वो खुशनसीब दोनों थकते नहीं।

सुबह उठकर
वो रोटियाँ समेटती है कागज़ में,
साथ में लेती है
सालन ज़रा सा, ज़रा सी आम की चटनी भी।

फिर अपने बच्चों को
तैयार करती है स्कूल भेजने के लिए,
अपनी बेटी के माथे से
तेल पोंछती है अपनी सारी के पल्लू से,
चूल्हा चौखट करने में
उस औरत की सुबह ख़त्म होती है।

तबतक उसका मर्द
सजाता है अपना कारोबारी ठेला,
फिर दोनों साथ-साथ
निकलते है आनेवाले कल की रोटी के लिए।

रास्ते में जाते हुए जब वो
कुछ अपनी बातें करना शुरू करते है,
उस औरत की चूड़ियाँ
फिर बैकग्राउंड म्यूज़िक पेश करती है।

उपर से उड़कर
तितलियाँ उनपर रंग बिखेरती है जैसे,
पेड पौधे भी फिर
झुकते है और साया करने लगते है।

दूसरे गांव पहुंचने तक
वहां से शाम को लौटने तक भी,
ताज़्जुब ये है कि
वो खुशनसीब दोनों थकते नहीं।

शाम जब घर आते है तो
टूटी-फूटी दहलीज़ को सिनें से लगा लेते है
अपने दोनों बच्चों के लिए वो
खिलौने के तौर पर एक हँसी और थकान लाए होते है।

वो कभी भी अपने इन  हालातों से डरे नहीं है
आपस में किसी इच्छाओं के लिए लड़े नहीं है

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