दर्द
देश में एक नया राष्ट्रीय प्रोग्राम शुरू हुआ है,
बिभाजन विभीषिका स्मृति दिवस ।
दर्द समय के साथ भर जाते हैं। हर घाव को बार-बार कुरेदते रहना ज़रूरी नहीं होता। कई बार भूल जाना ही आगे बढ़ने का सबसे मानवीय तरीका होता है।
तमाम परिवारों की पुश्तैनी दुश्मनियाँ तीसरी या चौथी पीढ़ी में जाकर खत्म हो जाती हैं। नई पीढ़ी को अक्सर ठीक-ठीक पता भी नहीं होता कि उनके दादा या परदादा किस बात पर एक-दूसरे के दुश्मन थे। और शायद यही अच्छा है। क्योंकि अगर हर पीढ़ी अपने हिस्से का पुराना हिसाब लेकर बैठ जाए, तो कोई परिवार कभी शांति से नहीं जी पाएगा।
देश भी कुछ ऐसा ही होता है।
हमारे देश का बँटवारा इस भूगोल पर रहने वाले लोगों के लिए सिर्फ नक्शे की एक लकीर नहीं था। वह एक बहुत गहरा घाव था। लाखों लोग अपने घर, जमीन, रिश्ते और अपनी पूरी पिछली जिंदगी छोड़कर इधर से उधर हुए। बहुतों ने अपने लोगों को खोया। बहुतों ने हिंसा देखी। उस पीड़ा की गहराई को शब्दों में समेटना मुश्किल है।
लेकिन समय का काम शायद यही है कि वह सबसे गहरे घाव पर भी धीरे-धीरे नई त्वचा उगा देता है।
बँटवारे का विनाश झेलने वाले परिवारों की अब चौथी, पाँचवीं पीढ़ी जवान हो रही है। उनके लिए वह घर, वह शहर, वह खेत, वह गली एक स्मृति भी नहीं, अक्सर सिर्फ किसी पुराने किस्से का हिस्सा है। उन्होंने उस दर्द को जिया नहीं है। और शायद उन्हें उसे विरासत में लेकर जीने की जरूरत भी नहीं है।
अगर हमारे पुरखे विस्थापन का दर्द अपने साथ लेकर चले थे, तो हमारी जिम्मेदारी यह भी हो सकती है कि हम उस दर्द को यहीं रोक दें। अगली पीढ़ी को दुश्मनी नहीं, एक बेहतर भविष्य दें।
इसीलिए मुझे हमेशा लगता है कि इतिहास को याद करना और इतिहास के घाव को जिंदा करना और करना , दोनों अलग-अलग बातें हैं।
इतिहास पढ़िए। समझिए कि गलतियाँ कैसे हुईं। जानिए कि इंसान ने इंसान के साथ क्या किया। ताकि वही गलतियाँ दोहराई न जाएँ।
लेकिन क्या हर साल उस त्रासदी को ऐसे आयोजन में बदलना जरूरी है, जिसका मकसद पुराना दर्द फिर से महसूस कराना हो?
क्या हमें अपने बच्चों को बार-बार यह बताने की जरूरत है कि उनके पूर्वजों के साथ क्या हुआ था, या उन्हें यह बताने की जरूरत ज्यादा है कि अब उन्हें कैसा देश बनाना है?
कल हमारा स्वतंत्रता दिवस है।
मेरी इच्छा है कि कल हम बँटवारे के दुख में नहीं, आजादी की खुशी में ज्यादा डूबें।
उन लोगों को याद करें जिन्होंने आजादी के लिए संघर्ष किया, उन परिवारों को याद करें जिन्होंने बहुत कुछ खोकर भी इस देश को अपना घर बनाया और सबसे बढ़कर उन बच्चों की तरफ देखें जो हमारे सामने हैं।
उन्हें एक ऐसा भारत दें जिसमें उन्हें अपने दादा-परदादा की दुश्मनियाँ विरासत में न मिलें।
कुछ घावों को इतिहास की किताब में सुरक्षित रखना चाहिए, दिल में नहीं।
क्योंकि देश सिर्फ अपनी त्रासदियों से नहीं बनता, उनसे आगे बढ़ने की क्षमता से भी बनता है।
आजादी का उत्सव शायद इसी आगे बढ़ने का उत्सव है।
इसलिए कल तिरंगा देखिए, बच्चों को देखिए, आजाद हवा को महसूस कीजिए और खुशी मनाइए।
क्योंकि कभी-कभी सबसे खूबसूरत श्रद्धांजलि यही होती है कि हम उस दर्द
को अपने बच्चों तक न पहुँचने दें।


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