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Showing posts from July, 2019

स्त्रियों_को_समर्पित

एक स्त्री द्वारा लिखित बेहद संवेदनशील और अन्दर तक झकझोरने वाला लेख..😢 मुझे याद नहीं कि बचपन में कभी सिर्फ इस वजह से स्‍कूल में देर तक रुकी रही होऊं कि बाहर बारिश हो रही है ना। भीगते हुए ही घर पहुंच जाती थी और तब बारिश में भीगने का मतलब होता था, घर पर अजवाइन वाले गर्म सरसों के तेल की मालिश और ये विदाउट फेल हर बार होता ही था। मौज में भीगूं तो डांट के साथ-साथ सरसों का तेल हाजिर। फिर जब घर से दूर रहने लगी तो धीरे-धीरे बारिश में भीगना कम होते-होते बंद ही हो गया। यूं नहीं कि बाद में जिंदगी में लोग नहीं थे। लेकिन किसी के दिमाग में कभी नहीं आया कि बारिश में भीगी लड़की के तलवों पर गर्म सरसों का तेल मल दिया जाए। कभी नहीं। ऐसी सैकड़ों चीजें, जो माँ हमेशा करती थीं, माँ से दूर होने के बाद किसी ने नहीं की। किसी ने कभी बालों में तेल नहीं लगाया। माँ आज भी एक दिन के लिए भी मिले तो बालों में तेल जरूर लगाएं। बचपन में खाना मनपसंद न हो तो माँ दस और ऑप्‍शन देती। अच्‍छा घी-गुड़ रोटी खा लो, अच्‍छा आलू की भुजिया बना देती हूं। माँ नखरे सहती थी, इसलिए उनसे लडि़याते भी थे। लेकिन बाद में किसी ने इस त...
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प्रेमिका मरती नही है सिर्फ दफन हो जाया करती है प्रेमी की गुमनाम चिट्ठियों में जिन्हें लिखा जाता है सफेद रंग की स्याही से,या फिर रह जाती है उसके कमरे में पड़ी किसी किताब के पन्ने में, वो किताब जो सदियों पहले जला दी गयी थी, वो नजर आती है सिगरेट के उड़ते धुंए में और गुम हो जाती है किसी के पैरों तले दब कर उसी आधी सिगरेट की तरह,उसके हाथों की मेहंदी का रंग पीला पड़ चुका होता है वो दूर से देखती है उसकी मोहोब्बत को किसी आवारा के गले लगते हुए, वो चाहती है ज़ोर से चीखना , वो तड़पती है खुद को प्रेमी की बाहों में भरकर सो जाना चाहती है, प्रेमिका कभी मरती नही बस खो जाया करती है चार दीवारी अंधेरो में जहाँ सिर्फ उसके प्रेमी की सांसो की ही आवाज होती है जहां उसका जिस्म आहिस्ते आहिस्ते रूह से दूर हो जाएगा, जहाँ इस दुनिया के कानून काम न आएंगे और जहाँ एक बार फिर दो लबो का मिलन होगा, ठीक उस जगह प्रेमी तोड़ चुका होगा अपना दम और वो दोनों एक लाल चादर में लिपटे जिंदगी की तमाम रातें गुजार देंगे , जहाँ जन्म होगा एक नए इश्क़ का जो लिखेगा चिट्ठियां , और दफन कर देगा एक बार फिर से प्रेमिका को जो जिंदा है ।

वो खुशनसीब दोनों थकते नहीं।

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सुबह उठकर वो रोटियाँ समेटती है कागज़ में, साथ में लेती है सालन ज़रा सा, ज़रा सी आम की चटनी भी। फिर अपने बच्चों को तैयार करती है स्कूल भेजने के लिए, अपनी बेटी के माथे से तेल पोंछती है अपनी सारी के पल्लू से, चूल्हा चौखट करने में उस औरत की सुबह ख़त्म होती है। तबतक उसका मर्द सजाता है अपना कारोबारी ठेला, फिर दोनों साथ-साथ निकलते है आनेवाले कल की रोटी के लिए। रास्ते में जाते हुए जब वो कुछ अपनी बातें करना शुरू करते है, उस औरत की चूड़ियाँ फिर बैकग्राउंड म्यूज़िक पेश करती है। उपर से उड़कर तितलियाँ उनपर रंग बिखेरती है जैसे, पेड पौधे भी फिर झुकते है और साया करने लगते है। दूसरे गांव पहुंचने तक वहां से शाम को लौटने तक भी, ताज़्जुब ये है कि वो खुशनसीब दोनों थकते नहीं। शाम जब घर आते है तो टूटी-फूटी दहलीज़ को सिनें से लगा लेते है अपने दोनों बच्चों के लिए वो खिलौने के तौर पर एक हँसी और थकान लाए होते है। वो कभी भी अपने इन  हालातों से डरे नहीं है आपस में किसी इच्छाओं के लिए लड़े नहीं है

