चीन
चीन पर वे हथकंडे नहीं अपनाए जा सकते थे, जो भारत में काम आए। भारत में रह कर ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहाँ के भेद समझ लिए थे। जबकि चीन उनके लिए अनसुलझी पहेली थी।
भारत में उन्हें अलग-अलग रंगों के, आस्थाओं के, सामाजिक वर्गों, भाषाओं के, और अलग रियासतों के लोग मिले। उनमें फूट डालने के तरीके तो उन्हें मिल गए थे। उन्हें अपनी सहूलियत से जोड़ना कुछ पेचीदा काम था। दूसरी तरफ़, चीन की सरहदों को उन्होंने सिर्फ़ एक बंदरगाह पर आवा-जाही और कुछ संस्मरणों से जाना था। वहाँ के लोग उन्हें एक जैसे दिखते, एक जैसी भाषा बोलने-लिखने वाले और एक ही राजा के अधीन नज़र आते। उन्हें कैसे तोड़ा जाए?
हालाँकि ब्रिटिशों को यह मालूम हुआ कि मंचू साम्राज्य में मंगोलों की भागेदारी घट रही है, और उत्तरी हान वंशजों की बढ़ रही है। तिब्बत भी चीन में शामिल तो था, मगर वे चीनी नहीं। कुछ ऐसा ही शिनजियांग प्रांत में भी था।
मकार्टनी ने चीन से लौटते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा-
“चीन का साम्राज्य किसी दक़ियानूसी लेकिन एक ऊँचे दर्जे के जहाज की तरह है, जिसे उसके काबिल अधिकारियों ने डेढ़ सौ वर्षों से समंदर में टिकाए रखा है। वह जहाज इतना विशाल है कि उसे देख उसके पड़ोसी देश चकित रह जाएँ। लेकिन, जैसे ही इस जहाज की ज़िम्मेदारी किसी नाकारा कप्तान के हाथ में आएगी, इसका अनुशासन बिखर जाएगा।
शायद यह जहाज एक झटके में न डूबे। कुछ देर लहरों में हिलकोरे लेकर और आखिर किसी चट्टान से टकराकर इस कदर टुकड़ों में बिखर जाए कि वापस कभी खड़ा न हो सके….
हमें इसके लिए उनके व्यापार के ढर्रे को बदल कर अपने फ़ायदे में करना होगा।”
मगर मसला तो यही था कि भला चीन का व्यापार बदले कैसे। मकार्टनी अपने साथ चीन के राजा की वह चिट्ठी ले जा रहे थे, जो उन्होंने ब्रिटेन के राजा जॉर्ज तृतीय को लिखा था-
“कल आपके राजदूतों ने मुझे व्यापारिक संधि के विषय में बताया, जो हमारी परंपरा के विपरीत है। अब तक हमने असभ्य (barbarian) यूरोपीयों को इतनी इजाज़त तो दी है कि वे कैंटन बंदरगाह में आएँ, हमसे सामान खरीदें, और लौट जाएँ। हमारे इस महान साम्राज्य में ऐसी किसी चीज की कमी नहीं, जो हमें आपसे खरीदना पड़े। वहीं हमारे चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बिना आप यूरोपियों का जीवन नहीं चलता…
अगर आपके जहाज हमारी नीतियों का अनदेखा कर कैंटन बंदरगाह से आगे झेजियांग या तियान्जिन की तरफ़ आए, तो हम कड़ा रुख अपनाएँगे। मुझे यह कहने में गुरेज नहीं कि आपके व्यापारियों को धक्के मार कर बाहर निकाल दिया जाएगा। आप हमारी बातों को चेतावनी समझें।”
वाकई चीन को देने के लिए ब्रिटेन के पास कुछ ख़ास था नहीं। उन्होंने तोहफ़े में कुछ चश्मे (लेंस) और बग्घियाँ भेजी थी। साथ ही एक हवा भरने वाला पंप भेजा था। पंप देख कर राजा ने कहा कि यह बच्चों का खिलौना है। चश्मे का शीशा रख लिया। बग्घियाँ चीनी कद के हिसाब से ऊँची थी, तो उसे यूँ ही किनारे रख दिया गया।
जब ज़रूरतें न हो, तो ज़रूरतें बनानी पड़ती है। जैसे इस मोबाइल, इस फ़ेसबुक, इस ट्विटर के बिना भी दुनिया चल रही थी, मगर अब लोग इसके नशे में डूबे हैं। अठारहवीं सदी में अंग्रेज़ों को किसी ऐसे नशे की तलाश थी, जिसकी लत चीन को लग जाए और यह साम्राज्य उनकी गिरफ़्त में आ जाए।
बकौल अमिताव घोष, बंगाल प्रेसीडेंसी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इतिहास का सबसे घिनौना अपराध शुरू किया। जब वहाँ हज़ारों एकड़ में सुर्ख़ फूल लहलहाने लगे। चीनियों के लिए अंग्रेज़ भारत में अफ़ीम उगाने लगे।
चित्र- अंग्रेज़ों द्वारा चीनियों को अफ़ीम सुंघाने का एक कार्टून, 1864

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