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जोड़ने वाले लोग

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 वे जोड़ने वाले लोग थे हर चीज जोड़ कर रखते थे चश्मा टूटा तब कतरन बांधी ढीली अंगूठी पर लपेटा धागा  फटे कुर्ते पर पैबंद  चप्पल पर कील ढोंक रस्सी की गाँठ खींच ली। बड़े चतुर, मेहनती लोग थे पतीले के हैंडल पर लकड़ी जोड़ लेते चाकू की धार खुद तेज करते उनके घर की कुंडी कसी रही लकड़ी एक कुल्हाड़ी से दो फांक कर लेते। वे संभाल कर रखते थे उनके यहाँ मैंने बेकार चीजें नहीं देखी पुराने कपड़ों के गुदड़े बने परात पर पतावे लगा कर संभाला गया कहीं घिस न जाए फूटी टोकनी पर तली लगवा ली बाल्टी पर पैंदी मटके की दरार पर सीमेंट लेप ली साल भर का ईंधन समेटते थे पूरे साल का अनाज। वे मेरा मेरा नहीं आपणी बेटी, आपणी बहू,  आपणा भाई, आपणा गाम पुकारते थे सब साझा था पंचायती बर्तनों में जीमते- जूठते ऊँची परस( धर्मशाला) वाले लोग थे। एक दिन जुड़ी जुड़ाई सब चीजें टूट गई  कैसे, कब पता नहीं  हाँ! इतना जानती हूँ अब कोई जोड़ने वाला भी नहीं रहा यहाँ टूटी चीजें बस फेंक दी जाती हैं।           स

इंसान का वज़न हर बार तौलने से नहीं..कई बार बोलने से भी पता चल जाता हैं..!!

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 अर्ध नग्न महिलाओं को देख कर 90℅ कौन मजे लेता है......एक दिन किसी ख़ास अवसर पर महिला सभा का आयोजन किया गया, सभा स्थल पर महिलाओं की संख्या अधिक और पुरुषों की कम थी..!! मंच पर तकरीबन पच्चीस वर्षीय खुबसूरत युवती, आधुनिक वस्त्रों से सुसज्जित, माइक थामें कोस रही थी पुरुष समाज को..!! वही पुराना अलाप.... कम और छोटे कपड़ों को जायज, और कुछ भी पहनने की स्वतंत्रता का बचाव करते हुए, पुरुषों की गन्दी सोच और खोटी नीयत का दोष बतला रही थी.!!तभी अचानक सभा स्थल से...बत्तीस पैंतीस वर्षीय सभ्य, शालीन और आकर्षक से दिखते युवक ने खड़े होकर अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति मांगी..!! अनुमति स्वीकार कर माइक उसके हाथों मे सौप दिया गया .... हाथों में माइक आते ही उसने बोलना शुरु किया..!! "माताओं, बहनों और भाइयों, मैं आप सबको नही जानता और आप सभी मुझे नहीं जानते कि, आखिर मैं कैसा इंसान हूं..??  लेकिन पहनावे और शक्ल सूरत से मैं आपको कैसा लगता हूँ बदमाश या शरीफ..??सभास्थल से कई आवाजें गूंज उठीं... पहनावे और बातचीत से तो आप शरीफ लग रहे हो... शरीफ लग रहे हो... शरीफ लग रहे हो.... बस यही सुनकर, अचानक ही उसने अजी...

भंडारे की पूरी

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 भंडारे की पूड़ियों पर किसी को प्रबंध-काव्य लिखना चाहिए! लोक में उनकी आसक्ति और प्रभाव इतने व्यापक जो हैं। वे घर में बनाई जाने वाली पूड़ियों से थोड़ी पृथक होती हैं। किंचित लम्बोतर, ललछौंही-भूरी, मुलायम, अधिक अन्नमय, और व्यापक जनवृन्द के क्षुधा-निवारण के प्रयोजन में सिद्ध।  बहुधा भंडारे की पूड़ियों में घर की गोलमटोल पूड़ियों सरीखे पुड़ नहीं होते, वे अद्वैत-भाव से ही आपकी पत्तल में सिधारती हैं। यों पूड़ी शब्द की उत्पत्ति ही पुड़ से हुई है- जैसे सतपुड़ा यानी सात तहों वाला पर्वत। पूड़ियाँ बेलते समय तो आटे की लोई एक ही पुड़ की, समतल भासती हैं, पर तले जाने पर उसमें दो पुड़े फूल आते हैं। पहला, बाहरी पुड़ा महीन और कोमल, जो जिह्वा को लालायित करता है, और दूसरा, आभ्यन्तर का, अन्न के सत्त्व को अपने में सँजोए, जिससे क्षुधा का उन्मूलन होगा! किसी धर्मशाला के कक्ष में रसोई करने वाली स्त्रियों द्वारा तारतम्य के संगीत से बेली और तली जाने वाली पूड़ियों का मन को स्निग्ध कर देने वाला दृश्य कभी निहारिए! और फिर पूड़ियों की मियाद चुक जाने पर जूठे हाथ लिए बैठे उसकी बाट जोहते भंडारा-साधकों को देखिए। महाअ...