मकान

        मकान इंट पत्थर से नहीं बनता। मकान तो इश्क़ से बनता है । खट्टी मिठी तकरारों से बनता है । प्यार से पकाइ   रसोई में पनपता है । फ्रिज से पानी निकालने के बहाने किये पीछे से आलिंगन से बनता है ।छत पे कपड़े सुखाने गयी अपनी चाँद के पीछे- पीछे दवे पावँ चलने से बनता है।                  हमारा मकान भी कुछ ऐसे ही बना था धीरे धीरे।इश्क़ पल दर पल बढता गया और हमारा मकान रफ्ता रफ्ता बनता गया।अंजान सफर से, मिलके सफर करने तक सारी झिझक मिट गइ थी।बिना देखे शादी करने से, बस देखते रहके जिंदगी बिताने तक का सफर आँच की तरह था हमारे लिए।पर अच्छा हुआ।प्रेम पक पक के परिपक्व बना और हमारा मकान एक संपूर्ण घर बन गया।कुछ हिस्से उसकी रूह ने बनाए , हाँ तब , जब मैं उसका माथा चुम के उसकी आँखें निहार रहा था।कुछ हिस्सें मेरे अनाविल प्रेम ने बनाए , हाँ तब, जब वो दर्पण में अपनी बिंदी चिपकाए मेरे लिए सवर रही थी।कुछ हिस्सें उसके पनघट के आढ के इंतजार ने बनाए और कुछ हिस्सें मेरे डटे हुए कर्त्तव्य ने।बाकी कुछ हिस्सें तब बन गये थे जब उसने नजरें लड...

मेरा किस्सा

बारिश...कल, आज, कल। देखो जब बारिश होती है ना तो तुम बहुत याद आते हो, हालांकि हमारी ऐसी कोई खास याद नहीं जो बारिश से जुड़ी हो, फिर भी...जब बारिश होती हैं तो तुम्हारी कमी सबसे ज्यादा खलती है... शायद इसलिए क्यूंकि तुमसे प्यार का इजहार इसी मौसम में किया था, तुम्हे देखने की बेचैनी हा ये एहसास भी पहली बार इसी मौसम की ही तो देन है, कैसे देर रात अपने घर के बंद दरवाजों की कनखियो से तुम्हारी एक झलक देखने का इंतज़ार होता था, उस लोहे के दरवाजे से अपने गाल टिकाए जैसे उस दरवाज़े की ठंडक भी तुम्हारे प्यार का एहसास हो...याद है एक बार मुझसे बाते करते वक़्त तुम टहलते टहलते घर से कुछ दूर निकल आए और बारिश के कारण रात ३ बजे तक एक दुकान के टीन शेड के नीचे तुम मुझसे फोन पर बतियाए...वो भी एक अलग ही वक़्त था...एक शब्द में परिभाषित करना हो तो ''खूबसूरत" ... बारिश में तुम्हारा बार बार बीमार होना और उस पर मेरा डांट लगाना के तुम खुद का बिल्कुल खयाल नहीं करते...और इस पर भी तुम्हारा और भी लापरवाह होजाना वो भी तो अनकहा इश्क़ ही था,... अच्छा याद करो इस मौसम में जब भी तुमसे मिलने आती और जब मेरे जाने के...

मेरे मन का विचार

सभ्यता के नाम पर हमारे पास है क्या ?? " न ढ़ोल बजते हैं ,   न मंजीरा बजता हैं ,,   न कोई नाचने की क्षमता रह गयी हैं ; पैर ही नाचना भूल गये हैं ।       हम ने लिखा हैं कि उस रात पूरे चांद के नीचे , वृक्षों के नीचे नाचते हुए गाँववाले को देखकर , मेरे मन में यह सवाल उठा कि हमने पाया क्या हैं , प्रगति के नाम पर ??          लोग हमे समझेगे पागल हो गयी हैं ।     लोग दुख को तो समझते हैं स्वास्थ्य , और आंनद को समझते हैं विक्षिप्तता । हालतें इतनी बिगड़ गयी हैं कि इस दुनिया में केवल पागल ही हंसते हैं ,,,,,,, बाकी ...... , समझदारों को तो हंसने की फुर्सत कहाँ हैं. ?? " समझदारों के ह्रदय को सूख गये हैं , समझदार रूपये गिनने में उलझे हैं , समझदार महत्वाकांक्षी की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं । समझदार तो कहते हैं दिल्ली चलो । फुर्सत कहाँ हैं हंसने की , दो गीत गाने की , इकतारा बजाने की , तारों के नीचे वृक्षों की छाया में नाचने की , सूरज को देखने की , फूलों से बात करने की , वृक्षों को गले लगाने की , फुर्सत किसे है ??     " ...

