एक तिलस्मी सपना महिला का

 .


.




धनपत राय 'प्रेमचन्द', जयशंकर प्रसाद, पन्त, महादेवी वर्मा,निराला, अमृतलाल नागर,बाबा नागार्जुन, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, प्रभाकर श्रोत्रिय, कल इन‌ साहित्य-रत्नों से सपने में रोचक आत्मीय संवाद हुआ ।


मैंने विनम्रता से कहा : एक जिज्ञासा भरा प्रश्न आप सबसे मुख़ातिब है__


"आप सब में से किसी ने कभी 

 कोई साहित्योत्सव आयोजित किए, उनमें भागीदारी की ?अपने ऑडियो- वीडियो बनवाए ?"


यह सुनते ही, कुछ ने व्यंग्य से तिर्यक मुस्कान के साथ, बाबू जी अमृतलाल नागर एवं बाबा नागार्जुन ने ज़ोरदार ठहाके के साथ ‌और निराला जी ने बड़ी-बड़ी ऑंखों से तरेरते हुए 

कहा___


   "नहीं, पगली, नहीं"


मैंने अचरज भरे सुर में कहा___


" फिर भी आप का साहित्य, आपकी शोहरत, आपके चर्चो की आज तक धूम कैसे है । देश में ही नहीं, सीमा पार भी, अनेक देशों में आप पर साहित्यिक अध्ययन, कार्यशालाऍं, संगोष्ठियाॅं, भाषण प्रतियोगिता, निबन्ध प्रतियोगिता, छोटे-बड़े संस्थानों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों आदि में बड़े सम्मान और उत्साह से आयोजित होती हैं । ऐसा कैसे ?"


इस पर, मेरी बुद्धि पर तरस सा खाते हुए, सभी का लगभग एक ही, दो टूक जवाब था___


"क़लम के दम पर !!!

आज के जिन साहित्य उत्सवों में 'साहित्य' होता ही कहाॅं है ? सिवाय, काकरार, ही-ही, हू-हू, एक-दूसरे की काट, गुटबंदी, खेमेबाजी, एक दूसरे की पीठ खुजलाना, तू मेरी वाह-वाह कर, मैं तेरी वाह-वाह में ज़मीन-आसमान एक कर‌ दूॅं, साहित्य तो सुबकता हुआ दुबका रहता है और जो दिखता है, माइक पर सुनने में आता है, वह साहित्य थोड़े ही होता है । शब्दों का जखीरा होता है । वो अटपटी अर्थविहीन, उलट-सुलट वर्तनी वाली, विराम चिह्नों से दूर मरगिल्ली भाषा । क्या फ़ायदा ऐसे आयोजनों के लोग भाषा का सही रूप ही भूल जाएं । साहित्य के नाम पर, बिखरी और टूटी - फूटी दास्तान से पन्ने भर डालें ?


और आगे सुन, निर्बुद्धि बिटिया, एकान्त में बैठकर, योगी की तरह शान्त मनस होकर, दुनिया के मेले-ठेलों से दूर, अपने अन्तर्मन में उतर कर, एकाग्रचित्त होकर जब हमारी क़लम चलती है, तो इससे शब्द-ब्रह्म पन्नों पर ऐसा अमृत बहाता है, जो कालजयी होता है और हम पर भी कालजयी होने का आशीर्वाद पसर जाता है । क्या समझी ?"


मैंने उनके अपनत्व और प्रेम भरे शब्दों से अभिभूत होते हुए, नतमस्तक होकर कहा ___"🙏🙏 समझ गई, समझ गई, मैं तो समझ गई, पर, दुनिया कब समझेगी ? "


तो वे बोले ___

"मुरख दुनिया को उसके हाल पर छोड़ और तू अपनी डगर पर अडिग रह । हमारी तरह, क़लम के दम पे भरोसा कर ! "


और इन सुन्दर वचनों की गूॅंज के साथ ही, मेरी ऑंखें खुल गई, घड़ी में देखा तो, सुबह के पाॅंच बजे थे । 


Comments

Popular posts from this blog

मेरे बेटे

नया युग(कविता)

"कच्ची नीम की निम्बौरी सावन जल्दी अईयो रे.........''