बदलते मूल्य

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    आठ महीने की अंजली को पहली बार डे केयर में छोड़कर वृंदा आफ़िस  जा रही थी ।मेलबर्न की ये सड़कें उसे रत्ती भर भी अच्छी नहीं लग रही थी । उसे सोचकर आश्चर्य हो रहाथा कि बैंगलुरु के ट्रैफ़िक से भागकर जब वे पहली बार यहाँ आए थे तो उसने और अरविंद नेकैसे राहत की साँस ली थी, मानो अब ज़िंदगी में कोई संघर्ष बचा ही नहीं , दोनों सड़कों कीतारीफ़ में गुण गाए जा रहे थे । सब कुछ तो था ऑस्ट्रेलिया में , बढ़िया मेडिकल फ़ैसिलिटी, बढ़िया स्कूल, शुद्ध हवा, हाँ, ओज़ोन होल की समस्या थी, पर उसके लिए उपाय थे। सस्तेव्याज पर बैंक ने लोन दे दिया था ,और  उन्होंने एक बढ़िया सा घर इतने कम समय में लेलिया था। कोविड समाप्त होते न होते वह गर्भवती हो गई थी । और इधर रशिया और यूक्रेनका युद्ध भी आरम्भ हो गया था , और वे देख रहे थे कि यह युद्ध तो समाप्त होता नज़र ही नहींआ रहा , और महंगाई लगातार बढ़ रही है। जब तक उनकी बेटी अंजली हुई, तब तक व्याजकी दर भी बढ़ने लगी थी । इसलिए वृंदा को मजबूरी में अंजली को डे केयर छोड़ कर फिर सेकाम पर जाना पड़ रहा था । कार चलाते हुए उसकी ब्रा दूध से थोड़ी गीली हो आई तो उसकी आँखे...

सब मन का खेल है । जिस ने मन को समझ लिया वो मुक्त हो गया !

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 आज से तीसेक साल पहले की बात बतलाऊँ। तब अमीर भी इतने अमीर नहीं होते थे कि एकदम अलग-थलग हो जावें। अपना लोटा-थाली अलग लेकर चलें। पंगत में सब साथ ही जीमते थे। मिठाइयों की दुकान पर वही चार मिठाइयाँ थीं, बच्चों के लिए ले-देकर वही चंद खिलौने थे। जब बाज़ार ही नहीं होगा तो करोड़पति भी क्या ख़रीद लेगा? अमीर से अमीर आदमी भी तब दूरदर्शन पर हफ्ते में दो बार रामायण, तीन बार चित्रहार और नौ बार समाचार नहीं देख सकता था, क्योंकि आते ही नहीं थे। देखें तो उस ज़माने में तक़रीबन सभी एक जैसे ग़रीब-ग़ुरबे थे। सभी साइकिल से चलते थे। कोई एक तीस मार ख़ां स्कूटर से चलता होगा। हर घर में टीवी टेलीफोन नहीं थे। फ्रिज तो लखपतियों के यहां होते, जो शरबत में बर्फ़ डालकर पीते तो सब देखकर डाह करते। लोग एक पतलून को सालों-साल पहनते और फटी पतलून के झोले बना लेते। चप्पलें चिंदी-चिंदी होने तक घिसी जातीं। कोई लाटसाहब नहीं था। सब ज़िंदगी के कारख़ाने के मज़दूर थे।  जीवन जीवन जैसा ही था, जीवन संघर्ष है ऐसा तब लगता नहीं था। दुनिया छोटी थी। समय अपार था। दोपहरें काटे नहीं कटतीं। पढ़ने को एक उपन्यास का मिल जाना बड़ी दौलत थी। दूरदर्शन पर क...

अपने बुजुर्गों का सम्मान करें! यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है।

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 जब मृत्यु का समय निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धर्मपाल को बुलाकर कहा कि,  बेटा मेरे पास धन-संपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है।  तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी। बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए। अब घर का खर्च बेटे धर्मपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया।  धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा। अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है।  क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था। और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी।   एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना...

ईश्वर कौन है ?

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कौन चलाता है यह दुनियां को ??? कहाँ है ईश्वर?? तुम माँ के पेट में थे नौ महीने तक, कोई दुकान तो चलाते नहीं थे, फिर भी जिए। हाथ—पैर भी न थे कि भोजन कर लो, फिर भी जिए। श्वास लेने का भी उपाय न था, फिर भी जिए। नौ महीने माँ के पेट में तुम थे, कैसे जिए? तुम्हारी मर्जी क्या थी? किसकी मर्जी से जिए? फिर माँ के गर्भ से जन्म हुआ, जन्मते ही, जन्म के पहले ही माँ के स्तनों में दूध भर आया, किसकी मर्जी से? अभी दूध को पीनेवाला आने ही वाला है कि दूध तैयार है, किसकी मर्जी से? गर्भ से बाहर होते ही तुमने कभी इसके पहले साँस नहीं ली थी माँ के पेट में तो माँ की साँस से ही काम चलता था— लेकिन जैसे ही तुम्हें माँ से बाहर होने का अवसर आया, तत्क्षण तुमने साँस ली, किसने सिखाया? पहले कभी साँस ली नहीं थी, किसी पाठशाला में गए नहीं थे, किसने सिखाया कैसे साँस लो? किसकी मर्जी से? फिर कौन पचाता है तुम्हारे दूध को जो तुम पीते हो, और तुम्हारे भोजन को? कौन उसे हड्डी—मांस—मज्जा में बदलता है? किसने तुम्हें जीवन की सारी प्रक्रियाएँ दी हैं? कौन जब तुम थक जाते हो तुम्हें सुला देता है? और कौन जब तुम्हारी नींद पूरी हो जाती है तुम्हे...