प्रेमिका मरती नही है सिर्फ दफन हो जाया करती है प्रेमी की गुमनाम चिट्ठियों में जिन्हें लिखा जाता है सफेद रंग की स्याही से,या फिर रह जाती है उसके कमरे में पड़ी किसी किताब के पन्ने में, वो किताब जो सदियों पहले जला दी गयी थी, वो नजर आती है सिगरेट के उड़ते धुंए में और गुम हो जाती है किसी के पैरों तले दब कर उसी आधी सिगरेट की तरह,उसके हाथों की मेहंदी का रंग पीला पड़ चुका होता है वो दूर से देखती है उसकी मोहोब्बत को किसी आवारा के गले लगते हुए, वो चाहती है ज़ोर से चीखना , वो तड़पती है खुद को प्रेमी की बाहों में भरकर सो जाना चाहती है, प्रेमिका कभी मरती नही बस खो जाया करती है चार दीवारी अंधेरो में जहाँ सिर्फ उसके प्रेमी की सांसो की ही आवाज होती है जहां उसका जिस्म आहिस्ते आहिस्ते रूह से दूर हो जाएगा, जहाँ इस दुनिया के कानून काम न आएंगे और जहाँ एक बार फिर दो लबो का मिलन होगा, ठीक उस जगह प्रेमी तोड़ चुका होगा अपना दम और वो दोनों एक लाल चादर में लिपटे जिंदगी की तमाम रातें गुजार देंगे , जहाँ जन्म होगा एक नए इश्क़ का जो लिखेगा चिट्ठियां , और दफन कर देगा एक बार फिर से प्रेमिका को जो जिंदा है ।
मेरे बेटे
कभी इतने ऊँचे मत होना कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ . न कभी इतने बुद्धिजीवी कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग . इतने इज़्ज़तदार भी न होना कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो . न इतने तमीज़दार ही कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी . इतने सभ्य भी मत होना कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से . न इतने सुथरे ही होना कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में . इतने धार्मिक मत होना कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ . न कभी इतने देशभक्त कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको . कभी इतने स्थायी मत होना कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी . और न कभी इतने भरे-पूरे कि किसी का प्रेम में बिलखना और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प। .

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