मेरे मन का विचार


सभ्यता के नाम पर हमारे पास है क्या ??
" न ढ़ोल बजते हैं ,
  न मंजीरा बजता हैं ,,
  न कोई नाचने की क्षमता रह गयी हैं ;
पैर ही नाचना भूल गये हैं ।
      हम ने लिखा हैं कि उस रात पूरे चांद के नीचे , वृक्षों के नीचे नाचते हुए गाँववाले को देखकर , मेरे मन में यह सवाल उठा कि हमने पाया क्या हैं , प्रगति के नाम पर ??
         लोग हमे समझेगे पागल हो गयी हैं ।
    लोग दुख को तो समझते हैं स्वास्थ्य , और आंनद को समझते हैं विक्षिप्तता । हालतें इतनी बिगड़ गयी हैं कि इस दुनिया में केवल पागल ही हंसते हैं ,,,,,,, बाकी ......
, समझदारों को तो हंसने की फुर्सत कहाँ हैं. ??
" समझदारों के ह्रदय को सूख गये हैं ,
समझदार रूपये गिनने में उलझे हैं ,
समझदार महत्वाकांक्षी की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं ।
समझदार तो कहते हैं दिल्ली चलो ।
फुर्सत कहाँ हैं हंसने की ,
दो गीत गाने की ,
इकतारा बजाने की ,
तारों के नीचे वृक्षों की छाया में नाचने की ,
सूरज को देखने की ,
फूलों से बात करने की ,
वृक्षों को गले लगाने की ,
फुर्सत किसे है ??
    " ये तो आखिरी की बात है ,,,
जब सब पूरा हो जायेगा - धन होगा , पद होगा, प्रतिष्ठा होगी , तब बैठे लोग वृक्षों के नीचे।
लेकिन यह दिन कभी आता नही , न कभी आता हैं , न कभी आयेगा। ऐसे जिंदगी तुम गुजार देते हो रोते - रोते , झींकते - झींकते।
ऐसे ही आते हो ऐसे ही चले जाते हो - खाली हाथ आये , खाली हाथ गये ।
तो अगर तुम्हें कभी भीतर का  रस , जन्मने लगे और भीतर स्वाद आने लगे .....
और देर नही लगती आने में , जरा भीतर मुड़ो कि वह सब मौजूद है .......।।
" मेरे मन का विचार ,
   



धन्यवाद

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