अनुभव

 आज एक ऐसा अनुभव हुआ जिसे मैं शायद ही कभी भूल सकूं. 

मेरे मोबाइल का स्क्रीन गार्ड दरक गया था. उसे बदलवाने के लिए एक छोटी-सी थड़ी नुमा दुकान पर रुका. एक छोटी उम्र का लड़का वह दुकान चला रहा था. उसे मोबाइल दिखाया तो उसने कहा कि ऑरिजिनल, कम्पनी का स्क्रीन गार्ड एक सौ रुपये का होगा. मैंने उसे लगाने की स्वीकृति दे दी. वह किसी और के मोबाइल पर स्क्रीन गार्ड लगा रहा था. बहुत तसल्ली और सफाई से वह अपना काम कर रहा था. जैसे ग्राहक को निबटा कर पैसे जेब के हवाले करने की उसे कोई जल्दी ही न हो. मुझे समझ में आया कि उसके हाथ में जो मोबाइल था वह स्विगी के एक डिलीवरी बॉय का था. बॉय जल्दी कर रहा था, कि उसकी डिलीवरी लेट हो रही है, लेकिन मोबाइल वाला लड़का पूरे परफेक्शन के साथ अपना काम कर रहा था. काम पूरा हुआ, डिलीवरी बॉय ने उसे सौ का नोट दिया, मैंने चोर निगाहों से देखा कि मोबाइल वाले ने उसे बीस रुपये लौटाए हैं. डिलीवरी बॉय वहां से हट ही रहा था कि मैंने मोबाइल वाले लड़के से कहा कि तुमने इससे तो अस्सी रुपये लिए हैं, मुझसे सौ क्यों लोगे? यह बात जाते हुए डिलीवरी बॉय ने सुन ली. वह पलटा और मोबाइल वाले लड़के के हाथ में बीस रुपये थमाता हुआ मुझसे बोला, "मैंने इससे बहुत रिक्वेस्ट करके बीस रुपये कम करवाए थे, लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरा नाम लेकर आप इसका नुकसान करें. इसलिए मैं इसे बीस रुपये लौटा रहा हूं. आप इसे सौ रुपये ही दें." और यह कहते हुए वह सड़क के पार खड़ी अपनी बाइक की तरफ बढ़ गया. मैं निश्श्ब्द था. जैसे तैसे मैंने उस डिलीवरी बॉय को बुलाया और उसे आश्वस्त करते हुए कि उसका उदाहरण देकर मैं इस छोटी दुकान वाले का नुकसान नहीं करूंगा, उसे बीस रुपये वापस दिलवाए! 

मैं समझ सकता हूं कि उस डिलीवरी बॉय के लिए बीस रुपये कितने महत्वपूर्ण होंगे. लेकिन उसे यह गवारा नहीं हुआ कि उसकी बचत की चपत मोबाइल वाले को लगे! कितनी बड़ी बात थी यह!

ऐसे अनुभव ही हमें भरोसा दिलाते हैं कि दुनिया बहुत अच्छी है! शैलेंद्र का गाना याद आ रहा है - "किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार/ किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार.... जीना इसी का नाम है! "

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