संगत और गैंग वाली पहचान - जिस किशोर को घर या स्कूल में सम्मान नहीं मिलता। वह कई बार मोहल्ले के दबंग लड़कों, गैंग अथवा ऑनलाइन समूहों में पहचान और सुरक्षा तलाशता है।


स्कूल से दूरी और लगातार अपमान - पढ़ाई में कमजोर बच्चे को “निकम्मा” कहना, बुलिंग, स्कूल छोड़ना, कोई खेल या हुनर न होना।उसके सामने सकारात्मक रास्ते कम कर देता है।


नशा, हथियार और आसानी से मिलने वाला पैसा - शराब, ड्रग्स, जुआ-सट्टा, ऑनलाइन ठगी तथा अपराधी युवकों के संपर्क में आना छोटे अपराध को धीरे-धीरे गंभीर अपराध में बदल सकता है।


हिंसा का सामाजिक महिमामंडन - जब घर, फिल्मों, रीलों, राजनीति या समाज में दबंगई, हथियार, जातीय-धार्मिक उग्रता और कानून तोड़ने वाले को “हीरो” बनाया जाता है।तो किशोर ताकत का गलत अर्थ सीखता है। मोबाइल अकेला कारण नहीं है।लेकिन गलत सोच को तेज जरूर कर सकता है।


बचपन का आघात और मानसिक समस्याएँ - हिंसा देखना या झेलना, यौन शोषण, उपेक्षा, अवसाद, अत्यधिक गुस्सा, ADHD या व्यवहार संबंधी परेशानी भी कारण बन सकती है। मानसिक बीमारी का अर्थ अपराधी होना नहीं है, लेकिन समय पर उपचार न मिलने से जोखिम बढ़ सकता है। WHO भी खराब अभिभावकीय निगरानी, पारिवारिक हिंसा, नशे, आपराधिक साथियों और स्कूल से दूरी को प्रमुख जोखिम मानता है।


कौन क्या कर सकता है? जिम्मेदारी


माता-पिता क्या करें?

बच्चे के दोस्त कौन हैं, वह कहां जाता है, पैसा कहां खर्च करता है और ऑनलाइन क्या देखता है।इसकी जानकारी रखें। लेकिन निगरानी जासूसी जैसी नहीं, भरोसे और संवाद के साथ हो।


मारपीट, गाली और सार्वजनिक अपमान बच्चे को सुधारते नहीं वे उसके भीतर गुस्सा, झूठ और बदला पैदा करते हैं। घर में नियम साफ हों और नियम तोड़ने पर निश्चित लेकिन अहिंसक परिणाम हों।


बच्चे को खेल, व्यायाम, कला, तकनीकी कौशल और किसी अच्छे कोच या मार्गदर्शक से जोड़ें। केवल महंगा फोन देना पालन-पोषण नहीं है।समय, संस्कार, जिम्मेदारी और सीमाएँ देना असली परवरिश है।


स्कूल और कॉलेज क्या करें?

हर संस्थान में प्रशिक्षित काउंसलर, गोपनीय शिकायत व्यवस्था और बुलिंग-विरोधी प्रणाली हो। लगातार अनुपस्थित रहने, अचानक हिंसक होने, नशा करने या संदिग्ध पैसा खर्च करने वाले बच्चे की तुरंत पहचान हो।


बच्चे को स्कूल से निकाल देना सबसे आसान काम है। उसे संभालकर वापस सही रास्ते पर लाना असली शिक्षा है।


पाठ्यक्रम में गुस्सा नियंत्रित करना, विवाद सुलझाना, सहमति, लैंगिक सम्मान, कानून, डिजिटल सुरक्षा और जीवन-कौशल सिखाए जाएँ। खेल मैदान और कौशल प्रशिक्षण को अतिरिक्त गतिविधि नहीं, अपराध-रोकथाम का माध्यम माना जाए।


सरकार क्या करे?

हर जिले में बाल-मनोवैज्ञानिक, नशामुक्ति सहायता, खेल केंद्र और स्कूल छोड़ चुके बच्चों के लिए कौशल व अप्रेंटिसशिप कार्यक्रम उपलब्ध हों।


पुलिस केवल अपराध होने के बाद न पहुँचे। नशे,अवैध हथियारों, ऑनलाइन सट्टे और किशोरों का इस्तेमाल करने वाले वयस्क गैंगों पर पहले कार्रवाई हो।


किशोर सुधार गृह अपराध की पाठशाला नहीं बनने चाहिए। वहाँ शिक्षा, मनोचिकित्सा, नशामुक्ति, व्यावसायिक प्रशिक्षण और रिहाई के बाद पुनर्वास अनिवार्य हो। किशोर न्याय कानून का उद्देश्य केवल दंड नहीं, बल्कि सुधार और समाज में सुरक्षित वापसी भी है। हर बच्चे पर जिंदगी भर “अपराधी” का ठप्पा लगाना भी अन्याय है।


किशोर अपराध का सबसे सस्ता और प्रभावी इलाज जेल नहीं समय पर मिली सही परवरिश, शिक्षा, खेल, मानसिक सहायता, कौशल और जिम्मेदारी है।



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