#एक_सुंदर_सी_कहानी........💞

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"रेनू की शादी हुयें, पाँच साल हो गयें थें, उसके पति थोड़ा कम बोलतें थे पर बड़े सुशील और संस्कारी थें, माता_पिता जैंसे सास, ससुर और एक छोटी सी नंनद, और एक नन्ही सी परी, भरा पूरा परिवार था, दिन खुशी से बित रहा था,           आज रेनू बीतें दिनों को लेकर बैठी थी, कैंसे उसके पिताजी नें बिना माँगे 30 लाख रूपयें अपने दामाद के नाम कर दियें, जिससे उसकी बेटी खुश रहे, कैसे उसके माता_पिता ने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की, बहुत ही आनंदमय तरीके से रेनू का विवाह हुआ था,         खैर बात ये नही थी, बात तो ये थी की  रेनू के बड़े भाई ने, अपने माता_पिता को घर से निकाल दिया था। क्यूँकी  पैसें तो उनके पास बचें नही थें, जितने थें उन्होने रेनू की शादी में लगा दियें थें, फिर भला बच्चें माँ बाप को क्यूँ रखने लगें।  रेनू के माता पिता एक मंदिर मे रूके थें ।😧😧 रेनू आज उनसे मिल के आयी थी, और बड़ी उदास रहने लगी थी। आखिर लड़की थी, अपने माता_पिता के लिए कैसे दुख नही होता, कितने नाजों से पाला था, उसके पिताजी ने बिल्कुल अपनी गुडिया बनाकर रखा था । आज वह...

मिडल_क्लास_के_लड़के

पढ़ना कुछ और चाहते हैं, पढ़ाया कुछ और जाता है...बन कुछ और जाते हैं ! पसन्द किसी और को करते हैं, प्यार किसी और का मिलता है शादी किसी और से हो जाती है ! चाय बना लेते हैं....बनानी पड़ती है... कर्ज़ लेने और देने में जरा सी भी देरी नही करते ! रिश्तेदारों को शहर घूमाने की जिम्मेदारी यही निभाते हैं ! 4जी फोन लेने में इन्हें साल भर लगता है ! गैस भरवाने की जिम्मेदारी, सुबह दूध और शाम की सब्जी लाने जैसा कठिन और दर्दनाक काम भी यही करते हैं ! खुद की प्रेमिका की शादी में 'नागिन डांस' करने का गौरव केवलः इन्हें ही प्राप्त है ! आइसक्रीम की टेस्ट से इन्हें शादी में हुए खर्चों का अंदाजा लग जाता है ! लुसेंट इनकी जिंदगी में उस गर्लफ्रेंड की तरह होती है जो साथ तो रहती है लेकिन समझ कभी नही आती ! रीजनिंग के प्रश्न चुटकी में हल कर देने वाले ये मिडल क्लास लड़के खुद की जिंदगी की समस्याओं में उलझे रह जाते हैं ! घर और अपनी 'जान' से किसी लायक बनने का वादा करके निकले ये मिडल क्लास लड़के जब तक लायक हो के घर लौटते हैं...तब तक उनकी जान 'दो चार जानों' की 'जननी' बन चुकी होती...

मेरी बिटिया बड़ी हो गयी।

मेरी बिटिया बड़ी हो गयी। एक रोज उसने बड़े सहज भाव में मुझसे पूछा---" पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया ?? " मैंने कहा---" हाँ। " " कब ? "---उसने आश्चर्य से पूछा। मैंने बताया---" उस समय तुम करीब एक साल की थीं, घुटनों पर सरकती थीं। मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और खिलौना रख दिया क्योंकि मैं देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो। तुम्हारा चुनाव मुझे बताता कि, बड़ी होकर तुम किसे अधिक महत्व देतीं। जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद। मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था। मुझे तुम्हारा चुनाव देखना था। तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं। मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा तुम्हें देख रहा था। तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं, मैं श्वांस रोके तुम्हें देख रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर मेरी गोद में बैठ गयीं। मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि, उन तीनों वस्तुओं के अलावा तुम्हारा एक चुनाव मैं भी त...