मकान
मकान इंट पत्थर से नहीं बनता। मकान तो इश्क़ से बनता है । खट्टी मिठी तकरारों से बनता है । प्यार से पकाइ रसोई में पनपता है । फ्रिज से पानी निकालने के बहाने किये पीछे से आलिंगन से बनता है ।छत पे कपड़े सुखाने गयी अपनी चाँद के पीछे- पीछे दवे पावँ चलने से बनता है।
हमारा मकान भी कुछ ऐसे ही बना था धीरे धीरे।इश्क़ पल दर पल बढता गया और हमारा मकान रफ्ता रफ्ता बनता गया।अंजान सफर से, मिलके सफर करने तक सारी झिझक मिट गइ थी।बिना देखे शादी करने से, बस देखते रहके जिंदगी बिताने तक का सफर आँच की तरह था हमारे लिए।पर अच्छा हुआ।प्रेम पक पक के परिपक्व बना और हमारा मकान एक संपूर्ण घर बन गया।कुछ हिस्से उसकी रूह ने बनाए , हाँ तब , जब मैं उसका माथा चुम के उसकी आँखें निहार रहा था।कुछ हिस्सें मेरे अनाविल प्रेम ने बनाए , हाँ तब, जब वो दर्पण में अपनी बिंदी चिपकाए मेरे लिए सवर रही थी।कुछ हिस्सें उसके पनघट के आढ के इंतजार ने बनाए और कुछ हिस्सें मेरे डटे हुए कर्त्तव्य ने।बाकी कुछ हिस्सें तब बन गये थे जब उसने नजरें लडाके नजरें झुकाइ थीं और कुछ हिस्सें तब बन गये जब मैंने उसे झुमका पहनाते वक्त उसके कंधे पे मृदू चुंबन दिया था।
एक मकान को संपूर्ण बनाने में सारी जिंदगी सींचना पड़ता है।बस वही किया हम दोनों ने।हाँ, मैं थोडा लडखडाता , हर दिन उनके ईश्क़ के नशे से घूंट जो पी लेता था।पर वो तो औरत थी, सशक्त और साहसी।और उसने जिंदगी भर ऐसा संभाला मुझे और हमारे मकान को की अबतलक रंग ना उतरा।
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