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मुझे अच्छी लगती हैं वे बेटियां...

मुझे अच्छी लगती हैं... दूसरे..तीसरे..या चौथे नंबर की वे बेटियां... जो बेटों के इंतजार में जन्म लेती हैं... और...जाने कितने बेटों को पीछे कर आगे बढ़ जाती हैं, बिना किसी से कोई उम्मीद... या अपेक्षा किए क्या कहीं किसी घर में बेटी के इंतजार में जन्मे बेटे कर पाते हैं यह कमाल...!!! अगर नहीं... तो चाहती हूं कि हर बार बेटों के इंतजार में जन्म लेती रहें बेटियां... पोंछ कर अपने चेहरे से छलकता तमाम अपराध बोध... आगे बढ़ती रहे बेटियां... बार-बार... जन्म लेती रहे बेटियां

साहित्य निष्प्राण हो जाएगा

                      साहित्य को समाज का दर्पण होना चाहिए अर्थात् समाज के चेहरे को हूबहू दिखाने के सामर्थ्य से सम्पन्न। सिर्फ इतना ही नहीं अपितु समाज को उन्नतशील और नवीन राह देना भी साहित्य का दायित्व है। इसलिए एक साहित्यकार को ग्राह्य हृदयी होने के साथ - साथ दूरदर्शी भी होना चाहिए जिससे वह समाज को समझ सके और सही दिशा दे सके। बहुत अफ़सोस के साथ इस सत्य को स्वीकार करना पड़ रहा है कि आज का साहित्यकार तटस्थ रहने का दिखावा करके 'सेफ जोन' का आदी होता जा रहा है। साहित्यिक सम्मान और उपाधियाँ ज्यादातर राजनीतिक गलियारे में पैदा होती हैं इसलिए आज के दौर का तथाकथित साहित्यकार 'नेताजी चालीसा' रचने का हुनर सीखना चाहता है। ज्यों ही वह नुक्कड़, हाट और चलते- फिरते कवि सम्मेलन एवं गोष्ठी से वरिष्ठ  साहित्यकार होने का तमगा झटक लेता है, दौड़ पड़ता है राजभवन के जगमगाते चौपाल की ओर। सत्यासत्य से दूर, उचितानुचित से परे किसी तथाकथित सामर्थ्यवान के पीछे चिपककर अतिशयोक्ति को भी मात देता हुआ बगुल ध्यान से वांछित खिताब को उड़ा लेता है अपनी झोली में और फ...

लौ जगा

लौ जगा  इक लौ जगा अपने दिल में  जगमग जगमग बनी रहे ख़ुशहाली से नहीं राबता   उदासी मन में जमी रहे  बहकी अलसाई आंखें  हर बात पे मुझको टोकें  अम्बर तल्खियों का फैला  प्यार की हरपल कमी रहे  काँटों की खेती न करो  ज़ख्मों को न दो दावत  रिश्ते रहें सदा सलामत प्रीत की बरखा घनी रहे  काले साये क्यों लहराये हसीं के बदल उड़ गये  नूर आँखों का धुँधला है  "रत्ती"  भौहें सदा तानी रहे  इक लौ जगा अपने दिल में  जगमग जगमग बनी रहे 

कहानियाँ जो जिंदगी बदल दे

हर समाज के लिए विचारणीय *_(1) आज काफी लड़कियों के माँ- बाप अपनी बेटियों की शादी में बहुत विलंब  कर रहे हैं। उनको अपने बराबरी के रिश्ते पसंद नहीं आते और जो बड़े घर पसंद आते हैं उनको लड़की पसंद नहीं आती। शादी की सही उम्र 22 से 27 तक है पर आज माँ-बाप ने और अच्छा करते-करते उम्र 30 से 36 कर दी है । जिससे उनकी बेटियों के चेहरे की चमक भी कम होती जाती है । और अधिक उम्र में  शादी होने के उपरांत वो लड़का उस लड़की को वो प्यार नहीं दे पाता जिसकी  हकदार वो लड़की है । किसी भी समाज में 30% डिवोर्स की वजह यही दिखाई दे रही है । आज जीने की उम्र छोटी हो चुकी है। पहले की तरह 100+ या 80+ नहीं होती। अब तो केवल 65+ तक जीने को मिल पायेगा। इसी वजह से आज लड़के उम्र से पहले ही बूढ़े नजर आते हैं, सर गंजा हो जाता है ।_*    *_(2) आज ज्यादातर लड़की वाले लड़के वालों को वापस हाँ /ना का जवाब नहीं दे रहे हैं। संभवत: कुछ लोग मन में आपको बुरा-भला बोलते होंगे। आप अपनी लाडली का घर बसाने निकले हैं, किसी का अपमान करना अच्छा नही होता। कृपया आप लड़के वालों से सम्मान जनक जरूर बात करें।_*      *...

