संदेश देती कहानी

 



पवन काफी देर से नोएडा, गौर सिटी चौक पर खड़ा हुआ किसी ऑटो के इंतजार में था, जो भी ऑटो आ रहे थे वह पहले से भरे होने के कारण ड्राइवर के साथ आगे बैठने को कह रहे थे, वह सोच रहा था ऐसा ऑटो दिखे जो खाली हो, ताकि पीछे की सीट पर आराम से बैठ सके व उसका सफर एक हाथ से ऑटो पकड़कर व दूसरा हाथ लटकाकर बैठने में न गुजरे, कुछ देर बाद एक ऑटो दिखाई दिया, ऑटो के धीमे होते ही पवन ने पूछा 

"मेट्रो सेक्टर 52 चलोगे क्या ?"

"बाबन सेक्टर? जी साहब चलिए," ऑटो वाले ने रिप्लाई किया

"कितना रुपया ?" पवन ने यह सोच कर पूछा कि पूरा खाली है तो ज्यादा न मांग ले

 30/ -, यह सुनकर वह बैठ गया,और जेब से मोबाइल हाथ में निकालकर चलाने लगा, जैसे ही ऑटो थोड़ा आगे बढ़ा, तो एक बुजुर्ग महिला ने, जो दो बच्चों के साथ थी, रुकने का इशारा किया और पूछा "सिटी सेंटर चलोगे क्या?"

ऑटो वाले ने पीछे सीट की तरफ इशारा किया और कहा " जल्दी बैठो"

"कितने रुपए लोगे?" बच्चों को पहले बिठालते हुए उस महिला ने पूछा

 "30 रुपए सवारी" ऑटो वाले ने जल्दी से जवाब दिया

 "अरे नहीं! पागल है का, 20 रुपए लगते हैं रोज जाते हैं हम,"

 "नहीं अम्मा उतर जाओ, मैं नहीं लेजा पाऊंगा,"

 तब तक दोनों बच्चे बैठ चुके थे और महिला भी एक पैर अंदर रख दूसरा रखने ही वाली थी, यह सुन वह जैसे ही उतरने लगी तो पवन ने ऑटो वाले के कंधे पर हाथ रख कर कहा, "ले चल, तेरी पूर्ति मैं कर दूंगा,वैसे भी बच्चों के साथ है,कहां भटकेगी"

 यह सुन वह उन्हें बिठालकर ऑटो आगे बढ़ाने लगा, थोड़ी देर बाद अम्मा बोली, "200 रुपए जैसे तैसे बचाए थे बच्चों को खिलौना दिलवाने के लिए, दोनों नातियों को घुमाने लाई थी,अब किराए में ही 120 लग गए क्या बचेगा,"

 कुछ देर तक ऑटो में शांति रही थोड़ी ही देर बाद पवन अपने स्टेशन पर उतरा, उतरकर जेब से पर्स निकाला, ऑटो वाले को 100 रुपए दिए और कहा "इनसे किराया मत लेना," और विना मुड़े सीधा मेट्रो की और चल पड़ा, उसे अपनी मां की याद रही थी जो उसे घर तक ले जाने में यात्रा के दौरान कई समस्याओं से गुजरती थी, और 5,10 रुपए बचाने के चक्कर में वह उसे सीट की जगह गोदी में बिठालकरा ही परेशानी के साथ यात्रा पूरी करती थी, उसे लग रहा था जैसे वह इस महिला की मदद करके अपनी मां की मदद कर पा रहा है, जब उसकी मां को मदद की जरूरत थी तब वह इस लायक नहीं था और जब इस लायक हुआ तो उसकी मां इस दुनिया में नहीं रही ।

धीरे धीरे वह मैट्रो की भीड़ और प्रदूषण की धुंध में कहीं गुम हो गया ।

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