राधिका

          मैं जब शादी होकर ससुराल आई , तो मैंने देखा वहां पर मेरी बड़ी ननद का राज चलता है । और हर कोई उन्हीं की बात मानता था , कोई उनके सामने किसी बात पर बहस नहीं करता था । मैंने अपने पति से बात करने की कोशिश की थी , उन्होंने यही कहा कि "वह जो बोले वह काम कर दो बाकी तुम्हें कुछ बोलने की जरूरत नहीं है अगर वह गलत भी बोलेगी तो हां कह देना" मुझे यह समझ में नहीं आता कि ऐसा क्या है कि हर कोई उनसे डरता है कोई भी उनको कोई बोल नही सकता वह  रूठ जाती थी, यहां तक की मेरे सास ससुर भी उनकी बातें मानते थे । वह जॉब करती थी। मुझे वह पत्थर दिल लगती थी । वे मुुुझसे ज्यादा बात भी नहीं करती थी । उनका एक रूटिन बना था उसमें कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता था वह 6:00 बजे उठ कर घूमने जााती थी 8:00 बजे उन्हें नाश्ता चाहिए था पेपर के साथ चाय नाश्ता करनेे के बाद 10:00 बजे ऑफिस जाती थी ।ऑफिस से 4:00 बजे वापस आती थी । और आकर आराम कुर्सी पर आराम करती थी शाम को टहलने निकलती थी उसके बाद 9:00 बजे सो जाती थी उनका पूरा रूटीन था और सब काम टाइम टेेेेबल से ही करती थी ।मगर वह वह घर का कोई काम नह...
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“The Iron never lies to you. You can walk outside and listen to all kinds of talk, get told that you’re a god or a total bastard. The Iron will always kick you the real deal. The Iron is the great reference point, the all-knowing perspective giver. Always there like a beacon in the pitch black. I have found the Iron to be my greatest friend. It never freaks out on me, never runs. Friends may come and go. But two hundred pounds is always two hundred pounds.”

*हमारे शब्द ही हमारे कर्म है।* *महाभारत के युद्ध के बाद*

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*हमारे शब्द ही हमारे कर्म है।* *महाभारत के युद्ध के बाद* 18 दिन के युद्ध ने द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी। उसकी आंखे मानो किसी खड्डे में धंस गई थी, उनके नीचे के काले घेरों ने उसके रक्ताभ कपोलों को भी अपनी सीमा में ले लिया था। श्याम वर्ण और अधिक काला हो गया था । युद्ध से पूर्व प्रतिशोध की ज्वाला ने जलाया था और युद्ध के उपरांत पश्चाताप की आग तपा रही थी । ना कुछ समझने की क्षमता बची थी ना सोचने की । कुरूक्षेत्र मेें चारों तरफ लाशों के ढेर थे। जिनके दाह संस्कार के लिए न लोग उपलब्ध थे न साधन । शहर में चारों तरफ विधवाओं का बाहुल्य था पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर केे महल मेंं निश्चेष्ट बैठी हुई शूूूून्य को ताक रही थी । तभी कृष्ण कक्ष में प्रवेश करते हैं ! महारानी द्रौपदी की जय हो । द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है कृष्ण उसके सर को सहलातेे रहते हैं और रोने देते हैं थोड़ी देर में उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बिठा देते हैं । *द्रोपती*...